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World Earth Day: दिल्ली में पसरता कंक्रीट का जंगल, 10 साल में 7 डिग्री बढ़ा पारा; 'अर्बन हीट आयलैंड' से हालात
नितिन राजपूत, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 22 Apr 2026 06:16 AM IST
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सार
पिछले 10 साल में करीब 7 डिग्री तक तापमान में बढ़ोतरी हुई है। इसका खामियाजा राजधानी ही नहीं देश के हर कोने में सबको भुगतना पड़ रहा है। ऐसे में दिल्ली गर्म द्वीपों का शहर बनती जा रही है।
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- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
दिल्ली के तापमान में पहले की तुलना में तेजी से बदलाव हुआ है। पिछले 10 साल में करीब 7 डिग्री तक तापमान में बढ़ोतरी हुई है। इसका खामियाजा राजधानी ही नहीं देश के हर कोने में सबको भुगतना पड़ रहा है। ऐसे में दिल्ली गर्म द्वीपों का शहर बनती जा रही है। 2014 की मई में दिल्ली में अमूमन 30-33 डिग्री तक रहने वाला पारा मई 2024 में 40 डिग्री तक पहुंच गया।
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हालांकि यह दिन ब दिन बढ़ ही रहा है। इसकी पुष्टि सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की कई रिपोर्ट करती हैं। इसे जलवायु परिवर्तन का असर कहें या ग्लोबल वार्मिंग का प्रकोप... लेकिन देश की राजधानी साल दर साल हीट आइलैंड बन रही है। अनुमान है कि इस साल 24 अप्रैल तक लोग 43 डिग्री से ऊपर का तापमान झेलेंगे। बारिश के पैटर्न में बदलाव, खासकर मानसून से पहले के समय में बेमौसम बारिश के कारण तापमान बदला है।
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क्या है अर्बन हीट आइलैंड
जब किसी शहर में आसपास के ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में तापमान में अधिक बढ़ोतरी हो जाती है, उसे अर्बन हीट आइलैंड कहते है। इसकी बड़ी वजह है इंसानी गतिविधियां। किसी भी शहर को हीट आइलैंड बनने में सबसे अहम रोल होता है उसकी बसावट का। वो शहर किस तरह का है, वहां इमारतें कैसी हैं और उसे किस तरह से डिजाइन किया गया है। यही बातें सबसे अहम होती हैं। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में तापमान बढ़ने और इनके हीट आइलैंड में तब्दील होने में भी यही फैक्टर जिम्मेदार हैं।
बढ़ा कंक्रीट का जंगल
पिछले चार दशकों में दिल्ली में कंक्रीट का जंगल काफी हद तक बढ़ा है, जो अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव में भी वृद्धि कर रहा है। 2000 के बाद दिल्ली में तेजी से विकास कार्य हुए हैं। निर्माण कार्यों में इजाफा हुआ। खाली पड़ी जमीन पर फ्लैटों का निर्माण हुआ है, तो हरित क्षेत्र बढ़ाने के नाम पर भी वृक्ष के बजाय झाड़ियां अधिक लगाई गईं। 2003 में दिल्ली का 31.4 प्रतिशत हिस्से पर निर्माण था, जबकि अब यह बढ़कर 40 प्रतिशत को पार कर चुका है।
बड़े पैमाने की मौसमीय स्थितियों लगातार उच्च दाब, साफ आसमान और शुरुआती लू की स्थितियों के कारण हो सकता है, जो जलवायु परिवर्तन और जेट स्ट्रीम में बदलाव से जुड़े हैं, जिससे क्षेत्र के ऊपर गर्म हवा लंबे समय तक बनी रहती है।
-संजय कुमार मिश्रा, पर्यावरण विशेषज्ञ
विकसित भारत की परिकल्पना शहरी विकास के बिना संभव नहीं है। शहरों को विकास का इंजन माना जाता है, किंतु तीव्र होते जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के कारण हमारे शहर आज इस लक्ष्य को प्राप्त करने में गंभीर कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। इस पर ध्यान देना होगा।
-डॉ. प्रसून सिंह, फेलो, पृथ्वी विज्ञान और जलवायु परिवर्तन, टेरी
महसूस होने वाली गर्मी भी सूचना प्रणाली में हो शामिल
लू की चेतावनी और पूर्व सूचना प्रणालियों के लिए केवल तापमान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें गर्मी की महसूस होने वाली स्थितियों को भी शामिल करना चाहिए, क्योंकि शुष्क गर्मी की तुलना में उमस भरी गर्मी अधिक खतरनाक होती है। गर्मी में पसीना निकलने और इसके सूखने से इंसानी शरीर को गर्मी से राहत मिलती है, लेकिन आर्द्रता या उमस बढ़ने पर पसीना प्रभावी तरीके से सूख नहीं पाता है। इसका अर्थ है कि शरीर को गर्मी से छुटकारा नहीं मिल पाता है, जिससे आंतरिक तापमान काफी तेजी से बढ़ता है।
-डॉ. विश्वास चितले, फेलो, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू)
दिल्ली में वाहन, कंक्रीटीकरण, एसी या अन्य एनर्जी स्त्रोत दिल्ली को हीट अर्बन आइलैंड बना रहे हैं। इसके चलते जलवायु परिवर्तन हो रहा है और दिल्ली का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा, बीते 10 साल में दिल्ली का ग्रीन कवर और वाटर रिसोर्सेस भी कम हो गए हैं। इसके चलते दिन के साथ साथ रातें भी अब गर्म होने लगी हैं।
-मिताशी सिंह, प्रोग्राम मैनेजर, सतत आवास, सीएसई
कैसे कम होगी यह गर्मी?
- हरियाली बढ़ाना
- छत पर सफेद रंग से पुताई करा सकते है
- ऐसी चीजों के इस्तेमाल को बढ़ावा दें जो एनर्जी की खपत को कम करें
- एसी का जरूरत भर ही इस्तेमाल करें

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