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Rewari News: कोर्ट में बीएसएनएल की अपील खारिज, हटाना होगा टाॅवर, हर्जाना भी देना पड़ेगा
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Sat, 10 Jan 2026 12:13 AM IST
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रेवाड़ी। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश जतिन गर्ग की अदालत ने बीएसएनएल टावर विवाद से जुड़े दो सिविल अपील में अहम फैसला सुनाते हुए निचली अदालत (सिविल जज) के निर्णय को सही ठहराया है। अदालत ने बीएसएनएल और देव राज की अपीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि बीएसएनएल की ओर से लीज अवधि समाप्त होने के बाद भी निजी संपत्ति पर टावर बनाए रखना अवैध है।
बीएसएनएल की तरफ से दलील दी गई कि वैकल्पिक स्थान मिलने के बाद ही टावर हटाया जा सकता है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक उपयोग का तर्क निजी अनुबंध की शर्तों से ऊपर नहीं हो सकता।
अदालत ने लीज एग्रीमेंट की धारा 17 का हवाला देते हुए कहा कि लीज समाप्त होने के बाद बीएसएनएल को केवल एक वर्ष का अतिरिक्त समय वैकल्पिक व्यवस्था के लिए दिया गया था, जो 1 मई 2016 को समाप्त हो चुका था। इसके बाद का बीएसएनएल का कब्जा अवैध माना जाएगा।
किराये के भुगतान को लेकर बीएसएनएल की दलीलों को भी अदालत ने स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि निगम यह साबित नहीं कर सका कि 1 मई 2015 के बाद देव राज ने किराया स्वीकार किया हो। ऐसे में लीज के खुद ही नवीनीकरण का कोई आधार नहीं बनता।
बीएसएनएल 1 मई 2015 से अवैध कब्जेदार है और उसे हर्जाना देना होगा। आगे कहा कि 16 जुलाई 2019 के निर्णय और डिक्री और निचली अदालत द्वारा पारित 28 नवंबर 2024 के निर्णय और डिक्री में कोई अवैधता या कमी नहीं है। दोनों अपीलें विफल होती हैं और लागत के संबंध में कोई आदेश दिए बिना खारिज की जाती है।
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देव राज की भी मांग की खारिज
निचली अदालत की ओर से 10 हजार रुपये प्रतिमाह की दर से हर्जाना और 7 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश सही ठहराया गया। वहीं, देव राज की ओर से इसे बढ़ाकर 25 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने दोनों अपीलों को निरस्त करते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा और बीएसएनएल को टावर हटाकर संपत्ति खाली करने के निर्देश दिए।
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वर्ष 2005 में लगाया था टावर
कुतुबपुर निवासी देव राज ने वर्ष 2005 में अपने भूखंड पर बीएसएनएल टावर लगाने के लिए निगम के साथ लीज एग्रीमेंट किया था। यह लीज पांच वर्ष के लिए थी, जिसे बीएसएनएल के विकल्प पर अगले पांच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता था। कुल दस वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद किसी भी प्रकार का विस्तार दोनों पक्षों की आपसी सहमति से ही संभव था। यह लीज 1 मई 2015 को समाप्त हो गई थी। अदालत के समक्ष यह तथ्य स्पष्ट हुआ कि देव राज ने लीज समाप्त होने से पहले ही 13 मार्च 2015 और 1 अप्रैल 2015 को बीएसएनएल को लिखित आवेदन देकर टावर हटाने की मांग की थी। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पुत्र का विवाह हो चुका है और उसी भूमि पर उन्होंने कमरा निर्माण किया है, जिससे उन्हें अपने आवास की आवश्यकता है। इसके बावजूद बीएसएनएल ने टावर नहीं हटाया।
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अदालत ने लीज एग्रीमेंट की धारा 17 का हवाला देते हुए कहा कि लीज समाप्त होने के बाद बीएसएनएल को केवल एक वर्ष का अतिरिक्त समय वैकल्पिक व्यवस्था के लिए दिया गया था, जो 1 मई 2016 को समाप्त हो चुका था। इसके बाद का बीएसएनएल का कब्जा अवैध माना जाएगा।
किराये के भुगतान को लेकर बीएसएनएल की दलीलों को भी अदालत ने स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि निगम यह साबित नहीं कर सका कि 1 मई 2015 के बाद देव राज ने किराया स्वीकार किया हो। ऐसे में लीज के खुद ही नवीनीकरण का कोई आधार नहीं बनता।
बीएसएनएल 1 मई 2015 से अवैध कब्जेदार है और उसे हर्जाना देना होगा। आगे कहा कि 16 जुलाई 2019 के निर्णय और डिक्री और निचली अदालत द्वारा पारित 28 नवंबर 2024 के निर्णय और डिक्री में कोई अवैधता या कमी नहीं है। दोनों अपीलें विफल होती हैं और लागत के संबंध में कोई आदेश दिए बिना खारिज की जाती है।
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देव राज की भी मांग की खारिज
निचली अदालत की ओर से 10 हजार रुपये प्रतिमाह की दर से हर्जाना और 7 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश सही ठहराया गया। वहीं, देव राज की ओर से इसे बढ़ाकर 25 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने दोनों अपीलों को निरस्त करते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा और बीएसएनएल को टावर हटाकर संपत्ति खाली करने के निर्देश दिए।
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वर्ष 2005 में लगाया था टावर
कुतुबपुर निवासी देव राज ने वर्ष 2005 में अपने भूखंड पर बीएसएनएल टावर लगाने के लिए निगम के साथ लीज एग्रीमेंट किया था। यह लीज पांच वर्ष के लिए थी, जिसे बीएसएनएल के विकल्प पर अगले पांच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता था। कुल दस वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद किसी भी प्रकार का विस्तार दोनों पक्षों की आपसी सहमति से ही संभव था। यह लीज 1 मई 2015 को समाप्त हो गई थी। अदालत के समक्ष यह तथ्य स्पष्ट हुआ कि देव राज ने लीज समाप्त होने से पहले ही 13 मार्च 2015 और 1 अप्रैल 2015 को बीएसएनएल को लिखित आवेदन देकर टावर हटाने की मांग की थी। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पुत्र का विवाह हो चुका है और उसी भूमि पर उन्होंने कमरा निर्माण किया है, जिससे उन्हें अपने आवास की आवश्यकता है। इसके बावजूद बीएसएनएल ने टावर नहीं हटाया।