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Panchkula News: लोकपाल पद खाली क्यों, पंजाब सरकार से हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
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चंडीगढ़। पंजाब में लोकपाल का पद पर लंबे समय से खाली होने को लेकर दाखिल याचिका पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए अब पंजाब सरकार को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजय बेरी की खंडपीठ ने सरकार को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
जनहित याचिका में हाईकोर्ट को बताया गया कि लोकपाल का पद 8 अक्तूबर 2025 से खाली है। अब तक नियुक्ति प्रक्रिया शुरू तक नहीं की गई है। लोकपाल एक स्वतंत्र मंच है जहां उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा संभव होता है लेकिन छह महीने से अधिक समय से यह संस्था निष्क्रिय पड़ी है जिससे राज्य के भ्रष्टाचार विरोधी ढांचे में पूर्ण शून्य की स्थिति बन गई है।
याचिकाकर्ता ने हाल के समय में सामने आए भ्रष्टाचार, सरकारी ठेकों में अनियमितताओं, भर्ती घोटालों और अवैध खनन जैसे मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि लोकपाल के अभाव में आम नागरिकों के पास उच्च अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने का कोई प्रभावी और स्वतंत्र मंच नहीं बचा है।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता विशाल मेहता ने आरोप लगाया कि लोकपाल का पद खाली रहने से राज्य का वैधानिक भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र निष्क्रिय हो गया है। यह स्थिति न केवल पंजाब लोकपाल अधिनियम, 1996 के उद्देश्य को विफल करती है बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों विशेषकर अनुच्छेद 14 और 21 का भी उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता ने उल्लेख किया कि राज्य सरकार ने पहले स्टेट विजिलेंस कमीशन को यह कहते हुए समाप्त कर दिया था कि लोकपाल संस्था को मजबूत बनाया जाएगा और इसे मुख्य भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र के रूप में विकसित किया जाएगा। बावजूद इसके अब तक नियुक्ति की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
याचिका में आम आदमी पार्टी के चुनावी वादों और मुख्यमंत्री भगवंत मान के बयानों का हवाला देते हुए कहा गया कि जन लोकपाल को सशक्त बनाने का आश्वासन दिया गया था लेकिन व्यवहार में यह वादा पूरा नहीं हुआ।
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जनहित याचिका में हाईकोर्ट को बताया गया कि लोकपाल का पद 8 अक्तूबर 2025 से खाली है। अब तक नियुक्ति प्रक्रिया शुरू तक नहीं की गई है। लोकपाल एक स्वतंत्र मंच है जहां उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा संभव होता है लेकिन छह महीने से अधिक समय से यह संस्था निष्क्रिय पड़ी है जिससे राज्य के भ्रष्टाचार विरोधी ढांचे में पूर्ण शून्य की स्थिति बन गई है।
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याचिकाकर्ता ने हाल के समय में सामने आए भ्रष्टाचार, सरकारी ठेकों में अनियमितताओं, भर्ती घोटालों और अवैध खनन जैसे मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि लोकपाल के अभाव में आम नागरिकों के पास उच्च अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने का कोई प्रभावी और स्वतंत्र मंच नहीं बचा है।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता विशाल मेहता ने आरोप लगाया कि लोकपाल का पद खाली रहने से राज्य का वैधानिक भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र निष्क्रिय हो गया है। यह स्थिति न केवल पंजाब लोकपाल अधिनियम, 1996 के उद्देश्य को विफल करती है बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों विशेषकर अनुच्छेद 14 और 21 का भी उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता ने उल्लेख किया कि राज्य सरकार ने पहले स्टेट विजिलेंस कमीशन को यह कहते हुए समाप्त कर दिया था कि लोकपाल संस्था को मजबूत बनाया जाएगा और इसे मुख्य भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र के रूप में विकसित किया जाएगा। बावजूद इसके अब तक नियुक्ति की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
याचिका में आम आदमी पार्टी के चुनावी वादों और मुख्यमंत्री भगवंत मान के बयानों का हवाला देते हुए कहा गया कि जन लोकपाल को सशक्त बनाने का आश्वासन दिया गया था लेकिन व्यवहार में यह वादा पूरा नहीं हुआ।