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Bilaspur News: खरीद-फरोख्त तो दूर अब तो पूजन के लिए बाहर से मंगाने पड़ते हैं बैल

संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर Updated Wed, 18 Mar 2026 11:43 PM IST
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Forget buying and selling, now bulls have to be brought from outside for worship.
लुहणू मैदान में लग रही दुकानें। संवाद
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राज्यस्तरीय नलवाड़ी मेला : बदलते दौर में पहचान के संकट से जूझ रही है 137 साल पुरानी परंपरा
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सांस्कृतिक शो तक सिमटा उत्तर भारत का सबसे बड़े पशुधन व्यापार मेला
बैलों की खरीद-फरोख्त के लिए एक बड़े बाजार के रूप में था मेला
कभी होता था लाखों के पशुधन का कारोबार, अब पूजा के लिए उधार के बैल

सरोज पाठक
बिलासपुर। बिलासपुर का ऐतिहासिक राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेला, जो कभी उत्तर भारत के सबसे बड़े पशुधन मेलों में शुमार होता था, आज बदलते समय के साथ अपनी मूल पहचान खोता जा रहा है। करीब 137 वर्ष की विरासत समेटे यह मेला अब परंपरागत पशु व्यापार से हटकर एक सांस्कृतिक आयोजन और औपचारिकता बनकर रह गया है। आज स्थिति ये हो गई है कि बैलों की खरीद फरोख्त तो दूर पूजन के लिए भी बाहर से मंगाने पड़ते हैं।
साल 1889 में तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू गोल्डस्टीन द्वारा शुरू किए गए इस मेले का उद्देश्य क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाले पशुधन की उपलब्धता बढ़ाना था। यह मेला बैलों की खरीद-फरोख्त के लिए एक बड़े बाजार के रूप में विकसित हुआ और धीरे-धीरे बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान बन गया। पुराने समय में यह मेला गोबिंद सागर झील में डूब चुके सांडू मैदान में होता था। 1960 के दशक में राजा के आदेशानुसार यहां मेला लगता था और दूर-दराज से व्यापारी इसमें हिस्सा लेने पहुंचते थे।
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पंजाब के रोपड़ और नवांशहर से व्यापारी ऊंटों पर सामान लादकर आते थे, जबकि रोपड़, नालागढ़ और बिलासपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों की संख्या में बैल यहां बिक्री के लिए लाए जाते थे। उस दौर में यह मेला ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र हुआ करता था। मेले का धार्मिक और सामाजिक पहलू भी बेहद मजबूत था। पुराने बिलासपुर शहर की महिलाएं बैलों को आटे के पेड़े खिलाकर पुण्य अर्जित करती थीं। बिजली न होने के बावजूद मेले में ऐसी रौनक रहती थी कि लोग साल भर इसका इंतजार करते थे।
भाखड़ा बांध के निर्माण के बाद सांडू मैदान जलमग्न हो गया और मेले को नए बिलासपुर के लुहणू मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया। तब से यह मेला यहीं लगता है। स्थान परिवर्तन के साथ-साथ मेले के स्वरूप में भी बड़ा बदलाव आया। पहले नगर पालिका द्वारा आयोजित होने वाला यह मेला बाद में राज्य स्तरीय घोषित हुआ और इसकी जिम्मेदारी जिला प्रशासन और सरकार ने संभाल ली। एक समय था जब नलवाड़ी मेले में लाखों के पशुधन का कारोबार होता था। बैलों की मंडी इस मेले की पहचान थी, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज मेले में नाममात्र के पशु ही लाए जाते हैं और वे भी खरीद-फरोख्त के लिए नहीं, बल्कि प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए पहुंचते हैं। यहां तक कि बैल पूजन के लिए भी बाहर से बैल मंगवाने पड़ते हैं। इससे साफ है कि मेले का मूल उद्देश्य लगभग समाप्त हो चुका है। नलवाड़ी मेला बिलासपुर की सांस्कृतिक विरासत और इतिहास का जीवंत प्रतीक है, लेकिन बदलते समय के साथ इसकी पहचान पर संकट गहराता जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि मेले को उसकी मूल भावना पशुधन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोक संस्कृति से फिर जोड़ा जाए। साथ ही स्थानीय कलाकारों को उचित मंच और सम्मान दिया जाए, ताकि नलवाड़ी मेला आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी असली पहचान बनाए रख सके। संवाद
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लोक संस्कृति से मनोरंजन मंच तक का सफर
पहले नलवाड़ी मेला लोक संस्कृति का जीवंत मंच हुआ करता था। छिंज (कुश्ती) और पारंपरिक लोक कार्यक्रम इसकी खास पहचान थे। स्वर्गीय गंभरी देवी, रोशनी देवी और संतराम चब्बा जैसे लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ती थीं। दूर-दराज के गांवों से लोग इन कलाकारों को सुनने और देखने के लिए आते थे। यह मेला लोक जीवन और परंपराओं का जीवंत उदाहरण था।
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लोक कलाकारों की अनदेखी, बाहरी कलाकारों का वर्चस्व
बदलते समय में मेले के सांस्कृतिक स्वरूप में सबसे बड़ा बदलाव कलाकारों को लेकर देखने को मिला है। अब मेले में स्थानीय लोक कलाकारों की जगह पंजाबी और बॉलीवुड गायकों को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है। स्थिति यह है कि वीआईपी कलाकारों को बुलाने पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, जबकि स्थानीय लोक कलाकारों को आज भी बहुत कम मानदेय दिया जाता है। इससे न केवल स्थानीय कलाकारों का मनोबल गिर रहा है, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति भी हाशिए पर चली गई है। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले समय में नलवाड़ी मेले की पारंपरिक लोक पहचान पूरी तरह समाप्त हो सकती है।
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आज औपचारिकता में सिमटता मेला
स्थानीय लोगों के अनुसार, नलवाड़ी मेला अब अपनी मूल आत्मा से दूर होता जा रहा है। पशुधन व्यापार लगभग समाप्त हो चुका है और पारंपरिक गतिविधियां भी कम होती जा रही हैं। हालांकि जिला प्रशासन हर साल मेले को भव्य बनाने के प्रयास करता है, लेकिन यह प्रयास अधिकतर मनोरंजन और भीड़ जुटाने तक सीमित नजर आते हैं।
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