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Chandigarh-Haryana News: विभाजन के समय देश छोड़ने वालों की संपत्ति पर कोर्ट को अधिकार नहीं
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चंडीगढ़। तीन दशक से अधिक समय से चले आ रहे संपत्ति विवाद को विराम देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी संपत्ति को विभाजन के समय देश छोड़ने वाले व्यक्ति (एवैक्यूई) की संपत्ति माना जाए या नहीं यह तय करने का अधिकार सिविल अदालतों को नहीं है। इस महत्वपूर्ण निर्णय के साथ ही हाईकोर्ट ने वर्ष 1993 से लंबित दूसरी अपील को खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता रघुबीर सिंह व अन्य का दावा था कि विवादित भूमि उपभोग अधिकार बंधक के अंतर्गत थी, जिसे वर्ष 1945 में पाकिस्तान चले गए दीदार सिंह के पास गिरवी रखा गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इस प्रकार के बंधक को छुड़ाने (रिडीम) की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं होती, इसलिए वे आज भी भूमि के मालिक और कब्जाधारी हैं। उन्होंने उनका दावा खारिज किए जाने के आदेशों को चुनौती दी थी।
वहीं, राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों ने दलील दी कि संबंधित भूमि को पहले ही एवैक्यूई (प्रवासी) संपत्ति घोषित किया जा चुका है और बाद में इसे तीसरे प्रतिवादी को आवंटित भी कर दिया गया था। न्यायमूर्ति जगमोहन बंसल ने कहा कि यदि किसी संपत्ति को प्रशासन द्वारा एवैक्यूई घोषित किया जा चुका है तो उसके स्वरूप को चुनौती देने वाला कोई भी सिविल मुकदमा विचारणीय नहीं है, चाहे विवाद कितना ही पुराना क्यों न हो। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी सिविल या राजस्व अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई संपत्ति एवैक्यूई है या नहीं। ब्यूरो
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याचिकाकर्ता रघुबीर सिंह व अन्य का दावा था कि विवादित भूमि उपभोग अधिकार बंधक के अंतर्गत थी, जिसे वर्ष 1945 में पाकिस्तान चले गए दीदार सिंह के पास गिरवी रखा गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इस प्रकार के बंधक को छुड़ाने (रिडीम) की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं होती, इसलिए वे आज भी भूमि के मालिक और कब्जाधारी हैं। उन्होंने उनका दावा खारिज किए जाने के आदेशों को चुनौती दी थी।
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वहीं, राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों ने दलील दी कि संबंधित भूमि को पहले ही एवैक्यूई (प्रवासी) संपत्ति घोषित किया जा चुका है और बाद में इसे तीसरे प्रतिवादी को आवंटित भी कर दिया गया था। न्यायमूर्ति जगमोहन बंसल ने कहा कि यदि किसी संपत्ति को प्रशासन द्वारा एवैक्यूई घोषित किया जा चुका है तो उसके स्वरूप को चुनौती देने वाला कोई भी सिविल मुकदमा विचारणीय नहीं है, चाहे विवाद कितना ही पुराना क्यों न हो। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी सिविल या राजस्व अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई संपत्ति एवैक्यूई है या नहीं। ब्यूरो