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Rohtak News: कोर्ट की अवमानना पर परिवार के आठ सदस्यों को एक माह की सिविल कैद
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विजेंद्र कौशिक
रोहतक। सिविल जज (जूनियर डिवीजन) अमनदीप कुमार की अदालत ने कोर्ट की अवमानना पर एक ही परिवार के आठ सदस्यों को एक माह की सिविल कैद सुनाई है। शनिवार को सुनाई सजा में कोर्ट ने कहा है कि आदेश एक माह की अपील अवधि पूरी होने के बाद लागू होंगे।
अदालत रिकाॅर्ड के मुताबिक भैंयापुर-लाढ़ौत निवासी रणबीर में अर्जी दायर की थी कि परिवार की संयुक्त जमीन है जिसमें उसका पांचवां हिस्सा है। साथ ही खेवट भी अलग-अलग नहीं हुई है।
ऐसे में दूसरे पक्ष के लोगों को जमीन का हिस्सा बेचने से रोका जाए क्योंकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि जमीन का कौन सा हिस्सा या किला नंबर किसका है।
अदालत ने 2019 में जमीन बेचने पर रोक लगा दी थी। साल 2020 में रणबीर ने अर्जी दायर की थी कि अदालत के आदेश के बावजूद तय किला नंबर बेचा गया है।
इसमें परिवार के आठ लोगों के अलावा तहसीलदार व जमीन के दो खरीदार को भी पार्टी बनाया गया है। दूसरे पक्ष ने अदालत में बताया कि पारिवारिक तौर पर यह तय हो गया था कि कौन सा हिस्सा किसका है जबकि तहसीलदार व जमीन के खरीदारों ने कहा कि उसे अदालत के स्टे ऑर्डर का पता नहीं था।
बाक्स
कोर्ट ने कहा-दूसरा पक्ष नहीं दे सका ठोस सबूत
शनिवार को कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि दायर अवमानना याचिका के दूसरे पक्ष की तरफ से जवाब दिया गया है कि उन्होंने मौखिक पारिवारिक समझौते के तहत जमीन का बंटवारा किया था। इससे साफ है कि दूसरा पक्ष कोई ठोस सबूत नहीं दे सका। ऐसे में राजेंद्र, सरोज, कुलदीप, ब्रह्मजीत, संतोष, दयावंती, श्याम सुंदर व उधम सिंह को एक माह की सिविल कैद की सजा दी जाती है। यह सजा अपील की अवधि पूरी होने के बाद शुरू होगी। आदेश को लागू कराने के लिए याचिकाकर्ता अदालत में अर्जी दायर करने के लिए स्वतंत्र है।
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क्या है सिविल सजा
वरिष्ठ वकील राकेश सपड़ा का कहना है कि अदालत की ओर से आमतौर तब सिविल सजा दी जाती है जब कोई जानबूझकर अदालत के आदेशों का पालन न करे। यह आपराधिक गिरफ्तारी से अलग है। अपील की अवधि तक सजा को स्थगित रखा है। इसमें व्यक्ति के नैतिक दोष की तुलना में दायित्व की पूर्ति पर अधिक जोर दिया जाता है।
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रोहतक। सिविल जज (जूनियर डिवीजन) अमनदीप कुमार की अदालत ने कोर्ट की अवमानना पर एक ही परिवार के आठ सदस्यों को एक माह की सिविल कैद सुनाई है। शनिवार को सुनाई सजा में कोर्ट ने कहा है कि आदेश एक माह की अपील अवधि पूरी होने के बाद लागू होंगे।
अदालत रिकाॅर्ड के मुताबिक भैंयापुर-लाढ़ौत निवासी रणबीर में अर्जी दायर की थी कि परिवार की संयुक्त जमीन है जिसमें उसका पांचवां हिस्सा है। साथ ही खेवट भी अलग-अलग नहीं हुई है।
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ऐसे में दूसरे पक्ष के लोगों को जमीन का हिस्सा बेचने से रोका जाए क्योंकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि जमीन का कौन सा हिस्सा या किला नंबर किसका है।
अदालत ने 2019 में जमीन बेचने पर रोक लगा दी थी। साल 2020 में रणबीर ने अर्जी दायर की थी कि अदालत के आदेश के बावजूद तय किला नंबर बेचा गया है।
इसमें परिवार के आठ लोगों के अलावा तहसीलदार व जमीन के दो खरीदार को भी पार्टी बनाया गया है। दूसरे पक्ष ने अदालत में बताया कि पारिवारिक तौर पर यह तय हो गया था कि कौन सा हिस्सा किसका है जबकि तहसीलदार व जमीन के खरीदारों ने कहा कि उसे अदालत के स्टे ऑर्डर का पता नहीं था।
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कोर्ट ने कहा-दूसरा पक्ष नहीं दे सका ठोस सबूत
शनिवार को कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि दायर अवमानना याचिका के दूसरे पक्ष की तरफ से जवाब दिया गया है कि उन्होंने मौखिक पारिवारिक समझौते के तहत जमीन का बंटवारा किया था। इससे साफ है कि दूसरा पक्ष कोई ठोस सबूत नहीं दे सका। ऐसे में राजेंद्र, सरोज, कुलदीप, ब्रह्मजीत, संतोष, दयावंती, श्याम सुंदर व उधम सिंह को एक माह की सिविल कैद की सजा दी जाती है। यह सजा अपील की अवधि पूरी होने के बाद शुरू होगी। आदेश को लागू कराने के लिए याचिकाकर्ता अदालत में अर्जी दायर करने के लिए स्वतंत्र है।
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क्या है सिविल सजा
वरिष्ठ वकील राकेश सपड़ा का कहना है कि अदालत की ओर से आमतौर तब सिविल सजा दी जाती है जब कोई जानबूझकर अदालत के आदेशों का पालन न करे। यह आपराधिक गिरफ्तारी से अलग है। अपील की अवधि तक सजा को स्थगित रखा है। इसमें व्यक्ति के नैतिक दोष की तुलना में दायित्व की पूर्ति पर अधिक जोर दिया जाता है।