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SC Update: अदालत की पार्श्वनाथ डेवलपर्स को अंतिम मोहलत, कहा- एक हफ्ते में बकाया जमा करें, नहीं तो अगला कदम जेल

Mon, 20 Jul 2026 08:43 PM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Mon, 20 Jul 2026 08:43 PM IST
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Supreme Court Updates Parsvnath Developers one week to deposit dues to homebuyers warns next step is jail
सुप्रीम कोर्ट अपडेट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पार्श्वनाथ डेवलपर्स को गुरुग्राम के फ्लैट खरीदारों के पक्ष में दिए गए आदेशों का पालन करने के लिए अंतिम अवसर दिया। अदालत ने कंपनी को एक सप्ताह के भीतर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित पूरी बकाया राशि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करने का निर्देश दिया।
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प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि अगर कंपनी ने तय समय में आदेश का पालन नहीं किया तो उसके जिम्मेदार लोगों को जेल भेजा जाएगा। अदालत ने कंपनी और उसके निदेशकों पर कड़ी टिप्पणी भी की।
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प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "इन्होंने पूरे देश को ठगा है। अगर आप (रियल एस्टेट कंपनी और उसके निदेशक) एक सप्ताह के भीतर आदेश का पालन नहीं करते हैं तो आपको जेल भेज दिया जाएगा। ये पूरी व्यवस्था का मजाक बना रहे हैं।" उन्होंने कहा, "यूनिटेक के निदेशकों के साथ जो हुआ था, वही इनके (पार्श्वनाथ डेवलपर्स) साथ भी होगा। पूरी व्यवस्था पर कब्जा कर लिया गया है।"
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यह मामला रीटा टिक्कू और लोकेश टिक्कू की याचिका से जुड़ा है। कैंसर से उबर चुकीं रीटा टिक्कू और उनके परिवार ने गुरुग्राम के सेक्टर-53 स्थित 'पार्श्वनाथ एक्सोटिका' परियोजना में अपनी जीवनभर की जमा पूंजी निवेश की थी। पीठ ने कहा, "वे हरियाणा रेरा के आदेशों का पालन न करने का कारण बताएं। गैर-जमानती वारंट लागू करने से पहले हम बिल्डर को अंतिम अवसर दे रहे हैं कि वह एक सप्ताह के भीतर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित पूरी वसूली योग्य राशि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करे।" अदालत ने आदेश दिया कि मामले की अगली सुनवाई अगले सोमवार को होगी।

सुधार की संभावना को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के दोषी की सजा घटाई, उम्रकैद की जगह 20 साल की जेल
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वर्ष 2016 के सामूहिक दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा प्राकृतिक जीवन के शेष हिस्से तक के कठोर कारावास से घटाकर 20 वर्ष कर दी। अदालत ने कहा कि अपराध के समय दोषी की उम्र केवल 25 वर्ष थी और उसके सुधार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि दोषी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और जेल में उसका आचरण भी अच्छा रहा है।

पीठ ने कहा, "इस मामले में दोषी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। अपराध के समय उसकी उम्र केवल 25 वर्ष थी। कम उम्र होने के कारण उसके सुधार की संभावना है।" अदालत ने कहा, "राज्य सरकार ने ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया है जिससे यह साबित हो कि उसका सुधार संभव नहीं है। न ही उसने दोषी की ओर से किए गए इस दावे का खंडन किया है कि लगभग 10 वर्षों (रिमिशन सहित) के दौरान जेल में उसका आचरण अच्छा रहा है।"

पीठ ने सुनवाई के दौरान की क्या टिप्पणी?
निचली अदालत ने दोषी को जीवन के शेष प्राकृतिक काल तक कठोर कारावास की सजा सुनाई थी और पीड़िता को 25 हजार रुपये जुर्माना देने का भी आदेश दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि यह जघन्य अपराध है, जो केवल पीड़िता ही नहीं बल्कि पूरे समाज के खिलाफ है। पीठ ने कहा, "सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर पितृसत्तात्मक सोच से बाहर निकलने की दिशा में काफी बदलाव आने के बावजूद ऐसी घटनाएं बिना किसी झिझक के लगातार हो रही हैं।"

अदालत ने कहा कि समय-समय पर कानून में कई संशोधन किए गए हैं। इनका कुछ सकारात्मक असर भी पड़ा है, लेकिन जब तक ऐसी घटनाएं केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बन जातीं और समाज उन्हें पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता, तब तक ऐसे अपराधों को खत्म करने की जरूरत कम नहीं आंकी जा सकती। पीठ ने न्यायमूर्ति के. रामास्वामी की टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था, "सजा तय करने की प्रक्रिया में जहां सख्ती जरूरी हो, वहां सख्त रहें और जहां दया की गुंजाइश हो, वहां दया भी बरती जानी चाहिए।"

कुछ राज्यों ने विशेष एनआईए अदालतें बनाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि कुछ राज्यों ने गंभीर अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष एनआईए अदालतों की स्थापना के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं। अदालत ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि आधिकारिक दावों के बावजूद न्यायिक ढांचे की वास्तविक स्थिति संतोषजनक नहीं है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की स्थापना में हो रही देरी पर नाराजगी जता रही थी।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "हम पाते हैं कि कुछ राज्यों में विशेष एनआईए अदालतों की स्थापना के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में ऐसी केवल एक अदालत होना लंबित मामलों से निपटने के लिए बेहद अपर्याप्त है।" यह स्वत: संज्ञान मामला 'इन रे: विशेष अदालतों की स्थापना' शीर्षक से दर्ज किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने देखा था कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) सहित एनआईए के मामलों की सुनवाई वर्षों तक लंबित रहती है, जिससे आरोपियों और पीड़ितों दोनों के अधिकार प्रभावित होते हैं।

सुनवाई की शुरुआत में केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है और अब तक 14 विशेष नामित एनआईए अदालतें स्थापित की जा चुकी हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड में एनआईए के 27 मामले हैं और वहां सात नामित अदालतें हैं। भाटी ने बताया कि जम्मू-कश्मीर, बिहार, छत्तीसगढ़, मणिपुर, असम और मिजोरम में एक-एक नामित अदालत है, जबकि गुजरात में तीन नामित अदालतें हैं। हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि केवल अदालतों को नामित कर देना पर्याप्त नहीं है।

क्या सेवानिवृत्त जजों के लिए 45 व 50 हजार में ड्राइवर-सुरक्षाकर्मी रखना संभव
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को मिलने वाली सुविधाओं के लिए पूरे देश में एक समान नीति बनाई जाए। अदालत ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं में बड़ा अंतर है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि केंद्र दो सप्ताह के भीतर एक समिति गठित करे। यह समिति तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपे। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि 45 से 50 हजार रुपये में क्या एक ड्राइवर और सुरक्षाकर्मी रखना संभव है। राज्यों में सुविधाओं की कोई समान व्यवस्था नहीं है। अगर केंद्र समिति नहीं बनाएगा तो अदालत खुद समिति गठित करने पर विचार करेगी। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार को समिति बनाने में कोई दिक्कत नहीं है और इस मुद्दे का समाधान किया जाएगा।

हर राज्य में अलग-अलग सुविधाएं
यह मामला सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के संगठन के अध्यक्ष जस्टिस वीएस दवे की अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घरेलू सहायक, ड्राइवर, टेलीफोन, चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति और यात्रा के दौरान सरकारी आवास जैसी सुविधाएं हर राज्य में अलग-अलग हैं। इसलिए एक समान राष्ट्रीय नीति की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि इस व्यवस्था में राज्यों के साथ खर्च साझा करने के कारण केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

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