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Rampur Bushahar News: वूली एफिड की सफेद रूई से फीकी पड़ रही सेब की लाली
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सेब के पौधों में तैयार हो रहा वूलीएफिड। संवाद
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शिमला के सेब बगीचों में वूली एफिड का प्रकोप, केवीके ने जारी की सलाह
वूली एफिड की पहचान पेड़ों के तनों पर घावों से होती है
बगीचों में अधिक नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का उपयोग न करें
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। वूली एफिड की सफेद रूई से सेब की फीकी पड़ रही है। शिमला जिले के सेब बहुल क्षेत्रों में वूली एफिड कीट का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। इस स्थिति को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) शिमला ने बागवानों के लिए विशेष सलाह जारी की है। कृषि विज्ञान केंद्र ने समय रहते वैज्ञानिक तरीके से इसके नियंत्रण पर जोर दिया है। उद्यान केंद्र की प्रभारी उषा शर्मा ने बताया कि वूली एफिड की पहचान पेड़ों के तनों पर घावों से होती है। यह छंटाई वाले स्थानों, शाखाओं के जोड़ और जड़ों पर सफेद रूई जैसे मोमी आवरण के रूप में दिखाई देता है। यह कीट संक्रमित पौधों, हवा और सिंचाई के पानी से फैलता है। छंटाई में इस्तेमाल होने वाले औजार भी इसके फैलाव का कारण बनते हैं। वूली एफिड पेड़ों के तने, शाखाओं और जड़ों का रस चूसता है। इससे वहां गांठ जैसी सूजन पैदा हो जाती है। कीट के छोड़े गए चिपचिपे रस पर काली फफूंद पैदा होती है। यह पत्तियों की भोजन बनाने की क्षमता को प्रभावित करती है। जड़ों में अधिक संक्रमण होने पर पेड़ों की जमीन पर पकड़ कमजोर हो जाती है। धीरे-धीरे पेड़ सूखने लगते हैं। बागवानों को सलाह दी गई है कि बगीचों में अधिक नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का उपयोग न करें। इससे वूली एफिड का प्रकोप बढ़ सकता है। संक्रमित टहनियों की समय पर छंटाई कर उन्हें नष्ट करना चाहिए। मुख्य तने के पास निकलने वाली अनावश्यक शाखाओं को नियमित रूप से हटाते रहना भी जरूरी है। उद्यान केंद्र की प्रभारी उषा शर्मा ने वूली एफिड के प्राकृतिक शत्रुओं, जैसे परजीवी ततैया और गुबरैला, के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बिना आवश्यकता रासायनिक दवाओं का अंधाधुंध छिड़काव नहीं करना चाहिए। अधिक प्रकोप होने पर अनुशंसित कीटनाशक का तेज दबाव से सीधे प्रभावित स्थानों पर छिड़काव करें। इससे कीट का मोमी आवरण टूट सकेगा। जड़ों में गंभीर संक्रमण की स्थिति में कृषि विज्ञान केंद्र या बागवानी अधिकारी की सलाह पर ही मिट्टी में दवा का उपचार करें।
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वूली एफिड की पहचान पेड़ों के तनों पर घावों से होती है
बगीचों में अधिक नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का उपयोग न करें
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। वूली एफिड की सफेद रूई से सेब की फीकी पड़ रही है। शिमला जिले के सेब बहुल क्षेत्रों में वूली एफिड कीट का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। इस स्थिति को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) शिमला ने बागवानों के लिए विशेष सलाह जारी की है। कृषि विज्ञान केंद्र ने समय रहते वैज्ञानिक तरीके से इसके नियंत्रण पर जोर दिया है। उद्यान केंद्र की प्रभारी उषा शर्मा ने बताया कि वूली एफिड की पहचान पेड़ों के तनों पर घावों से होती है। यह छंटाई वाले स्थानों, शाखाओं के जोड़ और जड़ों पर सफेद रूई जैसे मोमी आवरण के रूप में दिखाई देता है। यह कीट संक्रमित पौधों, हवा और सिंचाई के पानी से फैलता है। छंटाई में इस्तेमाल होने वाले औजार भी इसके फैलाव का कारण बनते हैं। वूली एफिड पेड़ों के तने, शाखाओं और जड़ों का रस चूसता है। इससे वहां गांठ जैसी सूजन पैदा हो जाती है। कीट के छोड़े गए चिपचिपे रस पर काली फफूंद पैदा होती है। यह पत्तियों की भोजन बनाने की क्षमता को प्रभावित करती है। जड़ों में अधिक संक्रमण होने पर पेड़ों की जमीन पर पकड़ कमजोर हो जाती है। धीरे-धीरे पेड़ सूखने लगते हैं। बागवानों को सलाह दी गई है कि बगीचों में अधिक नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का उपयोग न करें। इससे वूली एफिड का प्रकोप बढ़ सकता है। संक्रमित टहनियों की समय पर छंटाई कर उन्हें नष्ट करना चाहिए। मुख्य तने के पास निकलने वाली अनावश्यक शाखाओं को नियमित रूप से हटाते रहना भी जरूरी है। उद्यान केंद्र की प्रभारी उषा शर्मा ने वूली एफिड के प्राकृतिक शत्रुओं, जैसे परजीवी ततैया और गुबरैला, के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बिना आवश्यकता रासायनिक दवाओं का अंधाधुंध छिड़काव नहीं करना चाहिए। अधिक प्रकोप होने पर अनुशंसित कीटनाशक का तेज दबाव से सीधे प्रभावित स्थानों पर छिड़काव करें। इससे कीट का मोमी आवरण टूट सकेगा। जड़ों में गंभीर संक्रमण की स्थिति में कृषि विज्ञान केंद्र या बागवानी अधिकारी की सलाह पर ही मिट्टी में दवा का उपचार करें।