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Rampur Bushahar News: सेब के पेड़ों पर कम फूलों से मुरझाई अच्छी फसल की उम्मीद
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रोहड़ू में सेब के बगीचों में फूलों की जगह निकल रहे पत्ते, चिंतित बागवान
निचले क्षेत्रों में बागवानों की चिंता बड़ी, फसल प्रभावित होने के पूरे आसार
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू/कोटखाई। मौसम की बेरुखी निचले क्षेत्रों के बगीचों में साफ दिखने लगी है। निचले क्षेत्रों के सेब बगीचों में पेड़ों पर फूलों के बजाय पत्तों की संख्या अधिक दिखाई दे रही है। पेड़ों पर कम फूल आने से बागवानों की चिंता बढ़ गई है। सेब के पेड़ों पर कम फूलों से अच्छी फसल की उम्मीद मुरझा गई है। बागवान राजेश पुरटा, हिमांशु चौहान, सुरेंद्र शर्मा, पवन चौहान और शेर सिंह का कहना है कि पिछले साल भी समय से पहले पतझड़ होने से फसल प्रभावित हुई थी। मंडियों में बागवानों को अच्छे दाम नहीं मिल सके। बाद में बागवानों को सरकार के डिपुओं में सेब को घाटे में बेचना पड़ा। इस बार भी मौसम का असंतुलन बागवानी के लिए चुनौती बनता नजर आ रहा है। बागवानों के अनुसार, कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब के पेड़ों पर फूल आने की प्रक्रिया शुरू तो हो गई है, लेकिन फूलों की संख्या सामान्य से काफी कम है। कई स्थानों पर पेड़ों में पत्तों की बढ़ोतरी अधिक दिखाई दे रही है, जो फसल उत्पादन के लिहाज से चिंता का विषय है। कोटखाई उपमंडल और जुब्बल उपमंडल के हाटकोटी समेत निचले क्षेत्रों में इस प्रकार के लक्षण नजर आ रहे हैं। यदि सेब के पेड़ों पर पर्याप्त फूल नहीं आए, तो फल सेटिंग कम होगी और उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा। बागवानों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में मौसम में बदलाव नहीं हुआ और बारिश नहीं हुई, तो इस वर्ष सेब के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
बागवानी विशेषज्ञ एवं कृषि विज्ञान केंद्र रोहड़ू की प्रभारी डाॅ. उषा शर्मा ने बताया कि मौसम में लगातार हो रहे बदलाव प्रमुख कारण हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सेब के पेड़ों को सर्दियों के दौरान पर्याप्त चिलिंग ऑवर्स की आवश्यकता होती है। इससे पेड़ों पर समय पर और संतुलित फूल आते हैं। यदि सर्दियों में ठंड कम पड़े या तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव बना रहे, तो पेड़ों की वृद्धि प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है। ऐसे में कई बार फूलों के बजाय पत्तों का विकास अधिक होने लगता है। इसके अलावा लंबे समय से क्षेत्र में बारिश न होने के कारण मिट्टी की नमी भी काफी कम हो गई है। मिट्टी में नमी की कमी और तापमान में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव पौधों की वृद्धि और फूल बनने की प्रक्रिया पर पड़ता है।
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निचले क्षेत्रों में बागवानों की चिंता बड़ी, फसल प्रभावित होने के पूरे आसार
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू/कोटखाई। मौसम की बेरुखी निचले क्षेत्रों के बगीचों में साफ दिखने लगी है। निचले क्षेत्रों के सेब बगीचों में पेड़ों पर फूलों के बजाय पत्तों की संख्या अधिक दिखाई दे रही है। पेड़ों पर कम फूल आने से बागवानों की चिंता बढ़ गई है। सेब के पेड़ों पर कम फूलों से अच्छी फसल की उम्मीद मुरझा गई है। बागवान राजेश पुरटा, हिमांशु चौहान, सुरेंद्र शर्मा, पवन चौहान और शेर सिंह का कहना है कि पिछले साल भी समय से पहले पतझड़ होने से फसल प्रभावित हुई थी। मंडियों में बागवानों को अच्छे दाम नहीं मिल सके। बाद में बागवानों को सरकार के डिपुओं में सेब को घाटे में बेचना पड़ा। इस बार भी मौसम का असंतुलन बागवानी के लिए चुनौती बनता नजर आ रहा है। बागवानों के अनुसार, कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब के पेड़ों पर फूल आने की प्रक्रिया शुरू तो हो गई है, लेकिन फूलों की संख्या सामान्य से काफी कम है। कई स्थानों पर पेड़ों में पत्तों की बढ़ोतरी अधिक दिखाई दे रही है, जो फसल उत्पादन के लिहाज से चिंता का विषय है। कोटखाई उपमंडल और जुब्बल उपमंडल के हाटकोटी समेत निचले क्षेत्रों में इस प्रकार के लक्षण नजर आ रहे हैं। यदि सेब के पेड़ों पर पर्याप्त फूल नहीं आए, तो फल सेटिंग कम होगी और उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा। बागवानों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में मौसम में बदलाव नहीं हुआ और बारिश नहीं हुई, तो इस वर्ष सेब के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
बागवानी विशेषज्ञ एवं कृषि विज्ञान केंद्र रोहड़ू की प्रभारी डाॅ. उषा शर्मा ने बताया कि मौसम में लगातार हो रहे बदलाव प्रमुख कारण हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सेब के पेड़ों को सर्दियों के दौरान पर्याप्त चिलिंग ऑवर्स की आवश्यकता होती है। इससे पेड़ों पर समय पर और संतुलित फूल आते हैं। यदि सर्दियों में ठंड कम पड़े या तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव बना रहे, तो पेड़ों की वृद्धि प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है। ऐसे में कई बार फूलों के बजाय पत्तों का विकास अधिक होने लगता है। इसके अलावा लंबे समय से क्षेत्र में बारिश न होने के कारण मिट्टी की नमी भी काफी कम हो गई है। मिट्टी में नमी की कमी और तापमान में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव पौधों की वृद्धि और फूल बनने की प्रक्रिया पर पड़ता है।
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