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Kaithal News: वेंटिलेटर पर सरकारी एंबुलेंस, मरीजों की जान जोखिम में

संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल Updated Sun, 08 Feb 2026 12:18 AM IST
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Government ambulances on ventilators, patients' lives at risk
नागरिक अस्पताल के सामने खड़ी निजी एंबुलेंस। संवाद
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नरेंद्र पंडित
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कैथल। जब किसी गंभीर मरीज की सांसें थमने को होती हैं, तब सरकारी एंबुलेंस ही उसकी आखिरी उम्मीद बनती है। लेकिन जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई यह है कि मरीजों को जीवनदान देने वाली अधिकांश एंबुलेंस खुद वेंटिलेटर पर चल रही हैं। जिले के बेड़े में शामिल कुल 20 एंबुलेंस में से 10 अपनी निर्धारित मियाद पूरी कर चुकी हैं, इसके बावजूद मजबूरी या लापरवाही के चलते इन्हें सड़कों पर दौड़ाया जा रहा है।


नियमानुसार किसी भी एंबुलेंस को पांच वर्ष या तीन लाख किलोमीटर चलने के बाद सेवा से हटा दिया जाना चाहिए, लेकिन जिले में इस नियम की खुलेआम अनदेखी हो रही है। आधी से अधिक एंबुलेंस तीन लाख किलोमीटर से ज्यादा चल चुकी हैं। इनके इंजन जवाब दे चुके हैं, टायर घिस चुके हैं और ब्रेकडाउन का खतरा हर समय मंडराता रहता है। ये गाड़ियां कभी भी, कहीं भी बीच रास्ते में दम तोड़ सकती हैं।
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विडंबना यह है कि मरीजों और उनके तीमारदारों को यह तक पता नहीं होता कि जिस एंबुलेंस में वे जीवन की आस लगाए बैठे हैं, वह खुद अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। मजबूर मरीज भगवान भरोसे सफर करने को विवश हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी मूक दर्शक बने हुए हैं।



रास्ते में खराब हुई तो पालनहार कौन?
सबसे बड़ा सवाल मरीजों की सुरक्षा को लेकर खड़ा होता है। यदि किसी गंभीर मरीज को लेकर एंबुलेंस अस्पताल की ओर जा रही हो और बीच रास्ते में वह खराब हो जाए, तो उस मरीज की जिम्मेदारी कौन लेगा? जर्जर हो चुकी इन गाड़ियों की मरम्मत पर हर महीने लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि इन्हीं पैसों से नई एंबुलेंस की किश्तें चुकाई जा सकती हैं।



पुराने कलपुर्जों और बार-बार होने वाले ब्रेकडाउन के कारण ये एंबुलेंस न तो जरूरी रफ्तार पकड़ पाती हैं और न ही इनमें लगे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पूरी क्षमता से काम कर पाते हैं। दूसरी ओर सरकारी एंबुलेंस की कमी का फायदा निजी एंबुलेंस संचालक उठा रहे हैं, जो अस्पतालों के बाहर खड़ी होकर मजबूर मरीजों से मनमाना किराया वसूल रहे हैं।



ये हैं मुख्य समस्याएं



समय पर न पहुंचना : कमजोर इंजन के कारण एंबुलेंस तेज गति से नहीं चल पातीं।



बीच रास्ते में धोखा : तीन लाख किमी से अधिक चलने के बाद पुर्जे जवाब दे चुके हैं।



असुविधाजनक सफर : झटकों से गंभीर मरीजों की हालत और बिगड़ जाती है।



रखरखाव पर फिजूलखर्ची : नई एंबुलेंस की बजाय पुरानी गाड़ियों पर मरम्मत का बोझ।



ऐसे समझें जिले की एंबुलेंस व्यवस्था



जिले में कुल 20 एंबुलेंस उपलब्ध



इनमें से 10 एंबुलेंस की मियाद पूरी



4 सीएचसी, 2 उप मंडल अस्पताल, 5 पीएचसी और 7 नागरिक अस्पतालों में तैनात



सभी एंबुलेंस डायल 112 से जुड़ी


रोजाना औसतन 45 कॉल आती हैं



एंबुलेंस गाड़ियों की स्थिति



6 गाड़ियां : वर्ष 2018 मॉडल



4 गाड़ियां : वर्ष 2019 मॉडल



9 गाड़ियां : वर्ष 2021 मॉडल



1 गाड़ी : वर्ष 2022 मॉडल



नोट : 2018 और 2019 मॉडल की एंबुलेंस नियमानुसार मियाद पूरी कर चुकी हैं।



ये कहते हैं अधिकारी



सिविल सर्जन डॉ. रेनू चावला का कहना है कि जिले में मरीजों को सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से एंबुलेंस संचालित की जा रही हैं। सभी एंबुलेंस कार्यशील स्थिति में हैं। यदि कभी कोई छोटी-मोटी तकनीकी दिक्कत आती है तो उसे तुरंत ठीक करवा लिया जाता है। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से नई एंबुलेंस मिलने की प्रक्रिया चल रही है और इसकी मांग पहले ही भेजी जा चुकी है।
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