Jigra Review: दिव्या खोसला से इक्कीस साबित हुईं आलिया, एक ही कहानी पर एक ही घर में दो फिल्में बनाने का कारनामा
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आलिया भट्ट की गिनती कभी हिंदी सिनेमा की नंबर वन हीरोइन के रूप में भी हो चुकी है। लेकिन, उनका अभिनय अब एकसार दिखने लगा है। फिल्म ‘गली बॉय’ से गिनना शुरू करें तो उसके बाद सिनेमाघरों तक पहुंची फिल्मों में ‘कलंक’, ‘सड़क 2’, ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’, ‘आरआरआर’, ‘ब्रह्मास्त्र पार्ट वन’ और ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ का दर्शकों पर असर मिला जुला ही रहा है। उनका ब्रांड मजबूत करने को करण जौहर दिन-रात मेहनत करते हैं। आलिया के पिता महेश भट्ट उन्हें लगातार सलाह देते हैं। ‘जिगरा’ पूरी हुई तो उन्होंने ही सबसे पहले देखी। फिल्म का मूल आधार वही है जिस पर आलिया के चाचा मुकेश भट्ट ने पहले ही दिव्या खोसला कुमार को लेकर फिल्म ‘सावि’ बना ली है। अब ये भी समझा जा सकता है कि करण जौहर और वासन बाला के बीच फिल्म ‘जिगरा’ की स्क्रिप्ट को लेकर जो खेल खेला गया, वह सब कहानी के असली आधार की तरफ से ध्यान हटाने का एक बहाना था। फिल्म देखकर समझ आता है कि ये कहानी आलिया भट्ट की तरफ से ही वासन बाला के पास आ सकती है।
इस मोड़ से जाते हैं..
फिल्म ‘जिगरा’ की बात करने से पहले इसके निर्देशक वासन बाला की बात भी जरूरी है। नेटफ्लिक्स के पैसों से बनी उनकी फिल्म ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ ने एक कमाल के निर्देशक का परिचय हिंदी सिनेमा के दर्शकों से करवाया। उस फिल्म को लिखा था निर्देशक श्रीराम राघवन के साथ लंबे समय से जुड़े रहे योगेश चांदेकर ने। वासन बाला ने बतौर लेखक ‘पेडलर्स’, ‘बॉम्बे वेलवेट’, ‘रमन राघव 2.0’, ‘रुख’ और ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ लिखीं। पहली और आखिरी के निर्देशक वह खुद ही हैं। बैंक की नौकरी छोड़ वह अनुराग कश्यप के शागिर्द बने। उन्हीं से सिनेमा सीखा। कलाकार की कमर में कैमरा बांधकर उसके हाफा दैया करते चेहरे के शॉट लेना भी वहीं से आया है। और, उत्तेजना के क्षणों में आलिया भट्ट की सांसें फूलते दिखाना भी वासन बाला ने उसी अनुराग कश्यप स्कूल से सीखा है। वासन बाला इस फिल्म से उसी राह पर चल निकले हैं, जिस राह पर फिल्म ‘बॉम्बे वेलवेट’ से अनुराग कश्यप ने कदम बढ़ाया था। सुपर सितारों की चकाचौंध में अपना आभामंडल भूले एक निर्देशक की फिल्म बन गई है ‘जिगरा।’
फैमिली ड्रामा बनाने की कोशिश
फिल्म ‘जिगरा’ की कहानी में देव आनंद और जीनत अमान की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के लिए आनंद बक्षी का लिखा गाना ‘फूलों का तारों का सबका कहना है’ च्यवनप्राश बनकर आता है। फ्रेंच फिल्म ‘पोअर एले’ और इसकी हॉलीवुड रीमेक ‘द नेक्स्ट थ्री डेज’ की कहानी एक पति की अपनी पत्नी को जेल से छुड़ाने की कोशिश है। फिल्म ‘सावि’ में इसका रिवर्स है और फिल्म ‘जिगरा’ में इसे बदलकर जेल में बंद भाई को छुड़ाने की कोशिश करती बहन तक आ गई है। गलती इसमें वासन बाला की कम और आलिया भट्ट की ज्यादा है कि पहले से ही जिस कहानी पर उनके ही घर में एक फिल्म बन रही है, उसी कहानी में भाई-बहन के भावुक रिश्तों का तड़का लगाकर उन्हें बतौर निर्माता इस फिल्म का एलान नहीं करना चाहिए था। आलिया यहां कोशिश तो करती हैं ‘एनिमल’ का रणविजय सिंह बनने की, वह अपनी बहन को स्कूल में बचाता है। यहां बहन अपने भाई को स्कूली दबंगों से बचाने की बात करती है। ये प्रसंग दिखा भी दिया जाता तो शायद आलिया का किरदार मजबूती से उभरता। फिर आलिया को ‘जंजीर’ का अमिताभ बच्चन बनाने की कोशिश भी है, लेकिन उस फिल्म के दो दो गाने ‘चक्कू छूरियां तेज करा लो’ और ‘यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी’ के इस्तेमाल बाद भी मामला जमता नहीं है।
स्पाई यूनिवर्स के लिए खतरे की घंटी
फिल्म ‘जिगरा’ शुरू से ही एक कमजोर पटकथा के साथ आगे बढ़ती है। कहानी की नायिका को एक अमीर घराने के लड़के का भविष्य बचाने के लिए एक गरीब लड़की को विदेश भगाते दिखाया जाता है। लिखने वालों को इसमें उसकी मुसीबतों को टालने या उन्हें हल करने का गुण भले नजर आता हो लेकिन ये एक नायिका का काम नहीं हो सकता। नायिका का काम होता एक रईसजादे से मोहब्बत करके गर्भवती हुई गरीब लडकी का साथ देना। खैर, कहानी फिर गोता तब लगाती है जब इसी नायिका के ताऊ अपने बेटे को बचाने के लिए अपने भतीजे की बलि चढ़ाने की कोशिश करते हैं और उसके बाद पूरी फिल्म से वह पूरा परिवार गायब रहता है। कहानी की नायिका सत्यभामा ‘एनिमल’ के रणविजय की तरह अपनी सहूलियत के हिसाब से विदेश में जाकर खून खराबा करती रहती है और मलयेशिया की पुलिस बस आखिरी सीन में उसे बचाने पहुंचती है। आलिया भट्ट एक्शन अवतार में अपना दम दिखा नहीं पाई हैं। उनकी कद काठी उनके एक्शन को वास्तविक और विश्वसनीय नहीं लगने देती। लॉन्ग शॉट में तो वह किसी वीडियो गेम का हिस्सा नजर आती हैं। यशराज फिल्म्स की फिल्म ‘अल्फा’ के लिए ये शुभ संकेत नहीं है।
बिल्कुल तेज नहीं हो पाईं ‘चक्कू छूरियां’..
वासन बाला ने फिल्म को अपने तकनीकी कौशल के जरिये सजाने की भरपूर कोशिश की है। कहानी को नायिका प्रधान बनाए रखते हुए भी वह मुथु और भाटिया जैसे साथी सत्यभामा के लिए गढ़ने में कामयाब रहे। ‘नेक्स्ट थ्री डेज’ में भी मदद के लिए पुराने अपराधी की एंट्री है और ‘सावि’ में भी। उधार के तीन गानों और तीन नए पंजाबी गानों के बावजूद फिल्म ‘जिगरा’ का सबसे कमजोर पक्ष इसकी कहानी के बाद इसका संगीत ही है। क्लाइमेक्स में भाटिया के लिए बैकग्राउंड में ‘गर खुदा मुझसे कहे कुछ मांग ऐ बंदे मेरे’ बजाने से गाने के साथ साथ इस किरदार का असर भी कमजोर हो गया है। ये पूरी की पूरी कव्वाली वासन बाला इसके पहले ही इसी क्लाइमेक्स में बजा चुके होते हैं।
जरूरत से ज्यादा लंबी फिल्म
फिल्म ‘जिगरा’ में बाकी कलाकारों के अभिनय के लिहाज से बहुत गुंजाइश नजर आती है। काश, वासन बाला ने आलिया भट्ट और पूरी टीम से से वैसे ही रगड़ कर काम कराया होता है जैसे उन्होंने ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ के कलाकारों से कराया। फिल्म का कमजोर विलेन भी फिल्म को और कमजोर करता है क्योंकि उसका आतंक भी कायदे से स्थापित नहीं हो पाया है। सिर्फ सिगरेट पीने और जेल में हेडफोन लगाकर घूमने से क्रूर खलनायक नहीं रचा जा सकता। इसके लिए उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और फिर उसे परदे पर उसी के हिसाब से पेश करना जरूरी है। नायिका और खलनायक की आमने सामने भिड़ंत का एक भी सीन फिल्म में नहीं है। इसी चक्कर में कहानी आखिर तक कमजोर ही बनी रहती है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी ठीक है। संपादन के मामले में फिल्म कम से कम आधा घंटे कमजोर नजर आती है।