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पार्किंसंस: लक्षण दिखते ही हो जाएं सतर्क
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हिसार। आज विश्व पार्किंसंस दिवस के अवसर पर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रमेश वर्मा ने कहा कि उनकी ओपीडी में प्रतिदिन करीब 10 प्रतिशत मरीज पार्किंसंस रोग से ग्रस्त आ रहे हैं। डॉ. वर्मा के अनुसार यदि समय रहते इस बीमारी के लक्षणों को पहचाना जाए तो दवाओं और थैरेपी के माध्यम से रोग की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है।
पार्किंसंस दिमाग से जुड़ी एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसकी शुरुआत हाथ-पैर कांपने, मांसपेशियों में अकड़न और चाल धीमी होने से होती है। समय के साथ, मरीज की याददाश्त कमजोर हो जाती है और व्यवहार में बदलाव आ जाता है। मरीज को बिस्तर पर आकर रहना पड़ता है।
बीमारी का कारण
यह बीमारी तब होती है जब दिमाग में डोपामिन हार्मोन की कमी हो जाती है, जिससे दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। पार्किंसंस आमतौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखा जाता है, लेकिन अब यह बीमारी युवाओं में भी देखी जा रही है। 20 से 30 वर्ष के युवा भी इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं।
बचाव के उपाय
हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज और ओमेगा-3 वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
उच्च रक्तचाप, शुगर या थायरॉयड को नियंत्रित रखें।
मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें।
नियमित रूप से व्यायाम करें और फिजियोथैरेपी का सहारा लें।
तनाव कम करने के लिए ध्यान लगाएं और 7-8 घंटे की नींद लें।
मानसिक गतिविधियों में संलग्न रहें।
चिकित्सक की सलाह से ली गई दवाएं डोपामिन की कमी को पूरा करने में मदद करती हैं, जबकि डीबीएस सर्जरी एक अन्य विकल्प है।
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पार्किंसंस दिमाग से जुड़ी एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसकी शुरुआत हाथ-पैर कांपने, मांसपेशियों में अकड़न और चाल धीमी होने से होती है। समय के साथ, मरीज की याददाश्त कमजोर हो जाती है और व्यवहार में बदलाव आ जाता है। मरीज को बिस्तर पर आकर रहना पड़ता है।
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बीमारी का कारण
यह बीमारी तब होती है जब दिमाग में डोपामिन हार्मोन की कमी हो जाती है, जिससे दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। पार्किंसंस आमतौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखा जाता है, लेकिन अब यह बीमारी युवाओं में भी देखी जा रही है। 20 से 30 वर्ष के युवा भी इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं।
बचाव के उपाय
हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज और ओमेगा-3 वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
उच्च रक्तचाप, शुगर या थायरॉयड को नियंत्रित रखें।
मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें।
नियमित रूप से व्यायाम करें और फिजियोथैरेपी का सहारा लें।
तनाव कम करने के लिए ध्यान लगाएं और 7-8 घंटे की नींद लें।
मानसिक गतिविधियों में संलग्न रहें।
चिकित्सक की सलाह से ली गई दवाएं डोपामिन की कमी को पूरा करने में मदद करती हैं, जबकि डीबीएस सर्जरी एक अन्य विकल्प है।