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Film Review: यह चैलेंज कठिन है, उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई अनुष्का की 'सुई धागा'
रवि बुले
Updated Fri, 28 Sep 2018 04:09 PM IST
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-निर्माताः आदित्य चोपड़ा
-निर्देशकः शरत कटारिया
-सितारेः वरुण धवन, अनुष्का शर्मा, रघुवीर यादव
रेटिंग **
सुई धागा अपनी जिंदगी को अपने हाथों सिलने-बुनने का संदेश देती है। जब रोजगार दिन पर दिन कम हो रहे हैं और लोग अपने पारिवारिक हुनर/रोजगारों को अनदेखा कर रहे हैं तो निर्देशक शरत कटारिया की फिल्म दूसरों से ज्यादा खुद पर भरोसा करने की बात करती है। परंतु समस्या यह है कि इस अहम संदेश को पर्दे पर उतारने के लिए उन्होंने जो पटकथा रची, उसमें काफी कुछ सिलने-बुनने को बचा रह गया, जिससे फिल्म की खूबसूरती उभर नहीं सकी। अगर आप वरुण धवन के फैन भी हों तो उन्हें कदम-कदम पर लड़खड़ाते देख कर आपका जी घबरा जाएगा। भले ही वरुण का नाम यहां मौजी हो परंतु लेखक-निर्देशक ने जगह-जगह उनके हिस्से धक्के लिखे, जो उन्हें और दर्शक को दुखी बनाते रहते हैं।
दिल्ली के आस-पास के इलाके में रहने वाले मौजी का सब कुछ ऊपर वाले के भरोसे चलता है और अंत तक तमाम संघर्षों के बाद अचानक आखिरी में वह एक ड्रेस डिजानिंग प्रतियोगिता जीत लेता है। शरत की फिल्म का यह फॉरमेट (हीरो का अंत में प्रतियोगिता में जीतना) उनकी पहली फिल्म दम लगा के इशा की तरह ही है।
यही नहीं, उन्होंने यहां भी पहली फिल्म की तरह एकदम घरेलू पत्नी और अभावग्रस्त परिवार दिखाया है। इस तरह वह कुछ नया करने के बजाय पुराने फार्मूले पर ही चले। अनुष्का नॉन ग्लैमरस रोल में अच्छी नहीं लगतीं। उनका अभिनय ठीक है परंतु वह उनके किरदार में फिट न होने के कारण बेकार चला गया। फिल्म में मौजी और ममता (अनुष्का) के रोमांस को जगह नहीं मिली पर यह जरूर है कि दृश्य-दर-दृश्य दोनों का प्यार जरूर पर्दे पर नजर आता है।
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-निर्देशकः शरत कटारिया
-सितारेः वरुण धवन, अनुष्का शर्मा, रघुवीर यादव
रेटिंग **
सुई धागा अपनी जिंदगी को अपने हाथों सिलने-बुनने का संदेश देती है। जब रोजगार दिन पर दिन कम हो रहे हैं और लोग अपने पारिवारिक हुनर/रोजगारों को अनदेखा कर रहे हैं तो निर्देशक शरत कटारिया की फिल्म दूसरों से ज्यादा खुद पर भरोसा करने की बात करती है। परंतु समस्या यह है कि इस अहम संदेश को पर्दे पर उतारने के लिए उन्होंने जो पटकथा रची, उसमें काफी कुछ सिलने-बुनने को बचा रह गया, जिससे फिल्म की खूबसूरती उभर नहीं सकी। अगर आप वरुण धवन के फैन भी हों तो उन्हें कदम-कदम पर लड़खड़ाते देख कर आपका जी घबरा जाएगा। भले ही वरुण का नाम यहां मौजी हो परंतु लेखक-निर्देशक ने जगह-जगह उनके हिस्से धक्के लिखे, जो उन्हें और दर्शक को दुखी बनाते रहते हैं।
दिल्ली के आस-पास के इलाके में रहने वाले मौजी का सब कुछ ऊपर वाले के भरोसे चलता है और अंत तक तमाम संघर्षों के बाद अचानक आखिरी में वह एक ड्रेस डिजानिंग प्रतियोगिता जीत लेता है। शरत की फिल्म का यह फॉरमेट (हीरो का अंत में प्रतियोगिता में जीतना) उनकी पहली फिल्म दम लगा के इशा की तरह ही है।
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यही नहीं, उन्होंने यहां भी पहली फिल्म की तरह एकदम घरेलू पत्नी और अभावग्रस्त परिवार दिखाया है। इस तरह वह कुछ नया करने के बजाय पुराने फार्मूले पर ही चले। अनुष्का नॉन ग्लैमरस रोल में अच्छी नहीं लगतीं। उनका अभिनय ठीक है परंतु वह उनके किरदार में फिट न होने के कारण बेकार चला गया। फिल्म में मौजी और ममता (अनुष्का) के रोमांस को जगह नहीं मिली पर यह जरूर है कि दृश्य-दर-दृश्य दोनों का प्यार जरूर पर्दे पर नजर आता है।
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बढ़ती हुई कहानी में दुख की छायाएं भी लंबी होती हैं परंतु लेखक-निर्देशक ने संवादों को कॉमिक रखते हुए दर्शकों को गुदगुदाने की कोशिश की है। इसके बावजूद बात बन नहीं पाती। फिल्म का कैमरावर्क अच्छा है मगर गीत-संगीत में खास बात नहीं है। सभी कलाकारों ने अपना काम ठीक ढंग से किया है, तब भी कमजोर कहानी और ढीली पटकथा अच्छे संदेश को खूबसूरती से आकार नहीं लेना देती। दम लगा के हइशा में शरत ने जो उम्मीदें जगाई थीं, उन पर वह इस फिल्म में खरे नहीं उतरते। हो सकता है कि आपने फिल्म के प्रमोशन के लिए चलाए गए सुई में धागा डालने के चैलेंज को आसानी से पूरा कर लिया हो परंतु फिल्म देखने का चैलेंज निश्चित मानिए कि कठिन महसूस होगा।