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Kaithal News: नागपंचमी पर घरों के दरवाजे पर नाग के चित्र बनाकर की पूजा
Tue, 18 Aug 2026 12:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Tue, 18 Aug 2026 12:46 AM IST
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खट्वांगेश्वर मंदिर में भोले बाबा का अभिषेक करते श्रद्धालु। संवाद
- फोटो : 1
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संवाद न्यूज एजेंसी
कलायत। नगर में मंगलवार को परंपरागत नागपंचमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। घरों के दरवाजे पर नागों के चित्र बनाकर उनकी पूजा-अर्चना की गई। नागपंचमी के मौके पर भगवान भोलेनाथ के साथ शेषनाग को भी दूध से स्नान कराकर हल्दी, कुमकुम, नैवेद्य अर्पित किए गए।
शिव मंदिरों में सावन मास के तीसरे सोमवार व नागपंचमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। खंडालवा के खट्वांगेश्वर मंदिर, कपिल मुनि मंदिर परिसर में स्थित शिव मंदिर, ग्यारह रुद्री शिव मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। श्रद्धालुओं ने भोले बाबा का जल, गन्ने के रस, तेल आदी से अभिषेक के साथ-साथ कालसर्प दोष करवाने के लिए भी अनुष्ठान किया।
अनेक स्थानों पर भोले बाबा का महारुद्राभिषेक भी किया गया। प्राचीन काल से ही नागपंचमी का त्योहार श्रावण माह की शुक्लपक्ष की पंचमी को मनाया जाता रहा है। इस त्योहार में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए विशेष आराधना का महत्व बताया गया है।
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प्राचीन काल से चल रही नाग पूजा : पं. विशाल
पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया की सनातन परंपरा में नाग पूजा की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। दुनियाभर में तमाम तरह के सांपों की प्रजाति पाई जाती है। यदि पुराणों की बात करें तो उसमें कहीं पर 78 तो कहीं पर 68 प्रकार के नागों का उल्लेख मिलता है। इन तमाम नागों में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोट, शंखू, कालिया, धृतराष्ट्र आदि नाग का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में नाग मंदिर हैं जहां नाग देवता की पूजा अलग-अलग मान्यताओं के आधार पर की जाती है।
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महाभारत काल से जुड़ी नाग देवता की कथा
पंडित ने बताया कि नाग देवता से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई। इसके अनुसार जब राजा परीक्षित की तक्षक नाग के काटने से मृत्यु हुई तो उनके पुत्र राजा जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प जाति का सर्वनाश करने का निर्णय लिया। उन्हें समाप्त करने के लिए बड़ा यज्ञ करवाया। जब एक-एक करके नाग उस अग्नि में जाकर खत्म होने लगे तब आस्तिक मुनि ने इस यज्ञ को रुकवा कर नागों की रक्षा की थी। मान्यता है कि तभी से नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई।
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कलायत। नगर में मंगलवार को परंपरागत नागपंचमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। घरों के दरवाजे पर नागों के चित्र बनाकर उनकी पूजा-अर्चना की गई। नागपंचमी के मौके पर भगवान भोलेनाथ के साथ शेषनाग को भी दूध से स्नान कराकर हल्दी, कुमकुम, नैवेद्य अर्पित किए गए।
शिव मंदिरों में सावन मास के तीसरे सोमवार व नागपंचमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। खंडालवा के खट्वांगेश्वर मंदिर, कपिल मुनि मंदिर परिसर में स्थित शिव मंदिर, ग्यारह रुद्री शिव मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। श्रद्धालुओं ने भोले बाबा का जल, गन्ने के रस, तेल आदी से अभिषेक के साथ-साथ कालसर्प दोष करवाने के लिए भी अनुष्ठान किया।
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अनेक स्थानों पर भोले बाबा का महारुद्राभिषेक भी किया गया। प्राचीन काल से ही नागपंचमी का त्योहार श्रावण माह की शुक्लपक्ष की पंचमी को मनाया जाता रहा है। इस त्योहार में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए विशेष आराधना का महत्व बताया गया है।
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प्राचीन काल से चल रही नाग पूजा : पं. विशाल
पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया की सनातन परंपरा में नाग पूजा की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। दुनियाभर में तमाम तरह के सांपों की प्रजाति पाई जाती है। यदि पुराणों की बात करें तो उसमें कहीं पर 78 तो कहीं पर 68 प्रकार के नागों का उल्लेख मिलता है। इन तमाम नागों में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोट, शंखू, कालिया, धृतराष्ट्र आदि नाग का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में नाग मंदिर हैं जहां नाग देवता की पूजा अलग-अलग मान्यताओं के आधार पर की जाती है।
महाभारत काल से जुड़ी नाग देवता की कथा
पंडित ने बताया कि नाग देवता से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई। इसके अनुसार जब राजा परीक्षित की तक्षक नाग के काटने से मृत्यु हुई तो उनके पुत्र राजा जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प जाति का सर्वनाश करने का निर्णय लिया। उन्हें समाप्त करने के लिए बड़ा यज्ञ करवाया। जब एक-एक करके नाग उस अग्नि में जाकर खत्म होने लगे तब आस्तिक मुनि ने इस यज्ञ को रुकवा कर नागों की रक्षा की थी। मान्यता है कि तभी से नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई।

खट्वांगेश्वर मंदिर में भोले बाबा का अभिषेक करते श्रद्धालु। संवाद- फोटो : 1