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Bilaspur News: सरकार से नहीं मिली मदद, ग्रामीणों ने खुद के पैसे से बना दी स्कूल की सुरक्षा दीवार
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नालागढ़ के प्राथमिक स्कूल पलासला घडुवां में जन सहयोग से तैयार की सुरक्षा दीवार- संवाद।
- फोटो : Samvad
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पलासला घड़ुवां गांव के लोगों ने पेश की मिसाल, 2.5 लाख का काम आपसी सहयोग से मात्र 85 हजार में किया पूरा
जुलाई 2025 में बरसात के दौरान टूट गई थी स्कूल की सुरक्षा दीवार
एचआर धीमान
नालागढ़ (सोलन)। आठ माह तक सरकार की ओर से कोई मदद न मिलने के बावजूद पसालसा घड़ुवां गांव के ग्रामीणों ने प्राथमिक स्कूल की सुरक्षा दीवार स्वयं बनाकर बच्चों और स्कूल भवन को सुरक्षित किया। इस कदम से न केवल स्कूल सुरक्षित हुआ, बल्कि गांव में सामूहिक प्रयास और समुदाय के सहयोग का उदाहरण भी स्थापित हुआ। जुलाई 2025 में भारी बारिश के कारण स्कूल की 8 फीट ऊंची और 45 फीट लंबी सुरक्षा दीवार ढह गई थी। दीवार गिरने से स्कूल परिसर में लावारिस जानवरों और कुत्तों का आतंक बढ़ गया था। इसके अलावा पास की पहाड़ी से मलबा आने का भी खतरा बना रहता था। ग्रामीणों का कहना था कि लगातार निवेदन करने के बावजूद सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिली, इसलिए उन्होंने खुद ही स्कूल की दीवार बनाने का बीड़ा उठाया। इस महत्वपूर्ण कार्य में पूरे गांव ने सक्रिय रूप से भाग लिया। स्कूल की अध्यापिका दलजीत कौर ने बताया कि लोगों ने केवल एक बैठक में ही पर्याप्त राशि और संसाधन जुटा दिए। गांव के राम आसरा ने लगभग 20 बैग सीमेंट दान किए। सेना से सेवानिवृत्त करनैल सिंह ने बजरी उपलब्ध कराई, शमशेर सिंह ने रेत दी, जबकि सेवानिवृत्त कैप्टन जगदीश ने मिस्त्री को दिहाड़ी प्रदान की। इसके अलावा, स्कूल स्टाफ ने लगभग 10 हजार रुपये का सरिया दान दिया। पूरे कार्य पर कुल 85 हजार रुपये खर्च आया, जबकि दीवार बनाने का अनुमान पहले दो से ढाई लाख रुपये था। इस दीवार में 5 फीट का आरसीसी डंगा भी शामिल है, जिससे अब स्कूल भवन पूरी तरह सुरक्षित है।
सामूहिक प्रयास से सात दिन में ही पूरा कर दिया काम
स्कूल की एसएमसी प्रधान ज्योति देवी ने बताया कि यदि सुरक्षा दीवार न बनाई जाती, तो बच्चों की सुरक्षा हमेशा खतरे में रहती। उन्होंने कहा कि गांववासियों के इस प्रयास ने साबित कर दिया कि सामूहिक प्रयास और समुदाय की भागीदारी किसी भी चुनौती का सामना कर सकती है। ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी और सहयोग से यह कार्य मात्र सात दिन में पूरा किया गया। यह पहल न केवल स्कूल को सुरक्षित बनाने में सफल रही, बल्कि समाज में सामूहिकता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को भी मजबूत किया। इस दौरान स्कूल स्टाफ और स्थानीय लोगों का योगदान भी सराहनीय रहा।
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जुलाई 2025 में बरसात के दौरान टूट गई थी स्कूल की सुरक्षा दीवार
एचआर धीमान
नालागढ़ (सोलन)। आठ माह तक सरकार की ओर से कोई मदद न मिलने के बावजूद पसालसा घड़ुवां गांव के ग्रामीणों ने प्राथमिक स्कूल की सुरक्षा दीवार स्वयं बनाकर बच्चों और स्कूल भवन को सुरक्षित किया। इस कदम से न केवल स्कूल सुरक्षित हुआ, बल्कि गांव में सामूहिक प्रयास और समुदाय के सहयोग का उदाहरण भी स्थापित हुआ। जुलाई 2025 में भारी बारिश के कारण स्कूल की 8 फीट ऊंची और 45 फीट लंबी सुरक्षा दीवार ढह गई थी। दीवार गिरने से स्कूल परिसर में लावारिस जानवरों और कुत्तों का आतंक बढ़ गया था। इसके अलावा पास की पहाड़ी से मलबा आने का भी खतरा बना रहता था। ग्रामीणों का कहना था कि लगातार निवेदन करने के बावजूद सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिली, इसलिए उन्होंने खुद ही स्कूल की दीवार बनाने का बीड़ा उठाया। इस महत्वपूर्ण कार्य में पूरे गांव ने सक्रिय रूप से भाग लिया। स्कूल की अध्यापिका दलजीत कौर ने बताया कि लोगों ने केवल एक बैठक में ही पर्याप्त राशि और संसाधन जुटा दिए। गांव के राम आसरा ने लगभग 20 बैग सीमेंट दान किए। सेना से सेवानिवृत्त करनैल सिंह ने बजरी उपलब्ध कराई, शमशेर सिंह ने रेत दी, जबकि सेवानिवृत्त कैप्टन जगदीश ने मिस्त्री को दिहाड़ी प्रदान की। इसके अलावा, स्कूल स्टाफ ने लगभग 10 हजार रुपये का सरिया दान दिया। पूरे कार्य पर कुल 85 हजार रुपये खर्च आया, जबकि दीवार बनाने का अनुमान पहले दो से ढाई लाख रुपये था। इस दीवार में 5 फीट का आरसीसी डंगा भी शामिल है, जिससे अब स्कूल भवन पूरी तरह सुरक्षित है।
सामूहिक प्रयास से सात दिन में ही पूरा कर दिया काम
स्कूल की एसएमसी प्रधान ज्योति देवी ने बताया कि यदि सुरक्षा दीवार न बनाई जाती, तो बच्चों की सुरक्षा हमेशा खतरे में रहती। उन्होंने कहा कि गांववासियों के इस प्रयास ने साबित कर दिया कि सामूहिक प्रयास और समुदाय की भागीदारी किसी भी चुनौती का सामना कर सकती है। ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी और सहयोग से यह कार्य मात्र सात दिन में पूरा किया गया। यह पहल न केवल स्कूल को सुरक्षित बनाने में सफल रही, बल्कि समाज में सामूहिकता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को भी मजबूत किया। इस दौरान स्कूल स्टाफ और स्थानीय लोगों का योगदान भी सराहनीय रहा।
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