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Jhajjar-Bahadurgarh News: पाकिस्तान से शरणार्थी बनकर आए, अब 'बर्फी' से पहचान
संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़
Updated Thu, 18 Jun 2026 05:31 PM IST
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-फोटो 89 : शहर के शंकर मार्केट मेें स्थित सरदार जी बर्फी वाले की दुकान। संवाद
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पंकज रोहिल्ला
बहादुरगढ़। विभाजन की त्रासदी झेलकर पाकिस्तान से भारत आए एक परिवार ने संघर्ष, मेहनत और लगन के दम पर ऐसी पहचान बनाई कि आज उनकी बनाई बर्फी देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंच रही है। उनकी दुकान सरदार जी बर्फी वाले के नाम से मशहूर है। परिवार के सदस्य हरीश कुमार ने बताया कि उनके ससुर अजीत सिंह वर्ष 1949 में पाकिस्तान के लायलपुर जिले के गांव टोबा टेक सिंह क्षेत्र से भारत आए थे।
विभाजन के बाद परिवार को अपना घर-बार छोड़कर भारत आना पड़ा। 1 जनवरी 1949 को भारत पहुंचने के बाद परिवार ने पहले अमृतसर साहिब में शरण ली। कुछ समय तक वे भटिंडा में भी रहे और फिर बहादुरगढ़ आकर बस गए। शुरुआती दिनों में जीवन यापन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा लेकिन अजीत सिंह ने हार नहीं मानी।
हरीश कुमार ने बताया कि बहादुरगढ़ में अजीत सिंह ने सबसे पहले पुराना बस अड्डा क्षेत्र में चाय बेचने शुरू किया। उस समय चाय के लिए इस्तेमाल होने वाले दूध की बची मात्रा को व्यर्थ जाने से बचाने के लिए उन्होंने उससे खोया बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे खोए से बर्फी तैयार की जाने लगी। लोगों को इसका स्वाद पसंद आया तो मिठाई का यह छोटा प्रयास कारोबार में बदल गया।
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बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने बाद में शहर की शंकर मार्केट में अपनी दुकान शुरू की। वर्षों की मेहनत और गुणवत्ता के प्रति समर्पण का परिणाम यह रहा कि वर्ष 1994 में मिठाई के कारोबार को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया। आज उनकी बनाई बर्फी बहादुरगढ़ की पहचान बन चुकी है। परिवार का कहना है कि उनकी बर्फी की खासियत यह है कि यह करीब पांच दिनों तक अच्छी स्थिति में रहती है। यही कारण है कि शहर में आने वाले लोग इसे अपने साथ देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाते हैं।
कई लोग विदेश जाने के दौरान भी इसे साथ लेकर जाते हैं, जिससे बहादुरगढ़ की यह मिठास विदेशों तक पहुंच रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी मिठाई की कोई अन्य शाखा नहीं है। वर्षों पुरानी यह दुकान आज भी अपने मूल स्थान और पारंपरिक स्वाद के लिए जानी जाती है, जो संघर्ष से सफलता तक की कहानी बयां करती है।
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बहादुरगढ़। विभाजन की त्रासदी झेलकर पाकिस्तान से भारत आए एक परिवार ने संघर्ष, मेहनत और लगन के दम पर ऐसी पहचान बनाई कि आज उनकी बनाई बर्फी देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंच रही है। उनकी दुकान सरदार जी बर्फी वाले के नाम से मशहूर है। परिवार के सदस्य हरीश कुमार ने बताया कि उनके ससुर अजीत सिंह वर्ष 1949 में पाकिस्तान के लायलपुर जिले के गांव टोबा टेक सिंह क्षेत्र से भारत आए थे।
विभाजन के बाद परिवार को अपना घर-बार छोड़कर भारत आना पड़ा। 1 जनवरी 1949 को भारत पहुंचने के बाद परिवार ने पहले अमृतसर साहिब में शरण ली। कुछ समय तक वे भटिंडा में भी रहे और फिर बहादुरगढ़ आकर बस गए। शुरुआती दिनों में जीवन यापन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा लेकिन अजीत सिंह ने हार नहीं मानी।
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हरीश कुमार ने बताया कि बहादुरगढ़ में अजीत सिंह ने सबसे पहले पुराना बस अड्डा क्षेत्र में चाय बेचने शुरू किया। उस समय चाय के लिए इस्तेमाल होने वाले दूध की बची मात्रा को व्यर्थ जाने से बचाने के लिए उन्होंने उससे खोया बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे खोए से बर्फी तैयार की जाने लगी। लोगों को इसका स्वाद पसंद आया तो मिठाई का यह छोटा प्रयास कारोबार में बदल गया।
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बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने बाद में शहर की शंकर मार्केट में अपनी दुकान शुरू की। वर्षों की मेहनत और गुणवत्ता के प्रति समर्पण का परिणाम यह रहा कि वर्ष 1994 में मिठाई के कारोबार को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया। आज उनकी बनाई बर्फी बहादुरगढ़ की पहचान बन चुकी है। परिवार का कहना है कि उनकी बर्फी की खासियत यह है कि यह करीब पांच दिनों तक अच्छी स्थिति में रहती है। यही कारण है कि शहर में आने वाले लोग इसे अपने साथ देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाते हैं।
कई लोग विदेश जाने के दौरान भी इसे साथ लेकर जाते हैं, जिससे बहादुरगढ़ की यह मिठास विदेशों तक पहुंच रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी मिठाई की कोई अन्य शाखा नहीं है। वर्षों पुरानी यह दुकान आज भी अपने मूल स्थान और पारंपरिक स्वाद के लिए जानी जाती है, जो संघर्ष से सफलता तक की कहानी बयां करती है।