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सरकारी नियंत्रण में नहीं तो सहकारी समिति के खिलाफ रिट याचिका वैध नहीं : हाईकोर्ट
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- सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान में देरी मात्र के आधार पर सहकारी संस्था को नहीं मान सकते सरकारी निकाय
- राज्य की परिभाषा में लाने के लिए सरकारी नियंत्रण या सार्वजनिक दायित्व साबित होना जरूरी
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि किसी सहकारी समिति के खिलाफ तब तक राज्य के रूप में रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती जब तक यह साबित न हो जाए कि वह सरकार के नियंत्रण में है या सार्वजनिक कार्य कर रही है। सेवानिवृत्ति के लाभों के भुगतान में देरी मात्र से किसी सहकारी संस्था को सरकारी निकाय नहीं माना जा सकता।
सेवानिवृत्त कर्मचारी ने याचिका दाखिल करते हुए हरियाणा से पंजीकृत सहकारी मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसायटी से सेवानिवृत्ति के लाभों के भुगतान में देरी पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह 1975 से लगातार सेवा में रहा और उसकी सेवानिवृत्ति 31 जुलाई 2015 को हुई लेकिन उसके वैध सेवानिवृत्ति के लाभ 13 फरवरी 2018 को जारी किए गए। उसने दावा किया कि बिना किसी उचित कारण के ढाई वर्षों तक भुगतान रोका गया और उसे इसके लिए ब्याज मिलना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मूल प्रश्न यह है कि क्या सहकारी समिति के खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सकती है। सोसायटी ने तर्क दिया कि वह संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ या ‘अन्य प्राधिकरण’ नहीं है। उस पर सरकार का कोई गहरा या व्यापक वित्तीय या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है और वह सरकारी धन से संचालित नहीं होती। हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहा कि सोसायटी सरकारी नियंत्रण में है या सार्वजनिक/वैधानिक कर्तव्य निभाती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, इसलिए मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना ही याचिका खारिज कर दी गई।
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सेवानिवृत्त कर्मचारी ने याचिका दाखिल करते हुए हरियाणा से पंजीकृत सहकारी मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसायटी से सेवानिवृत्ति के लाभों के भुगतान में देरी पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह 1975 से लगातार सेवा में रहा और उसकी सेवानिवृत्ति 31 जुलाई 2015 को हुई लेकिन उसके वैध सेवानिवृत्ति के लाभ 13 फरवरी 2018 को जारी किए गए। उसने दावा किया कि बिना किसी उचित कारण के ढाई वर्षों तक भुगतान रोका गया और उसे इसके लिए ब्याज मिलना चाहिए।
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कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मूल प्रश्न यह है कि क्या सहकारी समिति के खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सकती है। सोसायटी ने तर्क दिया कि वह संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ या ‘अन्य प्राधिकरण’ नहीं है। उस पर सरकार का कोई गहरा या व्यापक वित्तीय या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है और वह सरकारी धन से संचालित नहीं होती। हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहा कि सोसायटी सरकारी नियंत्रण में है या सार्वजनिक/वैधानिक कर्तव्य निभाती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, इसलिए मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना ही याचिका खारिज कर दी गई।