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Una News: बच्चों की सुरक्षा पर सरकार नहीं गंभीर, ऊना में बाल कल्याण समिति ही नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Tue, 07 Apr 2026 06:51 AM IST
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ऊना। जिला ऊना में बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़े हो गए हैं। जिले में बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) पिछले आठ माह से अस्तित्व में नहीं है। बीते वर्ष जुलाई माह में समिति का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसे भंग कर दिया गया लेकिन अब तक सरकार के सुस्त रवैये के चलते ऊना में नई समिति का गठन नहीं हो पाया। हालांकि पात्र व्यक्तियों द्वारा कई बार आवेदन किए गए, इसके बावजूद नई समिति का गठन अधर में लटका हुआ है।
स्थिति यह है कि अनाथ, बेसहारा, परित्यक्त, शोषण के शिकार और कानून से जुड़े बच्चों के मामलों के निपटारे के लिए ऊना जिला पूरी तरह दूसरे जिलों पर निर्भर हो गया है। ऐसे मामलों को कभी हमीरपुर तो कभी कांगड़ा भेजा जा रहा है। इससे न केवल मामलों के निस्तारण में देरी हो रही बल्कि पीड़ित बच्चों और उनके अभिभावकों को भी परेशानी उठानी पड़ रही है।
बाल कल्याण समिति किशोर न्याय अधिनियम के तहत गठित की जाती है। यह समिति उन बच्चों के मामलों की सुनवाई करती है, जिन्हें संरक्षण की जरूरत होती है। इनमें परित्यक्त बच्चे, बाल श्रमिक, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, सड़क पर रहने वाले बच्चे और अन्य संवेदनशील मामले शामिल हैं। समिति ही यह तय करती है कि ऐसे बच्चों को बाल गृह, आश्रय गृह या परिवार के पास भेजा जाए। जिला बाल संरक्षण अधिकारी कुलदीप सिंह ने बताया कि ऊना में बाल कल्याण समिति बीते वर्ष जुलाई माह में भंग हो गई थी। नई समिति के गठन की प्रक्रिया जारी है।
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हर महीने आते हैं औसतन 20 मामले
जिला ऊना में हर महीने बच्चों से जुड़े कई मामले सामने आते हैं। इनमें घर से भागे बच्चे, बाल श्रम, बच्चों की निर्मम पिटाई, झगड़ों में फंसे किशोर, स्कूल छोड़ने वाले बच्चे और परिवार से बिछड़े बच्चों के मामले शामिल रहते हैं। सूत्रों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार ऊना में प्रतिमाह औसतन 20 ऐसे मामले सामने आते हैं। ऐसे में समिति भंग होने से अभी तक करीब 160 मामले सामने आ चुके, जिनके निस्तारण के लिए दूसरे जिलों की समितियों का सहारा लिया गया। पहले ऐसे मामलों को ऊना में ही बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता था लेकिन समिति भंग होने के बाद अब पुलिस और बाल संरक्षण इकाई को बच्चों को लेकर दूसरे जिलों में जाना पड़ रहा है।
आवेदन हुए लेकिन नियुक्ति नहीं
सूत्रों के अनुसार समिति के नए गठन के लिए आठ माह पहले आवेदन मांगे गए थे। कई लोगों ने अध्यक्ष और सदस्य पदों के लिए आवेदन भी किया और पैनल भी बना। विभागीय स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन अंतिम मंजूरी नहीं मिल पाई।
ऊना जिला पंजाब सीमा से सटा हुआ है और यहां बाहरी राज्यों से आने वाले मजदूरों की संख्या भी अधिक है। ऐसे में बाल श्रम, बाल तस्करी और लापता बच्चों से जुड़े मामलों की संभावना भी अधिक रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे जिले में बाल कल्याण समिति का लंबे समय तक खाली रहना गंभीर चिंता का विषय है।
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स्थिति यह है कि अनाथ, बेसहारा, परित्यक्त, शोषण के शिकार और कानून से जुड़े बच्चों के मामलों के निपटारे के लिए ऊना जिला पूरी तरह दूसरे जिलों पर निर्भर हो गया है। ऐसे मामलों को कभी हमीरपुर तो कभी कांगड़ा भेजा जा रहा है। इससे न केवल मामलों के निस्तारण में देरी हो रही बल्कि पीड़ित बच्चों और उनके अभिभावकों को भी परेशानी उठानी पड़ रही है।
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बाल कल्याण समिति किशोर न्याय अधिनियम के तहत गठित की जाती है। यह समिति उन बच्चों के मामलों की सुनवाई करती है, जिन्हें संरक्षण की जरूरत होती है। इनमें परित्यक्त बच्चे, बाल श्रमिक, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, सड़क पर रहने वाले बच्चे और अन्य संवेदनशील मामले शामिल हैं। समिति ही यह तय करती है कि ऐसे बच्चों को बाल गृह, आश्रय गृह या परिवार के पास भेजा जाए। जिला बाल संरक्षण अधिकारी कुलदीप सिंह ने बताया कि ऊना में बाल कल्याण समिति बीते वर्ष जुलाई माह में भंग हो गई थी। नई समिति के गठन की प्रक्रिया जारी है।
हर महीने आते हैं औसतन 20 मामले
जिला ऊना में हर महीने बच्चों से जुड़े कई मामले सामने आते हैं। इनमें घर से भागे बच्चे, बाल श्रम, बच्चों की निर्मम पिटाई, झगड़ों में फंसे किशोर, स्कूल छोड़ने वाले बच्चे और परिवार से बिछड़े बच्चों के मामले शामिल रहते हैं। सूत्रों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार ऊना में प्रतिमाह औसतन 20 ऐसे मामले सामने आते हैं। ऐसे में समिति भंग होने से अभी तक करीब 160 मामले सामने आ चुके, जिनके निस्तारण के लिए दूसरे जिलों की समितियों का सहारा लिया गया। पहले ऐसे मामलों को ऊना में ही बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता था लेकिन समिति भंग होने के बाद अब पुलिस और बाल संरक्षण इकाई को बच्चों को लेकर दूसरे जिलों में जाना पड़ रहा है।
आवेदन हुए लेकिन नियुक्ति नहीं
सूत्रों के अनुसार समिति के नए गठन के लिए आठ माह पहले आवेदन मांगे गए थे। कई लोगों ने अध्यक्ष और सदस्य पदों के लिए आवेदन भी किया और पैनल भी बना। विभागीय स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन अंतिम मंजूरी नहीं मिल पाई।
ऊना जिला पंजाब सीमा से सटा हुआ है और यहां बाहरी राज्यों से आने वाले मजदूरों की संख्या भी अधिक है। ऐसे में बाल श्रम, बाल तस्करी और लापता बच्चों से जुड़े मामलों की संभावना भी अधिक रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे जिले में बाल कल्याण समिति का लंबे समय तक खाली रहना गंभीर चिंता का विषय है।