फिल्म समीक्षा/रॉकी हैंडसम: फिल्म में हैंडसम कुछ भी नहीं है
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
निर्माताः जॉन अब्राहम
निर्देशकः निशिकांत कामत
सितारेः जॉन अब्राहम, दीया चालवाड, श्रुति हासन
रेटिंग *1/2
नकल करने का मतलब किसी कृति को ज्यों का त्यों उतार देना होता है! दक्षिण कोरियाई फिल्म मैन फ्रॉम नोवेयर (2010) का हिंदी रीमेक देखते हुए आप पाते हैं कि कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने इस बात को बहुत गंभीरता से लिया। हास्यास्पद है कि रॉकी हैंडसम में मूल फिल्म में दिखने वाली बच्ची (किम सेई-रोन) जैसा चेहरा (दीया चालवाड) ही चुना गया।
रीमेक में मूल फिल्म की तरह ही रंग भरे गए और हीरो का अंदाज भी वैसा ही। मैन फ्रॉम नोवेयर यूट्यूब से लेकर टॉरेंट साइटों तक पर उपलब्ध है। आप खुद असली-नकली की तुलना कर सकते हैं।
फिल्म जॉन अब्राहम की ऐक्शन-स्टार छवि को ध्यान में रख कर बनाई गई, लेकिन डायरेक्टर निशिकांत कामत का ऐक्टर बनकर ज्यादा फुटेज खाने का मोह साफ दिखता है।
कहने को वह यहां कसाई जैसे विलेन हैं मगर दिखते कॉमेडियन जैसे हैं। रॉकी हैंडसम की स्क्रिप्ट कमजोर है। उस पर हीरो के चहरे पर सदा मनहूसियत का लेबल चिपका रहता है। वह किसी से बात तक नहीं करता। गोवा में चीजें गिरवी रखने की दुकान चलाता है। उसका मकान-दुकान एक ही है। पड़ोस में एक बच्ची रहती है जिसकी मां नशेड़ी है।
बिखरे बचपन को सहेजने की कोशिश करती आठ-नौ बरस की यह बच्ची नायक में पिता देखने लगती है। गोवा में ड्रग्स के कारोबारी हैं और नशेड़ी मां उनके चक्कर में फंस जाती है। वे मां-बेटी को उठा लेते हैं। नायक उन्हें बचाने निकल पड़ता है। क्यों, क्या, कैसे जैसे सवाल आपके मन में रह जाते हैं। हीरो का बच्ची के साथ स्नेह भी फिल्म में ठोस ढंग से स्थापित नहीं हो पाता। बॉलीवुड फिल्मों में कुछ नया देखना दुर्लभ होता है। रॉकी हैंडसम में भी कोई दुर्लभ क्षण नहीं है।
जॉन का चेहरा ऐसा है, जैसे वो नशे में हो
जॉन के कुछ ऐक्शन दृश्य छोड़ दें तो बाकी सब कहने को ‘हैंडसम’ है। खुद जॉन भी नहीं। ड्रग माफिया से लड़ते जॉन का सख्त चेहरा ऐसा लगता है मानो वही नशे में हैं! जबकि निशिकांत कामत कैमरे के पीछे ही रहते तो फिल्म को ज्यादा बेहतर बना पाते। चाइल्ड आर्टिस्ट दीया चालवाड प्रभावित नहीं करतीं। बच्चों से काम लेना पड़ता है। अतः यह कमी भी कामत के खाते में जाती है।
श्रुति हासन हीरो को फ्लैशबैक में दिखने के लिए हैं और दो गानों के साथ उनकी भूमिका समाप्त हो जाती है। फिल्म में गीत-संगीत ऐसा नहीं है कि बांध सके। रोमांस, इमोशन, कॉमेडी रत्ती भर हैं। होली के नटखट दिनों में टिकट खिड़की पर यह रंग कच्चा है।
रॉकी हैंडसम को उन फिल्मों की श्रेणी में रख सकते हैं, जिन्हें हम मक्खी मारने वाले दिनों में देखते हैं यानी बोरियत से भी ज्यादा बोर समय में। फिल्म देखते-देखते आप सो भी सकते हैं क्योंकि जब नींद खुलेगी तो पर्दे पर कुछ भी बदला हुआ नहीं पाएंगे।