Honey Trap: ISI के हनी ट्रैप से पहले कैसे अंडरवर्ल्ड चलाता था खूबसूरत लड़कियों का नेटवर्क? किताब में खुलासा
क्या आईएसआई से पहले मुंबई अंडरवर्ल्ड भी हनी ट्रैप का इस्तेमाल करता था? पश्चिम बंगाल में अर्पिता सरकार की गिरफ्तारी के बाद हनी ट्रैप नेटवर्क फिर चर्चा में है। लेकिन इससे कई साल पहले उज्जैन की अर्चना शर्मा का नाम भी ऐसे ही मामलों में सामने आया था। पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडे की किताब के मुताबिक, अर्चना ने कथित तौर पर दाऊद इब्राहिम के करीबी और नेपाली सांसद मिर्जा दिलशाद बेग को हनी ट्रैप में फंसाकर उसकी हत्या की साजिश में अहम भूमिका निभाई थी। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं...
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विस्तार
पश्चिम बंगाल एसटीएफ ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से कथित तौर पर जुड़े हनी ट्रैप और जासूसी नेटवर्क का खुलासा करते हुए सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अर्पिता सरकार समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस नेटवर्क का मकसद वीआईपी लोगों से दोस्ती कर उन्हें जाल में फंसाना और संवेदनशील जानकारियां हासिल करना था। हालांकि, हनी ट्रैप का इस्तेमाल भारत के अपराध जगत में नया नहीं है। 1990 के दशक में मुंबई अंडरवर्ल्ड भी इसी तरीके का इस्तेमाल अपहरण, वसूली और हत्या जैसी वारदातों के लिए करता था। पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडे की किताब 'अंतहीन' में ऐसे ही एक चर्चित मामले का विस्तार से जिक्र किया गया है।
पश्चिम बंगाल एसटीएफ की जांच के अनुसार, झारखंड की रहने वाली 22 वर्षीय अर्पिता सरकार करीब चार साल पहले इंस्टाग्राम के जरिए मोहम्मद हमीम मोंडल के संपर्क में आई थी। आरोप है कि बाद में पाकिस्तान से जुड़े लोगों ने सीधे उससे संपर्क किया और उसे कथित तौर पर हाई-प्रोफाइल हनी ट्रैप नेटवर्क का हिस्सा बनाया। जांच एजेंसियों का कहना है कि उसका काम प्रभावशाली लोगों से संबंध बनाकर सुरक्षा और प्रशासन से जुड़ी गोपनीय जानकारियां जुटाना था। इसी मामले ने एक बार फिर उस दौर की याद दिला दी है, जब अंडरवर्ल्ड की दुनिया में अर्चना शर्मा नाम की महिला हनी ट्रैप के जरिए बड़े अपराधों को अंजाम दिलाने का आरोप झेल चुकी थी।
क्या थी अर्चना शर्मा की कहानी?
पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडे के मुताबिक, अर्चना शर्मा मूल रूप से मध्य प्रदेश के उज्जैन की रहने वाली थी। उसे पप्पी शर्मा, महक सिंह और सलमा जैसे नामों से भी जाना जाता था। वह एक अच्छी गायिका थी और बाबला म्यूजिक ग्रुप के साथ स्टेज शो किया करती थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात ग्रुप के मैनेजर पितांबर मंगलानी से हुई। दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और वर्ष 1993 में स्टेज शो के सिलसिले में दुबई चले गए। वहां कुछ समय बाद दोनों ने शादी कर ली और गारमेंट्स का कारोबार शुरू किया। बाद में अर्चना को पता चला कि मंगलानी पहले से शादीशुदा था। इसके बाद दोनों के रिश्ते टूट गए और अर्चना भारत लौट आई।
दुबई में किस मुलाकात के बाद बदल गई जिंदगी?
राजेश पांडे के अनुसार, वर्ष 1996 में अर्चना दोबारा दुबई पहुंची। वहां उसकी मुलाकात अंडरवर्ल्ड से जुड़े इरफान गोगा से हुई। अर्चना ने उससे अपने बोरिवली स्थित फ्लैट के विवाद को सुलझाने में मदद मांगी। कुछ समय बाद गोगा ने कहा कि वह उसकी मदद करेगा, लेकिन बदले में उसे भी कुछ काम करने होंगे। अर्चना इसके लिए तैयार हो गई। इसके बाद उसे भारत भेजा गया और वहीं से वह कथित तौर पर उस गैंग के संपर्क में आ गई, जो दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क से अलग होकर काम कर रहा था। यहीं से उसके हनी ट्रैप और अपहरण के मामलों में शामिल होने का सिलसिला शुरू होने का दावा किया जाता है।
अंडरवर्ल्ड में इरफान गोगा कितना अहम था?
राजेश पांडे के मुताबिक, इरफान गोगा पहले डी कंपनी के लिए काम करता था। उसका काम अपहरण और वसूली से मिलने वाली रकम को हवाला के जरिए दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क तक पहुंचाना था। बाद में उसका डी कंपनी से विवाद हो गया। आरोप है कि उसने दाऊद के बहनोई से भी उगाही मांगी थी। इस घटना के बाद वह दाऊद के निशाने पर आ गया। कई वर्षों बाद दुबई में उसकी हत्या कर दी गई। राजेश पांडे के अनुसार, गोगा की मौत के पीछे दाऊद गिरोह की पुरानी दुश्मनी और उगाही विवाद को बड़ा कारण माना गया।
हनी ट्रैप के जरिए किन बड़े कारोबारियों को बनाया गया निशाना?
राजेश पांडे की किताब के अनुसार, इरफान गोगा के निर्देश पर अर्चना शर्मा ने सबसे पहले होटल कारोबारी एल. डी. व्यास को अपने जाल में फंसाया। इसके बाद उनका अपहरण किया गया और परिवार से पांच करोड़ रुपये की फिरौती मांगी गई। वर्ष 1998 में इंदौर के कारोबारी जगदीश मोती रमाणी के अपहरण में भी अर्चना का नाम सामने आया। दावा किया गया कि उसने प्रोजेक्ट प्रेजेंटेशन के बहाने कारोबारी को बुलाया और फिर गैंग ने उनका अपहरण कर लिया। इसी दौरान कई अन्य चर्चित अपहरण मामलों में भी उसका नाम जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड में सामने आने का उल्लेख राजेश पांडे ने अपनी पुस्तक में किया है।
क्या अर्चना शर्मा का नाम कई चर्चित अपहरण मामलों में भी आया था?
राजेश पांडे के अनुसार, वर्ष 1998 के दौरान अर्चना शर्मा का नाम कई हाई-प्रोफाइल अपहरण मामलों में सामने आया। इनमें दिल्ली और इंदौर के मामलों के अलावा कारोबारी गौतम आडानी के अपहरण प्रकरण का भी उल्लेख किया गया है। किताब में दावा किया गया है कि उस समय उन्हें छोड़ने के बदले करोड़ों रुपये की फिरौती मांगी गई थी और इस पूरे नेटवर्क में अर्चना की भूमिका भी जांच के दायरे में आई थी। हालांकि, इन मामलों में अलग-अलग जांच एजेंसियों ने समय-समय पर अलग-अलग कार्रवाई की। राजेश पांडे के मुताबिक, वर्ष 1997-98 में अर्चना एक बार गिरफ्तार भी हुई, लेकिन कुछ दिन बाद उसे रिहा कर दिया गया। इसके बाद वह फिर अंडरवर्ल्ड के संपर्क में सक्रिय रही।
कौन था मिर्जा दिलशाद बेग और उससे अर्चना शर्मा का संपर्क कैसे हुआ?
राजेश पांडे की किताब के मुताबिक, जब अर्चना शर्मा पर कई मामलों में पुलिस का दबाव बढ़ने लगा, तब अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोगों ने उसे नेपाल भेजने की योजना बनाई। वहां उसकी मुलाकात मिर्जा दिलशाद बेग से कराई गई। किताब के अनुसार, मिर्जा को बताया गया कि अर्चना उनके नेटवर्क के लिए कई बड़े काम कर चुकी है और फिलहाल सुरक्षित ठिकाने की जरूरत है। इसके बाद मिर्जा ने कथित तौर पर काठमांडू में उसके रहने की व्यवस्था कराई। इसी दौरान अंडरवर्ल्ड के भीतर मिर्जा को रास्ते से हटाने की साजिश भी तैयार होने लगी। दावा किया गया कि अर्चना को इस योजना का अहम हिस्सा बनाया गया।
क्या हनी ट्रैप के जरिए मिर्जा दिलशाद बेग को निशाना बनाया गया?
राजेश पांडे के अनुसार, योजना यह थी कि अर्चना किसी तरह मिर्जा को अपने घर बुलाए और जैसे ही वह वहां पहुंचे, गैंग के शूटरों को इसकी सूचना दे दी जाए। किताब में लिखा गया है कि अर्चना को एक पिस्तौल भी दी गई थी और कहा गया था कि मौका मिलने पर वह खुद भी हमला कर सकती है। शुरुआत में मिर्जा कई बार बुलाने के बावजूद उसके घर नहीं गया। बाद में गैंग के लोगों ने मिर्जा को यह भरोसा दिलाया कि अर्चना उनके ही नेटवर्क की सदस्य है और उसके घर जाने से उसे सुरक्षा का संदेश जाएगा। इसके बाद मिर्जा ने एक दिन उसके घर आने की सहमति दे दी।
मिर्जा दिलशाद बेग की हत्या कैसे हुई?
राजेश पांडे के मुताबिक, जिस दिन मिर्जा अर्चना के घर पहुंचा, उसने अपने सुरक्षाकर्मियों को कुछ दूरी पर रुकने के लिए कहा। अर्चना ने उसे देखते ही पहले से तय संकेत के अनुसार गैंगस्टर मनजीत सिंह मंगे को मिस कॉल कर दी। इसके बाद फरीद तनाशा, रोहित वर्मा और अन्य शूटर वहां पहुंच गए। किताब के अनुसार, मिर्जा को घर के भीतर कुछ शक हो गया और वह कुछ ही मिनट में वहां से निकलने लगा। जैसे ही वह अपने बंगले की ओर बढ़ा, शूटरों ने उसका पीछा किया। मंगे ने उसे आवाज लगाई और जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा, फरीद तनाशा ने पहली गोली चला दी। इसके बाद अन्य शूटरों ने भी ताबड़तोड़ फायरिंग की। वर्ष 1998 में नेपाल में हुई इस वारदात में मिर्जा दिलशाद बेग की मौके पर ही मौत हो गई।
मिर्जा दिलशाद बेग को अंडरवर्ल्ड और आईएसआई से क्यों जोड़ा जाता था?
राजेश पांडे की पुस्तक के अनुसार, मिर्जा दिलशाद बेग मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले का रहने वाला था, लेकिन बाद में उसने नेपाल की नागरिकता हासिल कर वहां राजनीति में प्रवेश किया और सांसद बना। किताब में दावा किया गया है कि वह दाऊद इब्राहिम का करीबी था और भारत-नेपाल सीमा पर उसके नेटवर्क का प्रमुख चेहरा माना जाता था। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि वह फर्जी नेपाली पासपोर्ट बनवाने, भारत से चोरी की गाड़ियों को नेपाल पहुंचाने, अपराधियों को सुरक्षित ठिकाना देने और हथियारों की तस्करी जैसे मामलों में सक्रिय था। राजेश पांडे के मुताबिक, इसी वजह से भारतीय जांच एजेंसियां और कई राज्यों की पुलिस लंबे समय से उसकी गतिविधियों पर नजर रखे हुए थीं।
भारत की जांच एजेंसियां मिर्जा दिलशाद बेग को क्यों बड़ा खतरा मानती थीं?
राजेश पांडे के अनुसार, मिर्जा दिलशाद बेग का प्रभाव केवल अपराध जगत तक सीमित नहीं था। वह नेपाल में बैठकर भारत से फरार अपराधियों को शरण दिलाने, उनके लिए फर्जी नेपाली पासपोर्ट बनवाने और उन्हें दुबई या अन्य देशों तक पहुंचाने में कथित भूमिका निभाता था। किताब में यह भी दावा किया गया है कि भारत में चोरी हुई लग्जरी गाड़ियां नेपाल पहुंचाई जाती थीं और वहां खुलेआम बेची जाती थीं। राजेश पांडे के मुताबिक, एक भारतीय अधिकारी अपनी चोरी हुई कार तलाशते हुए नेपाल पहुंचे थे, जहां उन्हें अपनी कार दिखाई भी दी, लेकिन उसे वापस पाने के लिए कथित तौर पर पैसे देने पड़े। इन घटनाओं के कारण भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नजर लंबे समय से मिर्जा पर थी।
नेपाल में भारतीय पुलिस टीम के साथ क्या हुआ था?
राजेश पांडे की पुस्तक के अनुसार, वर्ष 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश का कुख्यात अपराधी आजम घोसी नेपाल भाग गया था। उसे पकड़ने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस की एक टीम नेपाल पहुंची। किताब में दावा किया गया है कि वहां मिर्जा दिलशाद बेग के प्रभाव के कारण भारतीय पुलिस अधिकारियों को हिरासत में ले लिया गया। उनके साथ मारपीट की गई और एक पुलिसकर्मी की आंख तक फोड़ दी गई। यह घटना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ा झटका मानी गई। इसके बाद मिर्जा को लेकर भारतीय एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई और उसे कानून के दायरे में लाने की रणनीतियों पर काम शुरू हुआ।
क्या आईएसआई और डी कंपनी के बीच नेपाल एक अहम ठिकाना बन गया था?
राजेश पांडे के मुताबिक, 1990 के दशक में नेपाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना बन गया था। किताब में दावा किया गया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने वहां अपना समानांतर नेटवर्क तैयार किया था। इसी दौर में दाऊद इब्राहिम का गिरोह भी नेपाल का इस्तेमाल अपराधियों को सुरक्षित ठिकाना देने, हथियारों की आवाजाही और फर्जी दस्तावेज तैयार कराने के लिए करता था। राजेश पांडे ने अपनी पुस्तक में यह भी लिखा है कि वर्ष 1999 में आईसी-814 विमान अपहरण की घटना ने नेपाल में सक्रिय ऐसे नेटवर्कों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की चिंताओं को और मजबूत किया।
मिर्जा की हत्या के बाद अर्चना शर्मा का क्या हुआ?
राजेश पांडे के अनुसार, मिर्जा दिलशाद बेग की हत्या के बाद अर्चना शर्मा कुछ समय तक अंडरवर्ल्ड के संपर्क में रही। लेकिन बाद में उसकी भी नेपाल में हत्या कर दी गई। किताब में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उसकी हत्या किसने कराई, लेकिन यह जरूर उल्लेख है कि अंडरवर्ल्ड में लगातार बदलते समीकरणों और गैंगवार के बीच उसका भी अंत हो गया। जिस महिला पर कभी बड़े कारोबारियों को हनी ट्रैप में फंसाने और एक प्रभावशाली अपराधी की हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप लगे, वही अंत में खुद भी हिंसा का शिकार बन गई।
आज के हनी ट्रैप मामलों से क्या जुड़ता है पुराना अंडरवर्ल्ड कनेक्शन?
पश्चिम बंगाल एसटीएफ की हालिया कार्रवाई और अर्पिता सरकार की गिरफ्तारी के बाद हनी ट्रैप के पुराने मामलों की फिर चर्चा शुरू हो गई है। मौजूदा मामले में जांच एजेंसियां कथित जासूसी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की जांच कर रही हैं। वहीं, 1990 के दशक में ऐसे नेटवर्क का इस्तेमाल मुख्य रूप से अपहरण, फिरौती, वसूली और गैंगवार के लिए किया जाता था। दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन एक समानता यह है कि प्रभावशाली लोगों तक पहुंच बनाने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किए जाने के आरोप दोनों दौर में सामने आए हैं। मौजूदा मामले की जांच अभी जारी है, जबकि अर्चना शर्मा और मिर्जा दिलशाद बेग की कहानी भारतीय अंडरवर्ल्ड के इतिहास का एक चर्चित अध्याय मानी जाती है।