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Kangra News: चैत्र माह में घर-घर गूंजता मंगलाचरण
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सरकाघाट उपमंडल क बलद्वाड़ा क्षेत्र में चैत्र माह के चलते गांव गांव पहुंच कर मंगलाचरण गायन करते
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बलद्वाड़ा (मंडी)। चैत्र माह को हिंदू नव संवत्सर की शुरुआत माना जाता है। इसी अवसर पर मंडी जिले में सदियों पुरानी मंगलाचरण गायन परंपरा आज भी जीवित है, जिसमें मंगलाचारी समुदाय के लोग घर-घर जाकर बधाई गीत गाते हैं और लोगों के सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
सरकाघाट उपमंडल के खनोटा बलद्वाड़ा निवासी बख्शी राम और उनकी पत्नी रजनी देवी इस परंपरा को आज भी निभा रहे हैं। दंपती गांव-गांव जाकर ढोलक के साथ पारंपरिक लोक गीत गाते हैं। लोगों को नव वर्ष की बधाई देते हुए सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
बख्शी राम ने बताया कि इसी पहले इस परंपरा को उनके बुजुर्ग निभाते थे, यह परंपरा कई पीढि़यों से चलती आ रही है। ऐसा विश्वास है कि भगवान ब्रह्मा ने चैत्र माह में ही संसार की उत्पत्ति शुरुआत की थी। मंगलाचारी गायन करने वालों को लोग घर में आ कर गायन करना शुभ मानते हैं और प्रसन्न होकर उन्हें कपड़े, गेहूं, आटा, गुड़ और कुछ पैसे देकर विदा करते हैं।
मंगलाचरण गायन करने के लिए नई पीढ़ी का रुझान कम हो गया है। शिक्षित युवा पीढ़ी इस कार्य को न सीखते हुए नौकरी और अपने अन्य कार्यों की तरफ झुकाव कर रही है। आधुनिकता के दौर में अब यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होने लगी है।
मंगलाचरण गायन सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए नई पीढ़ी की भागीदारी बेहद जरूरी है, ताकि यह अनमोल धरोहर आने वाले समय में भी जीवित रह सके।
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सरकाघाट उपमंडल के खनोटा बलद्वाड़ा निवासी बख्शी राम और उनकी पत्नी रजनी देवी इस परंपरा को आज भी निभा रहे हैं। दंपती गांव-गांव जाकर ढोलक के साथ पारंपरिक लोक गीत गाते हैं। लोगों को नव वर्ष की बधाई देते हुए सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
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बख्शी राम ने बताया कि इसी पहले इस परंपरा को उनके बुजुर्ग निभाते थे, यह परंपरा कई पीढि़यों से चलती आ रही है। ऐसा विश्वास है कि भगवान ब्रह्मा ने चैत्र माह में ही संसार की उत्पत्ति शुरुआत की थी। मंगलाचारी गायन करने वालों को लोग घर में आ कर गायन करना शुभ मानते हैं और प्रसन्न होकर उन्हें कपड़े, गेहूं, आटा, गुड़ और कुछ पैसे देकर विदा करते हैं।
मंगलाचरण गायन करने के लिए नई पीढ़ी का रुझान कम हो गया है। शिक्षित युवा पीढ़ी इस कार्य को न सीखते हुए नौकरी और अपने अन्य कार्यों की तरफ झुकाव कर रही है। आधुनिकता के दौर में अब यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होने लगी है।
मंगलाचरण गायन सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए नई पीढ़ी की भागीदारी बेहद जरूरी है, ताकि यह अनमोल धरोहर आने वाले समय में भी जीवित रह सके।