Lust Stories 2 Review: अंतर्वासना सी कहानियां मस्तराम से किरदार और लंबी होती सी ग्रेड लिस्ट हिंदी सिनेकारों की
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लस्ट स्टोरीज यानी वे कहानियां जिनमें काम भोग की उत्कट इच्छा प्रकट करने वाले किस्से हों। आशी दुआ ने जब बड़े परदे के लिए फिल्म ‘बॉम्बे टाकीज’ बनाई थी, तभी से हिंदी सिनेमा के दर्शकों को ये एहसास हो चला था कि कुछ तो ऐसा है जो कैमरे के जरिये परदे पर आने को अरसे से मचलता रहा है लेकिन जिससे नामचीन दर्शक इसलिए दूरी बनाए रहे कि कहीं उनका नाम भी ‘खुली खिड़की’ या ‘बंद दरवाजा’ जैसी बी और सी ग्रेड श्रेणी की फिल्में बनाने वालों में शामिल न हो जाए। आशी दुआ ने फिल्मों की अलग अलग श्रेणियों की ये रेखा अपने हाथों से पोछ दी है। 10 साल हो चुके तब से और हिंदी सिनेमा का निर्देशन अब वहां आ पहुंचा है जहां इन फिल्मकारों की सामाजिक संवेदनाएं विदेश से आ रही मोटी रकम के नीचे कहीं दब चुकी हैं। आशी ने पांच साल पहले रॉनी स्क्रूवाला के साथ ‘लस्ट स्टोरीज’ बनाई और अब वह लाई हैं, ‘लस्ट स्टोरीज 2’!
आशी दुआ की उत्कट इच्छाएं
‘लस्ट स्टोरीज 2’ देखते समय ये ख्याल बार बार मन में आता है कि चार कहानियों की ये फिल्मावली बनाने के पीछे उस महिला की उत्कट इच्छाएं हैं जिसने बरेली से शुरू करके न्यूयॉर्क और मुंबई तक की जिंदगी देखी है। आशी की इस यात्रा में संवेदनाएं कुछ कुछ वैसी ही हैं जैसी पटरी पर बिकने वाली ‘मस्तराम’ सीरीज की किताबों में हुआ करती थीं। कहानियों में कामेच्छाओं तमाम लेखकों ने बुनी हैं। आशी ने कामेच्छाओं में कहानियां पिरोने का प्रयोग अपनी तरह का अलग ही किया है। लेकिन, जहां ‘लस्ट स्टोरीज’ ने कियारा आडवाणी की तरफ दुनिया भर का ध्यान खींचा, ऐसी कोई ‘खोज’ इस बार उसकी सीक्वल में होती नहीं दिख रही। चार फिल्मों की इस नई फिल्मावली में भी जाने पहचाने सितारे हैं। हिंदी सिनेमा की ‘सेक्स अंबेसडर’ बन चुकी नीना गुप्ता का फूहड़ अभिनय छोड़ दें तो बाकी कलाकारों ने काम भी ठीक ठाक ही किया है। जी हां, बस ठीक ठाक।
बाल्की, मृणाल और अंगद की ‘चुप’
फिल्मावली की चार कहानियों का क्रम ऐसा है कि इसमें कोई सिरा एक दूसरे से जुड़ता नहीं दिखता। दो कहानियों के बीच एक काला लम्हा आता है जिसे फिल्म मेकिंग की भाषा में ब्लैक कहते हैं। निर्देशक का नाम आता है और कहानी शुरू। बोहनी का जिम्मा उन आर बाल्की ने उठाया जिनकी पिछली फिल्म ‘चुप’ देखने के बाद समीक्षकों को वाकई लगने लगा था कि स्टार रेटिंग करना दुश्मनी मोल लेने से कम नहीं है। लेकिन, उनका काम यहां भी इस फिल्म जैसा ही है। मृणाल ठाकुर और अंगद बेदी का शादी से पहले ‘टेस्ट ड्राइव’ लेना। माउंट फुजी का फूटना, ये सब ऐसी धारणाएं हैं जो कम से कम 2023 में बहुत ही पुरानी लगती हैं। एक दादी अपने पोती को सेक्स समझाए और वह भी न्यू मिलेनियल्स के दौर में, बात समझ में आती नहीं है। हां, ये हो सकता है कि नेटफ्लिक्स वाले हिंदुस्तान दर्शकों को अब भी एस डी बर्मन के संगीत वाले दौर का ही समझते हों, तो अलग बात है।
तिलोत्तमा, अमृता और कोंकणा अव्वल नंबर
फिल्म ‘लस्ट स्टोरीज 2’ सेकंड गेयर में आती है कोंकणा सेन शर्मा निर्देशित कहानी से। किस्सा दो महिलाओं का है। एक कॉरपोरेट जगत में है और माइग्रेन से परेशान है, दूसरी अपनी झुग्गी की घुटती जिंदगी से। दोनों को सुकून तब मिलता है जब जिंदगी का अक्स उन्हें अपनी हकीकत के आईने में दिखता है। झुग्गी की रात दिन के उजाले में एसी की ठंडक पाती है। ऊंची इमारतों का सच इसी आईने में सामने तब आता है जब वॉइयूरिजम में माइग्रेन का इलाज नजर आता है। दूसरों को संभोग में रत देखकर मिलने वाले इस दर्शनरति सुख की कहानी में कई सामाजिक अंतर्धाराएं भी हैं और दूसरों के सामने आदर्शवादी बनकर रहने का ढोंग भी इसमें भरे चौराहे फूटता है। तिलोत्तमा शोम और अमृता सुभाष का अभिनय इस कहानी का चरम बिंदु है और कोंकणा सेन शर्मा की ये कहानी ही इस फिल्मावली का शीर्ष स्खलन भी है। यहां से फिल्मावली एक बार ढलान पर आती है तो आखिर तक लुढ़कती ही जाती है।
नकली सी कहानी, फर्जी से किरदार
तीसरा कहानी ‘लस्ट स्टोरीज’ की सुजॉय घोष ने संभाली है। पहले फ्रेम से ही सुजॉय आभासी दुनिया में दर्शकों को ले आते हैं। अमिताभ बच्चन की नकल करने वाला और घर जमाई के जरिये सीईओ बना बंदा एंटीक मर्सीडीज में देह दर्शना वीडियो कॉल कर रहा है। बीच में पत्नी और बेटे से भी बात कर लेता है। ससुर की बुलाई इमरजेंसी एजीएम से बिगड़े संतुलन में हादसा होता है। और, सामने प्रकट होती है उसकी 10 साल पहले मरी बीवी। बीवी मर चुकी थी या लापता हो गई थी। ये सीईओ साब समझ नहीं पाते। दर्शकों को समझ आ चुका होता है कि मामला ये ऐसे खेल का है कि जिसमें अंतर्वासना जैसी वेबसाइट्स से उठाई एक कहानी है और दो ऐसे सितारे हैं जो लंबे समय से इसी कहानी को बेचने के लिए गुलू गुलू होने का खेल अपने प्रशंसकों के साथ करते रहे हैं। पैटर्न वही है। किरदारों को मिलना है। स्पर्श अतिरेक होना है। तनाव बढ़ना है और चरम बिंदु पर एक ट्विस्ट आना है। लेकिन, सुजॉय घोष की इस ढीली सी कहानी की कास्टिंग भी खराब है। विजय वर्मा कहीं से अपने किरदार में फिट नहीं बैठते। और, तमन्ना भाटिया ने भी किसी तरह हिंदी सिनेमा में टिके रहने के लिए वह सब फिर से कर दिखाया है जो वह दक्षिण के सिनेमा में आदिकाल से करती चली आ रही हैं।
काजोल और कुमुद मिश्रा की मेहनत बेकार
फिल्मावली की चौथी कहानी जिसमें काजोल और कुमुद मिश्रा जैसे दमदार कलाकार हैं, इस कड़ी की सबसे कमजोर कहानी है। काजोल कोठे से निकलकर राजसी खानदान के वंशज की सौ साल पुरानी हवेली में रानी बनकर रह रही हैं। कुमुद मिश्रा को अब भी खुद के राजा होने का गुमान है और आंखों के सामने से गुजर जाने वाली हर मादक, मांसल युवती उन्हें अपने हरम का हिस्सा नजर आती है। रानी को अपने बेटे को आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजना है। लेकिन, अपने ‘महाराजा’ को भी उसे सबक सिखाना है। पुराने कोठे से उसके तार अब भी जुड़े हुए हैं। वह सबक का एक इमला तैयार करती है। लेकिन, पाठ पढ़ने की जब बारी आती है तो बिजली सीधे उसी के कलेजे पर गिरती है। कुमुद और काजोल के लिए ऐसे किरदार बाएं हाथ का खेल रहे। कहीं कोई चौंकाने वाली बात न किरदारों में है और न कलाकारों के अभिनय में। अमित रविंद्रनाथ शर्मा की फिल्म ‘मैदान’ तीन साल से बनकर रिलीज की कतार में हैं और यहां ‘लस्ट स्टोरीज 2’ में उनका पूरा मैदान ही एक कमजोर कहानी में सिमटकर चबूतरा बन गया है।