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Ambala News: जैम पोर्टल ने साइंस कारोबार में बढ़ा दी प्रतिस्पर्धा, कारोबारी चाहते हैं मुक्ति

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 31 Jan 2026 03:05 AM IST
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JAM portal increases competition in science business, businessmen want freedom
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अंबाला। देश का विज्ञान उपकरण कारोबार इन दिनों दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जैम) पोर्टल पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने उत्पादों की गुणवत्ता को दांव पर लगा दिया है, तो दूसरी तरफ चीन से आने वाले कच्चे माल पर भारी आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) ने उद्यमियों की कमर तोड़ दी है। आगामी बजट से पहले साइंस कारोबारियों ने सरकार से इस जटिल तंत्र से मुक्ति दिलाने की गुहार लगाई है।
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अंबाला साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन (असीमा) के पूर्व महासचिव गौरव सोनी बताते हैं कि जैम पोर्टल पर देशभर के ट्रेडर्स के आने से गलाकाट प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। ट्रेडर्स केवल टेंडर हासिल करने के लिए कीमतों को न्यूनतम स्तर पर ले जाते हैं। इससे वास्तविक निर्माता प्रतिस्पर्धा से बाहर हो रहे हैं। नतीजा यह है कि शिक्षण संस्थानों और स्कूलों में बेहद कम गुणवत्ता वाली साइंस किटें पहुंच रही हैं। कारोबारियों का कहना है कि विज्ञान के प्रयोगों के लिए सटीकता जरूरी है, लेकिन पोर्टल के जरिए होने वाली सस्ती खरीद शिक्षा के स्तर को गिरा रही है।
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ग्लासवेयर इंडस्ट्री पर इंपोर्ट ड्यूटी की मार



केवल पोर्टल ही नहीं, बल्कि कच्चे माल की आपूर्ति भी एक बड़ी समस्या बन गई है। लैब में इस्तेमाल होने वाले कांच के उपकरण (ग्लासवेयर) बनाने वाली इंडस्ट्री को चीन से विशेष ग्लास ट्यूब मंगानी पड़ती है। अंबाला साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन के सदस्य एमपी लांबा बताते हैं कि ग्लास ट्यूबों को चीन से मंगाने पर भारी भरकम इंपोर्ट ड्यूटी देनी पड़ रही है। इससे तैयार माल की लागत इतनी बढ़ गई है कि भारतीय कारोबारी बाजार में टिक नहीं पा रहे हैं। अगर सरकार बजट में ग्लास ट्यूब निर्माण के लिए क्लस्टर बनाने की घोषणा करती है तो इस इंडस्ट्री से जुड़े कारोबारियों को काफी राहत मिलेगी। उन्होंने बताया कि पिछली बार केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने असीमा ने यह मांग रखी थी, मगर इस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। ब्यूरो
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साइंस कारोबारियों ने सरकार से बजट में यह रखी मांग


- शिक्षण संस्थानों के लिए जैम पोर्टल की अनिवार्यता खत्म की जाए या कड़े मानक तय हों।

- प्रयोगशालाओं में उपयोग होने वाले ग्लास के उत्पादों को बनाने के लिए कच्चे माल (ग्लास ट्यूब) पर आयात शुल्क कम किया जाए।

- मेक इन इंडिया के तहत स्थानीय निर्माताओं को विशेष प्राथमिकता दी जाए।
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