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Kurukshetra News: गर्दन की हड्डी टूटने से हुई महंत की मौत, आठ सीटी स्कैन से जाना गया मौत का कारण

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 22 Jun 2026 02:37 AM IST
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Mahant died from a broken neck; cause of death determined through eight CT scans.
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कुरुक्षेत्र। कस्बा बाबैन के प्राचीन उप ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव मंदिर के 108 फीट ऊंचा गुंबद के मलबे के नीचे दबकर 74 वर्षीय महंत नटराजन गिरी की मौत के बाद उनके शव का वर्चुअल तरीके से पोस्टमार्टम करवाया गया। नटराजन गिरी के पोस्टमार्टम के लिए लोकनायक जयप्रकाश जिला नागरिक अस्पताल में उनके शव का सात से आठ बार सीटी स्कैन किया गया। पोस्टमार्टम में सामने आया कि उनकी मौत मलबा गिरने से गर्दन व अन्य जगहों की हड्डी टूटने की वजह से हुई है।

यह जिले में पहली बार था, जब किसी शव का वर्चुअल तरीके से पोस्टमार्टम हुआ हो। इसके पीछे धार्मिक व भावनात्मक कारण रहे। क्योंकि महंत के गिरी समुदाय में मान्यता है कि महंत के शव जलाया व दफनाया नहीं जाता। बल्कि उन्हें समाधि दी जाती है। इसलिए उनके मृत शरीर के साथ किसी प्रकार की चीरा-फाड़ी नहीं करने दी जाती है।
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जब पुलिस ने मंदिर में पहुंचकर पोस्टमार्टम करवाने के लिए शव को अपने कब्जे लिया तो अन्य महंतों ने धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध बताया। इसके बाद पुलिस ने फॉरेंसिक विशेषज्ञों व कानूनी जानकारों से सलाह लेने के बाद महंत समाज के लोगों को समझाया कि नटराजन गिरी के शव पर किसी तरह की चीर-फाड नहीं की जाएगी और तकनीक के माध्यम से शरीर के अंदर की फोटो लिए जांएगें।
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तब जाकर महंत समाज के लोग शव का पोस्टमार्टम करवाने के लिए माने और पुलिस महंत के शव को मोर्चरी में ले जाने की बजाय सीधा अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग में सीटी स्कैन कक्ष में पहुंची। जहां रेडियोलॉजिस्ट व फॉरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. नरेश सैनी ने शव के आठ के करीब सीटी स्कैन करवाए ताकि पता चल सके की मौत की असल वजह क्या रही।


यह होती है वर्चुअल अटॉप्सी
वर्चुअल अटॉप्सी को वर्चुअल पोस्टमॉर्टम भी कहा जाता है। आमतौर पर पोस्टमार्टम में शरीर में कई कट लगाकर अंदरूनी हिस्सों की की जांच की जाती है, लेकिन वर्चुअल पोस्टमार्टम में ऐसा नहीं होता है। इसमें तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे शव को चीरने या काटने की जरूरत नहीं होती है। चिकित्सक इस टेक्नोलॉजी से ही सीटी स्कैन, एमआरआई, एक्स रे और डिजिटल इमेजिंग की मदद से शरीर के अंदरूनी हिस्सों की जांच करते हैं। यह एक तरह की रेडियोलॉजिकल जांच होती है, जिससे अंदरूनी चोट, खून के थक्के, फ्रैक्चर या अंगों में आई गड़बड़ी का पता लगाया जाता है।


वर्चुअल अटॉप्सी की रिपोर्ट होती है डिजिटल
फॉरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. नरेश सैनी ने बताया कि वर्चुअल अटॉप्सी से मिलने वाली रिपोर्ट डिजिटल होती है, जिसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। अगर मौत का कारण किसी नस में ब्लॉकेज है तो रिपोर्ट में उस नस की 3 डी इमेज होती है। इसमें पहले पूरे शरीर की इमेज फिर बॉडी पार्ट और बाद में उस नस की क्लोजअप इमेज होती है। वर्चुअल अटॉप्सी डिजिटल सबूत के तौर पर अदालत में भी मजबूत प्रमाण के तौर पर पेश की जा सकती है। भारत में वर्चुअल अटॉप्सी की शुरुआत सबसे पहले 2021 में एम्स दिल्ली में हुई थी। इसके बाद यह सुविधा अब देश के कई अस्पतालों में मौजूद है।


धार्मिक व अन्य भावनाओं को ध्यान में रखकर विशेष मामलों में की जाती है वर्चुअल अटॉप्सी
डॉ. नरेश सैनी ने बताया कि वर्चुअल अटॉप्सी हर मामले में नहीं की जा सकती है। कई मामलों में परिवार पोस्टमार्टम से एतराज जताते हैं और शव के साथ चीरा-फाड़ी के खिलाफ हो जाता है। वहीं कई मामलों में धार्मिक व अन्य भावनाएं आड़े आ जाती है, जैसे महंत नटराजन के मामले में कि समाधि देने वाले शरीर के साथ चीरा-फाड़ी नहीं की जा सकती तो वर्चुअल अटॉप्सी की जा सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि यह भी कुछ विशेष परिस्थितियों में की जाती है। अगर किसी मामले में विसरा व अन्य जांच करना जरूरी हो जैसे जहर खाने के मामले में तो नार्मल अटॉप्सी करनी पड़ती है।
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