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Una News: सुंदरनगर में सिमट रहा नलवाड़ मेला, घटी बैलों की संख्या
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अब मंडी और बिलासपुर तक ही सिमट कर रह गया मेला
किसी समय उत्तर भारत का प्रमुख पशु मेला होता था
देवेंद्र गुप्ता
सुंदरनगर (मंडी)। सुंदरनगर में रविवार से शुरू हुए राज्यस्तरीय नलवाड़ी मेले में इस बार केवल 35 बैलों की जोड़ियां ही पंजीकृत हुई हैं, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 100 से अधिक थी। मेला भले ही राज्यस्तरीय दर्जा प्राप्त कर चुका हो, लेकिन अब पशुओं की खरीद-फरोख्त मंडी–बिलासपुर क्षेत्र तक ही सीमित रह गई है। रियासती काल में यह मेला उत्तर भारत में पालतू पशुओं के व्यापार का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। उस समय पठानकोट, कांगड़ा, बिलासपुर, कुल्लू, मंडी के अलावा पंजाब और हरियाणा से भी बड़ी संख्या में खरीदार यहां पहुंचते थे। वर्तमान में यह मेला अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए मात्र एक औपचारिक आयोजन बनकर रह गया है।
पुराने समय जैसा नहीं रहा मेला
त्रिफालघाट के 95 वर्षीय रांझु राम बताते हैं कि 40–50 वर्ष पहले का नलवाड़ी मेला आज की तुलना में कहीं अधिक भव्य और जीवंत होता था। उनके अनुसार अब यह मेला एक स्थानीय आयोजन बनकर रह गया है। पशुओं के प्रति उनके प्रेम का ही परिणाम है कि वे आज भी बैलों की एक जोड़ी को अपने बच्चों की तरह पालते हैं। कांगू के पशुपालक प्रकाश चंद का कहना है कि ट्रैक्टर और टिलर के बढ़ते उपयोग के बावजूद कुछ किसानों में आज भी बैलों के प्रति प्रेम और उत्साह बना हुआ है। पहले जहां यह कारोबार करोड़ों रुपये का होता था, वहीं अब सिमटकर लाखों तक रह गया है।
सजावट की दुकानों में भी कमी
इस बार नलवाड़ी मेले में पालतू पशुओं की साज-सज्जा के लिए केवल एक ही दुकान लगी है। पहले जब हजारों की संख्या में बैल आते थे, तब उनकी सजावट के लिए करीब 100 दुकानें लगती थीं, जो अब घटकर दो-तीन तक रह गई हैं। कुल मिलाकर, नलवाड़ी मेला अब धीरे-धीरे अपनी पुरानी पहचान खोता जा रहा है और बैलों की पूजा की औपचारिकता तक सीमित होता नजर आ रहा है।
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किसी समय उत्तर भारत का प्रमुख पशु मेला होता था
देवेंद्र गुप्ता
सुंदरनगर (मंडी)। सुंदरनगर में रविवार से शुरू हुए राज्यस्तरीय नलवाड़ी मेले में इस बार केवल 35 बैलों की जोड़ियां ही पंजीकृत हुई हैं, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 100 से अधिक थी। मेला भले ही राज्यस्तरीय दर्जा प्राप्त कर चुका हो, लेकिन अब पशुओं की खरीद-फरोख्त मंडी–बिलासपुर क्षेत्र तक ही सीमित रह गई है। रियासती काल में यह मेला उत्तर भारत में पालतू पशुओं के व्यापार का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। उस समय पठानकोट, कांगड़ा, बिलासपुर, कुल्लू, मंडी के अलावा पंजाब और हरियाणा से भी बड़ी संख्या में खरीदार यहां पहुंचते थे। वर्तमान में यह मेला अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए मात्र एक औपचारिक आयोजन बनकर रह गया है।
पुराने समय जैसा नहीं रहा मेला
त्रिफालघाट के 95 वर्षीय रांझु राम बताते हैं कि 40–50 वर्ष पहले का नलवाड़ी मेला आज की तुलना में कहीं अधिक भव्य और जीवंत होता था। उनके अनुसार अब यह मेला एक स्थानीय आयोजन बनकर रह गया है। पशुओं के प्रति उनके प्रेम का ही परिणाम है कि वे आज भी बैलों की एक जोड़ी को अपने बच्चों की तरह पालते हैं। कांगू के पशुपालक प्रकाश चंद का कहना है कि ट्रैक्टर और टिलर के बढ़ते उपयोग के बावजूद कुछ किसानों में आज भी बैलों के प्रति प्रेम और उत्साह बना हुआ है। पहले जहां यह कारोबार करोड़ों रुपये का होता था, वहीं अब सिमटकर लाखों तक रह गया है।
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सजावट की दुकानों में भी कमी
इस बार नलवाड़ी मेले में पालतू पशुओं की साज-सज्जा के लिए केवल एक ही दुकान लगी है। पहले जब हजारों की संख्या में बैल आते थे, तब उनकी सजावट के लिए करीब 100 दुकानें लगती थीं, जो अब घटकर दो-तीन तक रह गई हैं। कुल मिलाकर, नलवाड़ी मेला अब धीरे-धीरे अपनी पुरानी पहचान खोता जा रहा है और बैलों की पूजा की औपचारिकता तक सीमित होता नजर आ रहा है।