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जुकारू उत्सव : दीवारों पर उकेरे राजा बली के चित्र, पूजा-अर्चना के बाद की प्राण प्रतिष्ठा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Wed, 18 Feb 2026 10:45 PM IST
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चंबा के पांगी में जुकारू उत्सव के दौरान लोग।स्रोत जागरूक पाठक
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चंबा। जनजातीय क्षेत्र पांगी में 15 दिवसीय जुकारू उत्सव का बुधवार को विधिवत आगाज हुआ। लोगों ने मंगलवार को ही अपने घरों की दीवारों पर राजा बली के चित्र उकेर लिए। सुबह करीब 3 बजे राजा बली के चित्र पर गंगाजल का छिड़काव किया गया और विशेष पूजा-अर्चना के बाद प्राण प्रतिष्ठा की गई। इस दाैरान शाम को घर के मुखिया ने भरेस भंगड़ी और आटे के बकरे बनाए।
परंपरा के अनुसार ये चीजें बनाते समय कोई किसी से बातचीत नहीं करता है। पूजा सामग्री अलग कमरे में रखी जाती है। रात्रिभोज के बाद गोबर की लिपाई की जाएगी। अब 15 दिन तक पांगी घाटी के लोग राजा बली की पूजा करेंगे।
लोगों ने बताया कि बुधवार को बलीराज के समक्ष चौका लगाया जाता है। गोमूत्र और गंगाजल छिड़कने के बाद गेहूं के आटे और जौ के सत्तुओं से मंडप लिखा। मंडप के सामने दीवार पर बलीराज की मूर्ति स्थापित की जाती है। इसे स्थानीय बोली में जन बलदानों राजा कहते हैं। आटे से बने बकरे, मेंढ़े आदि मंडप में तिनकों के सहारे रखे जाते हैं। घाटी के बाशिंदे आटे के बकरे तैयार कर राजा बलि को अर्पित करेंगे।
धूप-दीये और चौक लगाकर 15 दिन तक राजा बली की ही पूजा करेंगे। इस दौरान कुलदेवता से लेकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा नहीं की जाती है।
इस दौरान लोगों ने एक-दूसरे के घरों में जाकर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया। इसे स्थानीय भाषा में पड़ीद कहते है तो वहीं किलाड़ प्रजा मंडल के करेल, महालियात गांव में नाग देवता को समर्पित भोग की तैयारी की गई। कई घरों में नाग देवता को अस्थायी रूप में 15 दिन के लिए स्थापित किया जाता है। घर का मालिक या स्वामी प्रतिदिन मंडे पकवान का घी में भिगो कर भोग लगाता है। 15वें दिन नाग उत्सव के रूप में समापन किया जाता है।
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परंपरा के अनुसार ये चीजें बनाते समय कोई किसी से बातचीत नहीं करता है। पूजा सामग्री अलग कमरे में रखी जाती है। रात्रिभोज के बाद गोबर की लिपाई की जाएगी। अब 15 दिन तक पांगी घाटी के लोग राजा बली की पूजा करेंगे।
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लोगों ने बताया कि बुधवार को बलीराज के समक्ष चौका लगाया जाता है। गोमूत्र और गंगाजल छिड़कने के बाद गेहूं के आटे और जौ के सत्तुओं से मंडप लिखा। मंडप के सामने दीवार पर बलीराज की मूर्ति स्थापित की जाती है। इसे स्थानीय बोली में जन बलदानों राजा कहते हैं। आटे से बने बकरे, मेंढ़े आदि मंडप में तिनकों के सहारे रखे जाते हैं। घाटी के बाशिंदे आटे के बकरे तैयार कर राजा बलि को अर्पित करेंगे।
धूप-दीये और चौक लगाकर 15 दिन तक राजा बली की ही पूजा करेंगे। इस दौरान कुलदेवता से लेकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा नहीं की जाती है।
इस दौरान लोगों ने एक-दूसरे के घरों में जाकर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया। इसे स्थानीय भाषा में पड़ीद कहते है तो वहीं किलाड़ प्रजा मंडल के करेल, महालियात गांव में नाग देवता को समर्पित भोग की तैयारी की गई। कई घरों में नाग देवता को अस्थायी रूप में 15 दिन के लिए स्थापित किया जाता है। घर का मालिक या स्वामी प्रतिदिन मंडे पकवान का घी में भिगो कर भोग लगाता है। 15वें दिन नाग उत्सव के रूप में समापन किया जाता है।