Jewel Thief Movie Review: नेटफ्लिक्स पर अब देखिए सैफ की ‘नादानियां’, करोड़ों की लागत से बनी दो कौड़ी की फिल्म
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बाईगॉड की कसम, बहुत कलेजा चाहिए, नेटफ्लिक्स ओरिजनल ‘ज्वेलथीफ द हाइस्ट बिगिन्स’ जैसी फिल्म बनाने के लिए। झोली में ‘वॉर’ और ‘पठान’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में हो। ‘फाइटर’ में ऋतिक रोशन और दीपिका पादुकोण को एक फ्रेम में लाने का तमगा मिल चुका हो। शाहरुख खान की अगली फिल्म ‘किंग’ की जिम्मेदारी मिली हुई हो और कंपनी का नाम हो, मारफ्लिक्स। नेटफ्लिक्स की बहन जैसा नाम लगता है। लेकिन, निर्माता सिद्धार्थ आनंद बतौर निर्देशक हिंदी सिनेमा को ‘बैंग बैंग’ जैसा बबल भी दे चुके हैं, ये भूलना नहीं चाहिए। भारतीय मनोरंजन जगत के कलाकारों के इन दिनों दोनों हाथों में लड्डू हैं। एक में अमेरिकन एमजीएम स्टूडियोज के लिए अमेजन जैसी कंपनी मोतीचूर के लड्डू चढ़ा रही है, दूसरे हाथ में बूंदी के लड्डू लेकर हाजिर है नेटफ्लिक्स। वहां का ‘फैमिली मैन’ यहां ‘किलर सूप’ बनाता मिलता है। यहां आलीशान ‘स्कूप’ बनाने वाला वहां ‘खौफ’ जैसी कम बजट की एमएक्स प्लेयर सीरीज बनाता दिखता है। अब बारी हाथीराम की है। उनको भी अपना स्टैंडर्ड बढ़ाना है।
खराब फिल्म बनाने की हिट रेसिपी
एक खराब फिल्म बनाने के लिए क्या क्या जरूरी होता है, वह सब एक दर्शक निर्माता सिद्धार्थ आनंद की नेटफ्लिक्स पर पहुंची फिल्म ‘ज्वेलथीफ द हाइस्ट बिगिन्स’ देखकर सीख सकता है। मतलब कि किरदार सरदार हो तो उसका मोटा होना जरूरी है। चोर है तो वह अय्याश भी होना चाहिए। ‘डेयरडेविल’ के फिस्क जैसा विलेन हो तो उसे मुक्के मारकर सामने वाले की जान ले ही लेनी चाहिए। और, लड़की अगर खूबसूरत है तो उसका कमअक्ल का होना भी जरूरी है। इतने क्लीशे किरदार फिल्म शुरू होने के पहले 15 मिनट में अगर दिख जाएं तो फिल्म कहां पहुंचने वाली है, समझ आ जाता है। लेकिन, रिव्यू लिखना है तो अभी जीवन के पौने दो घंटे और कुर्बान करने ही होंगे। 54 साल का हीरो, 34 साल की शादी शुदा हीरोइन पर डोरे डाल रहा है। कहानी करवट ले रही है और मुझे पता नहीं क्यों नेटफ्लिक्स की चार साल पहले रिलीज हुई फिल्म ‘रेड नोटिस’ बार बार याद आ रही है।
डेविड लोगान का बनाया वर्जिन मोइतो
कोई डेविड लोगान हैं जिन्होंने सो काल्ड इंटरनेशनल अपील वाली ये फिल्म लिखी है, ‘ज्वेलथीफ द हाइस्ट बिगिन्स’। कहानी क्या है, हिंदी सिनेमा की ‘विक्टोरिया नंबर 203’, ‘चोरी मेरा काम’ और ‘जुगनू’ जैसी फिल्मों का एक वर्जिन मोइतो है। अलीबाग से आए हुए लोग हैं। पार्डन माय हिंदी कहकर खुद को गाली देने में ये अपनी शान समझते हैं। 10 करोड़ रुपये का डोनेशन 10 का सिक्का समझकर उछाल देते हैं। 10 रुपये में गरीबों का इलाज करने वाले डॉक्टर साब इसे ले भी लेते हैं। छोटा बेटा पिता को बचाने के लिए बड़े भाई के पास आया है। बड़ा भाई मशहूर चोर है, जिसकी पहले की किसी चोरी का किसी को पता नहीं है, पर पापा का नाम खराब न हो, इसलिए अपने वतन आ जाता है एक और चोरी करने। हीरा बड़ा है। रेड सन उसका नाम है। और, कोई टेलीविजन सीरियल एडिट करने वाला फिल्म एडिटर है, जिसको रिएक्शन शॉट बिगिनिंग से लगाने का गजब का अभ्यास है।
तो मेहरबान, कद्रदान, बिना शर्ट वाले कोट पहनने वालों की इस कहानी मेरा मतलब फिलिम को देखने का अगर आपका बड़ा मन हो रहा है, तो आगे का रिव्यू भी पढ़ते जाइए। डेविड लोगान की कहानी की करण व्यास ने मरम्मत की है। शाहरुख खान के खासमखास डायलॉग राइटर ने फिल्म ‘ज्वेलथीफ द हाइस्ट बिगिन्स’ के बहुत दोयम दर्जे के संवाद लिखे हैं। मामला कुछ इतना खराब है कि संबित मिश्रा को अलग से कुछ और संवाद लिखने का काम इसी चक्कर में मिल गया है। एक ही फिल्म के दो डायरेक्टर होते होंगे तो कैसे फिल्म का निर्देशन करते होंगे, उसकी बानगी अगर देखनी हो तो फिल्म ‘ज्वेलथीफ द हाइस्ट बिगिन्स’ देख सकते हैं। पहले क्लोजअप में सैफ अली खान को देखते ही फिल्म में आगे बतौर हीरो उनको देखने का चार्म फिल्म के सिनेमैटोग्राफर ने ही खत्म कर दिया है। सैफ अली खान ने खुद भी ऐसा कुछ करने की कोशिश फिल्म में नहीं की जिसके चलते ये फिल्म उनका कोई प्रशंसक भी याद रख सके। सिनेमाघरों में पहुंचती तो ये सैफ अली खान की ‘तानाजी’ के बाद कतार से आठवीं फ्लॉप फिल्म होती। ‘तानाजी’ के पहले भी वह कतार से एक दर्जन फ्लॉप फिल्में ‘रेस 2’ के बाद से दे चुके थे।
खैर, सैफ का क्या? वह नवाब हैं। अपनी रियासत है उनकी। फिल्में तो वह टाइमपास करने के लिए करते होंगे। लेकिन, जयदीप अहलावत का क्या करें? ये तो आदमी इरफान खान के लेवल का कलाकार बनता दिख रहा था। बहुत दिल दुखेगा जयदीप अहलावत के प्रशंसकों का, उन्हें ऐसी फिल्म करते देखकर। लेकिन हो सकता है कि नाम कमाने के बाद जयदीप ने अब पैसा कमाने की ठानी हो, लेकिन अगर ऐसी एक दो फिल्में उनकी और आ गईं तो यहां मामला कब फोकस शिफ्ट कर जाता है, पता भी नही चलता। अभिनय के लिहाज से फिल्म में जयदीप के करने लायक कुछ नहीं है। कुत्ता और आदमी, उनका किरदार एक सहज भाव से मारता चलता है। कुत्ता भी ऐसा वैसा नहीं रॉटविलर, जो अनजान आदमी से पहली ही मुलाकात में बिस्कुट खा लेता है। मालिक ना मारे तो करे भी क्या? सर्वजन समभाव वाला ये विलेन किस गति को पहुंचेगा, हाथीराम से पूछो तो वह भी शायद जवाब न दे। लेकिन, हाथीराम के रूप में जयदीप मशहूर हुए तो नेटफ्लिक्स को भी ऐसा कुछ चाहिए रहा होगा और बाजार में डिमांड हो तो ऐसी चीजें प्लेट में परोस देने में इंडस्ट्री में सिद्धार्थ जैसे ढेर सारे हैं।
फिल्म की एडिटिंग कितनी खराब है, आपने पढ़ ही लिया है। साउंड डिजाइन का बस एक उदाहरण काफी है। एक सीन है, हीरो कांच के कमरे में है। दूसरी तरफ कांच का ही एक और कमरा है, जहां विलेन हीरोइन संग जबर्दस्ती कर रहा है। प्वाइंट ऑफ व्यू हीरो का है और कांच की दीवारों से हीरोइन की चीख सुनाई दे जाती है! फोले साउंड करने वाले भी मुंबई में कमाल के लोग होते हैं। फिल्म में सिगरेट पीने वाले दृश्यों में वैधानिक चेतावनी लगनी अभी बाकी है। 70 के दशक में बनने वाली बी, सी ग्रेड की जासूसी और हीरों की चोरी जैसी फिल्म ‘ज्वेलथीफ द हाइस्ट बिगिन्स’का बजट कितना अप्रूव हुआ होगा, नेटफ्लिक्स की असली पिक्चर वहीं है। यकीन नहीं होता कि जिस ओटीटी के दर्शकों ने हाल ही में ‘टेस्ट’ जैसी शानदार फिल्म देखी हो, उसी ओटीटी पर ‘ज्वेलथीफ द हाइस्ट बिगिन्स’ जैसी फिल्म भी देखने को मिल रही है। कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, कोई यूं ही ऐसी फिल्म ओके नहीं करता..! सैफ के बेटे इब्राहिम की ‘नादानियां’ तो याद ही होगी!!