{"_id":"69f1f6dc8bd94b96d40041b7","slug":"major-increase-in-fish-production-benefiting-more-than-6000-fishermen-bilaspur-news-c-92-1-ssml1001-158915-2026-04-29","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bilaspur News: मछली उत्पादन में बड़ी बढ़ोतरी, 6000 से ज्यादा मछुआरे लाभान्वित","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bilaspur News: मछली उत्पादन में बड़ी बढ़ोतरी, 6000 से ज्यादा मछुआरे लाभान्वित
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Wed, 29 Apr 2026 11:45 PM IST
विज्ञापन
गोबिंद सागर झील में मछली का बीज डालते कर्मचारी। स्रोत: मत्स्य विभाग
विज्ञापन
तीन साल में 268 मीट्रिक टन की वृद्धि, 2025-26 में उत्पादन 818 मीट्रिक टन पहुंचा
गोबिंद सागर में सबसे ज्यादा उत्पादन, वैज्ञानिक प्रबंधन और बंद सीजन की सख्ती का असर
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। प्रदेश के प्रमुख जलाशयों में मछली उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। मत्स्य पालन विभाग द्वारा वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल मछली उत्पादन 818.02 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। वर्ष 2022-23 में यह उत्पादन 549.35 मीट्रिक टन था। इस तरह पिछले तीन वर्षों में 268.67 मीट्रिक टन की वृद्धि दर्ज की गई है।
इस बढ़ोतरी से प्रदेश के 6000 से ज्यादा मछुआरों को सीधा लाभ मिला है और उनकी आजीविका में सुधार हुआ है। राज्य के गोबिंद सागर, पौंग, चमेरा, कोल डैम और रणजीत सागर जैसे पांच प्रमुख जलाशयों में मत्स्य पालन गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इन जलाशयों का कुल क्षेत्रफल लगभग 43,785 हेक्टेयर है। विभाग का मुख्य उद्देश्य मछुआरों को नियमित रूप से मछली उपलब्ध कराना और आम लोगों को प्रोटीनयुक्त आहार उपलब्ध करवाना है। सभी जलाशयों में गोबिंद सागर जलाशय मछली उत्पादन में सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनकर उभरा है। यहां उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2023-24 में 191.22 मीट्रिक टन, 2024-25 में 347.56 मीट्रिक टन और 2025-26 में 404 मीट्रिक टन मछली उत्पादन हुआ। यह पिछले वर्ष की तुलना में 56.44 मीट्रिक टन और दो वर्ष में 212.78 मीट्रिक टन की वृद्धि दर्शाता है। गोबिंद सागर में यह सफलता केंद्रीय अंतरदेशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान बैरकपुर (कोलकाता) की सिफारिशों के अनुसार मत्स्य बीज संचयन कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन और विभागीय प्रयासों का परिणाम मानी जा रही है। अन्य जलाशयों का भी कुल उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पौंग डैम जलाशय में 314.84 मीट्रिक टन, रणजीत सागर में 88.18 मीट्रिक टन, कोल डैम में 6.63 मीट्रिक टन और चमेरा जलाशय में 4.37 मीट्रिक टन मछली उत्पादन दर्ज किया गया है। मत्स्य पालन विभाग ने उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक उपायों को अपनाया है। इसमें मत्स्य बीज संचयन, जलाशयों में गश्त, बंद सीजन (क्लोज सीजन) का सख्ती से पालन और छोटे आकार की मछलियों के शिकार पर रोक शामिल है। विभाग द्वारा जलाशयों में अस्थायी स्टाफ तैनात कर निगरानी भी की जा रही है।
इनसेट
गोल्डन महाशीर संरक्षण पर विशेष ध्यान
राज्य की मछली गोल्डन महाशीर के संरक्षण के लिए भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। गोबिंद सागर और पौंग जलाशयों में पहली बार कैप्टिव ब्रीडिंग के तहत महाशीर के किशोर मछली बीज (फिंगरलिंग्स) का संचयन किया गया है। पिछले दो वर्षों में गोबिंद सागर में 36,500 और पौंग में 20,000 फिंगरलिंग्स छोड़े गए हैं।
इनसेट
मछुआरों की आर्थिक स्थिति होगी मजबूत : विवेक
मछली उत्पादन में वृद्धि का सीधा लाभ बिलासपुर, ऊना, कांगड़ा, चंबा और आसपास के जिलों में रहने वाले मछुआरा परिवारों को मिलेगा। मत्स्य पालन क्षेत्र स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभर रहा है। विभाग के निदेशक विवेक चंदेल ने बताया कि इस क्षेत्र को और मजबूत करने के लिए वैज्ञानिक मत्स्य बीज उत्पादन, लैंडिंग सेंटरों का आधुनिकीकरण, मछली हैंडलिंग और परिवहन सुविधाओं में सुधार तथा मत्स्य सहकारी समितियों को सुदृढ़ करने पर काम किया जा रहा है। साथ ही सतत मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।
Trending Videos
गोबिंद सागर में सबसे ज्यादा उत्पादन, वैज्ञानिक प्रबंधन और बंद सीजन की सख्ती का असर
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। प्रदेश के प्रमुख जलाशयों में मछली उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। मत्स्य पालन विभाग द्वारा वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल मछली उत्पादन 818.02 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। वर्ष 2022-23 में यह उत्पादन 549.35 मीट्रिक टन था। इस तरह पिछले तीन वर्षों में 268.67 मीट्रिक टन की वृद्धि दर्ज की गई है।
इस बढ़ोतरी से प्रदेश के 6000 से ज्यादा मछुआरों को सीधा लाभ मिला है और उनकी आजीविका में सुधार हुआ है। राज्य के गोबिंद सागर, पौंग, चमेरा, कोल डैम और रणजीत सागर जैसे पांच प्रमुख जलाशयों में मत्स्य पालन गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इन जलाशयों का कुल क्षेत्रफल लगभग 43,785 हेक्टेयर है। विभाग का मुख्य उद्देश्य मछुआरों को नियमित रूप से मछली उपलब्ध कराना और आम लोगों को प्रोटीनयुक्त आहार उपलब्ध करवाना है। सभी जलाशयों में गोबिंद सागर जलाशय मछली उत्पादन में सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनकर उभरा है। यहां उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2023-24 में 191.22 मीट्रिक टन, 2024-25 में 347.56 मीट्रिक टन और 2025-26 में 404 मीट्रिक टन मछली उत्पादन हुआ। यह पिछले वर्ष की तुलना में 56.44 मीट्रिक टन और दो वर्ष में 212.78 मीट्रिक टन की वृद्धि दर्शाता है। गोबिंद सागर में यह सफलता केंद्रीय अंतरदेशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान बैरकपुर (कोलकाता) की सिफारिशों के अनुसार मत्स्य बीज संचयन कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन और विभागीय प्रयासों का परिणाम मानी जा रही है। अन्य जलाशयों का भी कुल उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पौंग डैम जलाशय में 314.84 मीट्रिक टन, रणजीत सागर में 88.18 मीट्रिक टन, कोल डैम में 6.63 मीट्रिक टन और चमेरा जलाशय में 4.37 मीट्रिक टन मछली उत्पादन दर्ज किया गया है। मत्स्य पालन विभाग ने उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक उपायों को अपनाया है। इसमें मत्स्य बीज संचयन, जलाशयों में गश्त, बंद सीजन (क्लोज सीजन) का सख्ती से पालन और छोटे आकार की मछलियों के शिकार पर रोक शामिल है। विभाग द्वारा जलाशयों में अस्थायी स्टाफ तैनात कर निगरानी भी की जा रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन
इनसेट
गोल्डन महाशीर संरक्षण पर विशेष ध्यान
राज्य की मछली गोल्डन महाशीर के संरक्षण के लिए भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। गोबिंद सागर और पौंग जलाशयों में पहली बार कैप्टिव ब्रीडिंग के तहत महाशीर के किशोर मछली बीज (फिंगरलिंग्स) का संचयन किया गया है। पिछले दो वर्षों में गोबिंद सागर में 36,500 और पौंग में 20,000 फिंगरलिंग्स छोड़े गए हैं।
इनसेट
मछुआरों की आर्थिक स्थिति होगी मजबूत : विवेक
मछली उत्पादन में वृद्धि का सीधा लाभ बिलासपुर, ऊना, कांगड़ा, चंबा और आसपास के जिलों में रहने वाले मछुआरा परिवारों को मिलेगा। मत्स्य पालन क्षेत्र स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभर रहा है। विभाग के निदेशक विवेक चंदेल ने बताया कि इस क्षेत्र को और मजबूत करने के लिए वैज्ञानिक मत्स्य बीज उत्पादन, लैंडिंग सेंटरों का आधुनिकीकरण, मछली हैंडलिंग और परिवहन सुविधाओं में सुधार तथा मत्स्य सहकारी समितियों को सुदृढ़ करने पर काम किया जा रहा है। साथ ही सतत मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।
