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भारत में लोकतांत्रिक और सांविधानिक व्यवस्था, ब्रिटिश शासनकाल जैसी मनमानी अस्वीकार्य: हाईकोर्ट
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चंडीगढ़। पंजाब में युवाओं को आपराधिक मामलों में यांत्रिक तरीके से फंसाने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि केवल गुप्त सूचना या सह-आरोपी के बयान के आधार पर एफआईआर दर्ज न की जाए। हाईकोर्ट ने कहा कि भारत लोकतांत्रिक और सांविधानिक व्यवस्था है यहां ब्रिटिश शासनकाल जैसी मनमानी अस्वीकार्य है।
जस्टिस संजय वशिष्ठ ने कहा कि 18 से 20 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं को बिना स्वतंत्र पुष्टि के आरोपी बनाना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है। कम उम्र के व्यक्ति को केवल सह-आरोपी के खुलासे के आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता जब तक उसके समर्थन में कोई स्वतंत्र साक्ष्य न हो। इस प्रथा की तुलना ब्रिटिश शासनकाल से करते हुए कहा कि उस समय पुलिस मनमाने ढंग से लोगों को केवल आरोपों या अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर फंसा देती थी।
कोर्ट ने राज्य पुलिस को निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज करने से पहले तथ्यों का उचित सत्यापन किया जाए, कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए और केवल गुप्त सूचना के आधार पर कार्रवाई न हो। विशेष रूप से हथियार बरामदगी वाले मामलों में जहां अक्सर बरामदगी के आधार पर ही धाराएं लगाई जाती हैं, अदालत ने अतिरिक्त सतर्कता बरतने को कहा है।
अदालत ने राज्य सरकार से अपेक्षा जताई कि जांच अधिकारियों को इस सिद्धांत के प्रति संवेदनशील बनाया जाए कि बिना ठोस साक्ष्य के युवाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति राज्य के डीजीपी को भेजने का निर्देश दिया ताकि इन दिशा-निर्देशों का पालन पूरे पुलिस तंत्र में सुनिश्चित किया जा सके।
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जस्टिस संजय वशिष्ठ ने कहा कि 18 से 20 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं को बिना स्वतंत्र पुष्टि के आरोपी बनाना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है। कम उम्र के व्यक्ति को केवल सह-आरोपी के खुलासे के आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता जब तक उसके समर्थन में कोई स्वतंत्र साक्ष्य न हो। इस प्रथा की तुलना ब्रिटिश शासनकाल से करते हुए कहा कि उस समय पुलिस मनमाने ढंग से लोगों को केवल आरोपों या अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर फंसा देती थी।
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कोर्ट ने राज्य पुलिस को निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज करने से पहले तथ्यों का उचित सत्यापन किया जाए, कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए और केवल गुप्त सूचना के आधार पर कार्रवाई न हो। विशेष रूप से हथियार बरामदगी वाले मामलों में जहां अक्सर बरामदगी के आधार पर ही धाराएं लगाई जाती हैं, अदालत ने अतिरिक्त सतर्कता बरतने को कहा है।
अदालत ने राज्य सरकार से अपेक्षा जताई कि जांच अधिकारियों को इस सिद्धांत के प्रति संवेदनशील बनाया जाए कि बिना ठोस साक्ष्य के युवाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति राज्य के डीजीपी को भेजने का निर्देश दिया ताकि इन दिशा-निर्देशों का पालन पूरे पुलिस तंत्र में सुनिश्चित किया जा सके।