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Karnal News: किले बने खंडहर, टीले हुए ढेर और प्लॉट में कैद हुई कोस मीनार
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तरावड़ी में पृथ्वीराज चौहान का किला।
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जितेंद्र नरवाल
करनाल। इतिहास और विरासत के लिए पहचानी जाने वाली कर्णनगरी की धरोहरें उपेक्षा की मार झेल रही हैं। हजारों साल पुराने किले और मुगलकालीन स्मारक अब खंडहर में तब्दील होेते जा रहे हैं। कहीं अतिक्रमण ने इनकी पहचान मिटा दी है तो कहीं देखभाल के अभाव में धरोहरें मिट्टी में मिलती जा रही हैं। शहर में कर्ण के नाम पर कर्ण लेक और कर्ण पार्क जैसे आधुनिक स्थल जरूर विकसित हुए हैं लेकिन प्राचीन धरोहरों के संरक्षण की स्थिति बेहद निराशाजनक है।
प्लॉटों के बीच में खड़ी कोस मीनार
सेक्टर-12 पार्ट-2 में एचएसवीपी की ओर से विकसित प्लॉटों के बीच एक कोस मीनार खड़ी है। यह मीनार मुगलकालीन मार्ग संकेतक के रूप में बनाई गई थी। इसके आसपास प्लॉट काट दिए गए हैं। मीनार का समुचित संरक्षण नहीं हो सका है। शहर में और भी कोस मीनार हैं। एक मीनार रोड के बीचोंबीच है जबकि एक अन्य जीटी रोड के बीच स्थित है।
शीशमहल भी हो गया बदहाल
इंद्री स्थित ऐतिहासिक शीशमहल भी बदहाली का शिकार है। यह किला मुगलकाल के बाद का माना जाता है। कभी इसके परिसर में प्रसिद्ध नौलखा बाग हुआ करता था, जो अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता था। बताया जाता है कि यहां नौ लाख तरह के अलग-अलग पेड़-पौधे हुआ करते थे। किले के नाम पर अब केवल जर्जर दीवारें, गुंबद और टूटी खिड़कियां बची हैं। झाड़ियों से घिरे इस परिसर की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है।
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जरासंध के टीले का संरक्षण नहीं
असंध में स्थित जरासंध का टीले का भी संरक्षण नहीं हो रहा। स्थानीय लोग यहां पशु बांधते हैं। उपले थापे जाते हैं। टीले के चारों ओर अवैध निर्माण हो चुके हैं। मान्यता है कि यह स्थल महाभारतकालीन राजा जरासंध से जुड़ा हुआ है। पुरातात्विक दृष्टि से इसे करीब 2000 वर्ष पुराना कुषाणकालीन बौद्ध स्तूप बताया जाता है। संरक्षण के नाम पर केवल रेलिंग लगा दी गई है।
पृथ्वीराज चौहान का किला पर अतिक्रमण
प्राचीन तराईन और अब तरावड़ी में स्थित पृथ्वीराज चौहान का किला भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। यह किला सैनिकों के विश्राम के लिए बनाया गया था। इसकी दीवारें जर्जर हो चुकी हैं। किले के आसपास ही नहीं बल्कि उसके अंदर तक लोगों ने अवैध निर्माण कर लिए हैं। इस ऐतिहासिक धरोहर का स्वरूप पूरी तरह बिगड़ चुका है।
संरक्षण के दावे, जमीन पर लापरवाही -
शिक्षाविद एवं पूर्व प्रिंसिपल डॉ. रामजी लाल और डॉ. प्रवीण भारद्वाज का कहना है कि सरकार और संबंधित विभाग समय-समय पर धरोहरों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के दावे तो करते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती। न तो अतिक्रमण हटाया जा रहा है और न ही इन ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण के लिए कोई ठोस योजना लागू हो पा रही है। अगर समय रहते इन धरोहरों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में ही इनका नाम पढ़ पाएंगी।
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करनाल। इतिहास और विरासत के लिए पहचानी जाने वाली कर्णनगरी की धरोहरें उपेक्षा की मार झेल रही हैं। हजारों साल पुराने किले और मुगलकालीन स्मारक अब खंडहर में तब्दील होेते जा रहे हैं। कहीं अतिक्रमण ने इनकी पहचान मिटा दी है तो कहीं देखभाल के अभाव में धरोहरें मिट्टी में मिलती जा रही हैं। शहर में कर्ण के नाम पर कर्ण लेक और कर्ण पार्क जैसे आधुनिक स्थल जरूर विकसित हुए हैं लेकिन प्राचीन धरोहरों के संरक्षण की स्थिति बेहद निराशाजनक है।
प्लॉटों के बीच में खड़ी कोस मीनार
सेक्टर-12 पार्ट-2 में एचएसवीपी की ओर से विकसित प्लॉटों के बीच एक कोस मीनार खड़ी है। यह मीनार मुगलकालीन मार्ग संकेतक के रूप में बनाई गई थी। इसके आसपास प्लॉट काट दिए गए हैं। मीनार का समुचित संरक्षण नहीं हो सका है। शहर में और भी कोस मीनार हैं। एक मीनार रोड के बीचोंबीच है जबकि एक अन्य जीटी रोड के बीच स्थित है।
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शीशमहल भी हो गया बदहाल
इंद्री स्थित ऐतिहासिक शीशमहल भी बदहाली का शिकार है। यह किला मुगलकाल के बाद का माना जाता है। कभी इसके परिसर में प्रसिद्ध नौलखा बाग हुआ करता था, जो अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता था। बताया जाता है कि यहां नौ लाख तरह के अलग-अलग पेड़-पौधे हुआ करते थे। किले के नाम पर अब केवल जर्जर दीवारें, गुंबद और टूटी खिड़कियां बची हैं। झाड़ियों से घिरे इस परिसर की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है।
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जरासंध के टीले का संरक्षण नहीं
असंध में स्थित जरासंध का टीले का भी संरक्षण नहीं हो रहा। स्थानीय लोग यहां पशु बांधते हैं। उपले थापे जाते हैं। टीले के चारों ओर अवैध निर्माण हो चुके हैं। मान्यता है कि यह स्थल महाभारतकालीन राजा जरासंध से जुड़ा हुआ है। पुरातात्विक दृष्टि से इसे करीब 2000 वर्ष पुराना कुषाणकालीन बौद्ध स्तूप बताया जाता है। संरक्षण के नाम पर केवल रेलिंग लगा दी गई है।
पृथ्वीराज चौहान का किला पर अतिक्रमण
प्राचीन तराईन और अब तरावड़ी में स्थित पृथ्वीराज चौहान का किला भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। यह किला सैनिकों के विश्राम के लिए बनाया गया था। इसकी दीवारें जर्जर हो चुकी हैं। किले के आसपास ही नहीं बल्कि उसके अंदर तक लोगों ने अवैध निर्माण कर लिए हैं। इस ऐतिहासिक धरोहर का स्वरूप पूरी तरह बिगड़ चुका है।
संरक्षण के दावे, जमीन पर लापरवाही -
शिक्षाविद एवं पूर्व प्रिंसिपल डॉ. रामजी लाल और डॉ. प्रवीण भारद्वाज का कहना है कि सरकार और संबंधित विभाग समय-समय पर धरोहरों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के दावे तो करते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती। न तो अतिक्रमण हटाया जा रहा है और न ही इन ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण के लिए कोई ठोस योजना लागू हो पा रही है। अगर समय रहते इन धरोहरों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में ही इनका नाम पढ़ पाएंगी।

तरावड़ी में पृथ्वीराज चौहान का किला।