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बोल्ड और शरारती तो है पूनम की 'नशा'
रोहित मिश्र
Updated Fri, 26 Jul 2013 03:37 PM IST
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पूनम पांडेय की 'नशा' एक प्रेम कहानी है। 17 बरस के एक छात्र और 30 की दहलीज पर खड़ी एक महिला टीचर की। यह किस्सा कुछ-कुछ राजकपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' जैसा ही होता है। जहां 18 साल के राजकपूर, टीचर बनीं सिमी ग्रेवाल से एकतरफा प्यार कर रहे होते हैं। ठहरिए। आप इस प्यार को लेकर थोड़ा सीरियस हो बैठें इसके पहले ही यह फिल्म प्यार की व्याख्या अपने तरह से कर देती है।
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फिल्म बताती है कि "प्यार गर्मियों की छुट्टियों की तरह होता है जो हर साल आती हैं। हर साल की छुट्टियां अलग होती हैं लेकिन कुछ छुट्टियां हमेशा के लिए याद हो जाती हैं।" पूनम पांडेय की यह पहली फिल्म जिन वजहों के चलते बहुचर्चित है वह वजहें उस अनुपात में फिल्म से पूरी होती नहीं दिखतीं। हां फिल्म का प्लाट ऐसा है जहां थोड़ी बहुत शरारतें और कुछ छिपाना दिखाना भी हो जाता है।
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अब यह दर्शक के ऊपर है कि वह इतने भर से खुश होकर फिल्म का मजा लेता है या नहीं। यह फिल्म एक अच्छी फिल्म भी बन सकती थी बशर्ते इसमें कुछ प्रोफेशनल कलाकार काम कर रहे होते।
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कहानी टीचर और छात्र की
यह फिल्म पंचगनी के एक स्कूल में बच्चों को समर ऐक्टिविटी सिखाने आयी आरती (पूनम पांडेय) और स्कूल के छात्र शाहिल (शिवम) की कहानी है। वह लड़का आरती से एकतरफा प्यार में पड़ जाता है। उसे खुद भी पता नहीं है कि वह प्यार में है या फिर आरती के प्रति उसका आकर्षण शारीरिक है। इस बीच आरती का पांच साल पुराना ब्वॉयफ्रेंड आरती के पास रहने आ जाता है। तकरार अब यहां पर शुरू होती है।
कुछ घटनाओं के बाद आरती को लगने लगता है कि शाहिल उससे प्यार करता है। इस बीच कुछ ऐसा घटता है कि आरती अपने ब्वॉयफ्रेड से दूर हो जाती है। हमेशा के लिए। फिल्म के क्लाइमेक्स में एक बार ही सही आरती और शाहिल शारीरिक तौर पर मिल तो जाते हैँ लेकिन आरती अपने संबंधों को लेकर वैसा फैसला नहीं करती जैसा कि शाहिल उम्मीद कर रहा होता है।
कोई भी नहीं कर पाया अभिनय
इस फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष अभिनय ही है। फिल्म के ज्यादातर कलाकार नॉन प्रोफेशनल एक्टर हैं। फिल्म की मुख्य नायिका पूनम पांडेय ने भी पहली बार कैमरा फेस किया है। पूनम के चेहरे के हाव-भाव कैमरा के साथ मैच नहीं करते। बावजूद इसके कुछ हिस्सों में पूनम पांडेय किरदार के अनुरूप अभिनय कर देती हैं।
उनसे जिस बोल्डनेस की उम्मीद थी वैसी बोल्डनेस संवाद के स्तर पर नहीं दिखायी है। एक स्कूली छात्र का रोल कर रहे शिवम अपने हाव-भाव से तो अच्छी ऐक्टिंग करते हैं लेकिन जहां बारी बोलेन की आती है वह हड़बड़ी में आ जाते हैं।
पूनम की वजह से अंडरप्ले हुआ निर्देशन
इस फिल्म का निर्देशन कर रहे अमित सक्सेना ने इसके पहले 'जिस्म' फिल्म बनाने के अलावा कई अच्छी हिंदी फिल्मों का संपादन किया है। एक निर्देशक के रूप में वह 'नशा' के जरिए आगे नहीं बढ़ते। दरअसल पूनम पांडेय को लीड रोल में लेकर उन्होंने फिल्म का सारा फोकस पूनम पांडेय की ओर कर दिया है।
इसलिए जब कई जगह अमित कलात्मक करने की कोशिश करते हैं तो उनकी कोशिशें भी एक्सपोजर की अपेक्षा न पूरी कर पाने का बहाना सा लगती है। बची-कुची कसर कमजोर फिल्म का कम बजट पूरा कर देती है।
संगीत
फिल्म के बैकग्राउंड में कुछ गाने हैं। इसमें से तेरा नशा सुनने में कुछ बेहतर लग सकता है।
क्यों देखें
एक छात्र और उसकी महिला टीचर की अटपटी सी प्रेम कहानी को देखने के लिए।
क्यों न देखें
यदि इस बात की उम्मींद करके जाए कि पूनम ने कुछ वैसा किया होगा जैसा कि उन्होंने क्रिकेट वर्ल्डकप जीतने पर करने का दावा किया था।