Ranga Billa Case: क्या है 48 साल पुराना कुख्यात रंगा-बिल्ला केस? जिस पर बनी है 'राख'; कांप गई थी देश की रूह
What Is Ranga Billa Case: प्राइम वीडियो पर एक सीरीज आई है 'राख'। यह 48 साल पुराने कुख्यात रंगा-बिल्ला केस पर बनी है। दिल्ली में हुआ ऐसा आपराधिक मामला, जिससे पूरे देश की रूह कांप उठी थी।
विस्तार
48 साल पहले दिल्ली में एक अपराध को अंजाम दिया गया। समय बीत गया है, मगर यादें उतनी ही कड़वी और भयावह हैं। घर से निकले दो भाई-बहन कभी घर नहीं लौट पाए थे। वे बच्चे एक सेनाधिकारी के थे। दोनों मासूमों का अपहरण किया गया और फिर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस अपराध को दुर्दांत अपराधियों रंगा-बिल्ला ने अंजाम दिया था। यह घटना रंगा-बिल्ला केस के रूप में जानी जाती है। इसी पर वेब सीरीज 'राख' बनी है, जो कल शुक्रवार को ओटीटी पर आई है। जानिए, रूह कंपा देने वाली इस पूरी घटना के बारे में..
पांच दशक पहले क्या हुआ था?
रंगा-बिल्ला मामला भारत के सबसे भयावह आपराधिक मामलों में से एक है। साल 1978 में 28 अगस्त को भाई-बहन गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा का अपहरण किया गया था। दोनों आकाशवाणी में एक कार्यक्रम के लिए जा रहे थे। रंगा-बिल्ला ने उन्हें कार से लिफ्ट दी। मगर, दोनों मासूमों को कार में बंधक बना दिया। संजय और गीता के साथ पहले क्रूरता की गई, फिर बेरहमी से मार दिया गया। करीब पांच दशक पुराना यह मामला आज भी लोगों के जहन में है। सिर्फ इसलिए नहीं कि यह अपराध बहुत बेरहम था, बल्कि इसलिए भी कि इसने सार्वजनिक जगहों पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर भारतीयों के नजरिए को पूरी तरह बदल दिया।
26 अगस्त 1978 का वह मनहूस दिन
गीता चोपड़ा (16 साल) और उनके छोटे भाई संजय चोपड़ा (13 साल) भारतीय नौसेना में अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा के बच्चे थे। वे अपने परिवार के साथ नई दिल्ली के धौला कुआं में रहते थे। जीसस एंड मैरी कॉलेज में द्वितीय वर्ष की छात्रा गीता को उस दिन ऑल इंडिया रेडियो के मशहूर प्रोग्राम 'युवा वाणी' में हिस्सा लेना था। संजय भी उनके साथ जा रहे थे। मगर, दोनों भाई-बहन ऑल इंडिया रेडियो नहीं पहुंच पाए। बाद में जो सच पता चला, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।
रात 09 बजे रेडियो से पता चला सच
माता-पिता बिटिया के कार्यक्रम का इंतजार कर रहे थे। रात करीब 9 बजे, जब चोपड़ा परिवार ने गीता की आवाज सुनने की उम्मीद में रेडियो चालू किया, तो उन्हें किसी और की आवाज सुनाई दी। घबराकर, कैप्टन चोपड़ा तुरंत बच्चों को लेने स्टेशन गए। वहां उन्हें चौंकाने वाली खबर मिली कि गीता और संजय वहां पहुंचे ही नहीं। परिवार वालों ने दोस्तों, रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों से संपर्क किया। सोचा शायद बच्चों ने कुछ प्लान बदल लिया हो, मगर कहीं से तसल्ली वाला जवाब नहीं मिला। पुलिस को सूचना दी गई और तलाशी अभियान शुरू किया गया।
28 अगस्त, 1978 को सारी उम्मीदें टूट गईं
परिवार की चिंता बढ़ रही थी। बच्चों के सकुशल होने की दुआ कर रहे थे। उम्मीदें बांध रहे थे। दो दिनों तक भी बच्चों की कोई खबर नहीं मिली। और दो दिन बाद जो पता चला, उसने सारी उम्मीदें तोड़ दीं। 28 अगस्त, 1978 को एक मवेशी चराने वाले को जंगल में दो लाशें मिलीं। पीड़ितों की पहचान के लिए उनके माता-पिता को बुलाया गया। ये शव गीता और संजय चोपड़ा की थीं। इस खबर से पूरे देश में हलचल मच गई। राष्ट्रीय राजधानी में दो बच्चों के गायब होने से पहले ही चिंता थी। उनकी मौत की खबर सामने आने के बाद यह चिंता आक्रोश में बदल गई।
29 अगस्त, 1979! पोस्टमार्टम में पता चली बर्बरता
29 अगस्त को पोस्टमार्टम किया गया। 30 अगस्त, 1978 को छपी अखबार की खबरों के मुताबिक, दोनों शवों पर चाकू से कई बार वार किए गए थे और वे सड़ने लगे थे। मेडिकल जांच से पता चला कि मौत धारदार हथियार से लगी चोटों के कारण हुई थी। मौत का अनुमानित समय 26 अगस्त की शाम से लेकर उसी रात आधी रात के बीच का माना गया। खबरों के अनुसार, संजय चोपड़ा के शरीर पर चाकू से 25 बार वार किए गए थे, जिनमें से कई वार उनके हाथों पर थे, जिससे पता चलता है कि उन्होंने हमलावरों का डटकर मुकाबला किया था। एक अच्छे बॉक्सर होने के कारण, जांचकर्ताओं का मानना था कि उन्होंने आखिर तक संघर्ष किया। गीता चोपड़ा के शरीर पर चाकू से कई वार किए गए थे। साथ ही उनकी गर्दन पर भी एक गहरा घाव था। इस हमले की बर्बरता ने पूरे देश को दहला दिया।
मासूमों ने जिंदगी के लिए आखिर तक लड़ी थी जंग
जांच करने वालों को आखिरकार एक अहम सुराग मिला। गीता और संजय ने बिना लड़े हार नहीं मानी। कहा जाता है कि हाथापाई के दौरान भाई-बहन ने हमलावरों को इतनी बुरी तरह घायल कर दिया कि उन्हें इलाज की जरूरत पड़ी। अस्पताल का वह दौरा ही आखिरकार जांच करने वालों के लिए एक अहम सुराग बन गया। इस खूंखार अपराध को अंजाम देने वाले कुलजीत सिंह (रंगा) और जसबीर सिंह (बिल्ला) करीब दो हफ्ते तक फरार रहे।
8 सितंबर 1978 को हुई गिरफ्तारी
8 सितंबर 1978 को, आगरा के पास ट्रेन में चढ़ने के बाद रंगा-बिल्ला दिल्ली जाने वाली कालका मेल में सवार हुए। उनकी गलती यह थी कि वे सेना के जवानों के लिए आरक्षित डिब्बे में घुस गए थे। जब उनसे पहचान-पत्र दिखाने को कहा गया, तो उनके व्यवहार से शक पैदा हुआ। उस समय की घटनाओं के अनुसार, उनमें से एक व्यक्ति ने दूसरे से वह पहचान-पत्र दिखाने को कहा, जो पहले से ही भरा हुआ था। सैनिकों को शक हुआ। इत्तेफाक से, उनके पास एक अखबार की कॉपी थी, जिसमें भारत के सबसे ज्यादा वांटेड भगोड़ों में से एक की फोटो थी। दोनों में काफी समानता थी। जब ट्रेन सुबह करीब 3.30 बजे दिल्ली पहुंची, तो दोनों संदिग्धों को पुलिस को सौंप दिया गया।
31 जनवरी, 1982 को दी गई फांसी
रंगा-बिल्ला पर अपहरण और हत्या का आरोप लगाया गया था। दिल्ली के एक एडिशनल सेशंस जज ने दोनों को दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई। उन्हें इंडियन पीनल कोड (IPC) की अलग-अलग धाराओं के तहत जेल की सजा भी सुनाई गई। दोनों दोषियों ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपनी सजा के खिलाफ अपील की। हाई कोर्ट ने अपीलों पर सुनवाई की और साथ ही क्रिमिनल प्रोसीजर (आपराधिक प्रक्रिया) के नियमों के तहत मौत की सजा की जरूरी पुष्टि पर भी विचार किया। आखिरकार, उनकी सजा और मौत की सजा को बरकरार रखा गया। यह मामला भारत में सबसे ज्यादा चर्चित आपराधिक मुकदमों में से एक बन गया। बाद में 31 जनवरी, 1982 को तिहाड़ जेल में रंगा-बिल्ला को फांसी दी गई।
वेब सीरीज 'राख' के बारे में
बात करें वेब सीरीज 'राख' की तो इसमें अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर, राकेश बेदी, दिव्येंदु भट्टाचार्य, आकाश मखीजा, रमनदीप यादव, दिव्या शर्मा और विवान शर्मा जैसे सितारे हैं। इसका निर्देशन प्रोसित रॉय ने किया है।