24 दिन से जंगलों में आतंकियों की तलाश: जंगल में झाड़ियां इतनी घनी कि जमीन न दिखे, फिर भी मोर्चे पर डटे जांबाज
राजोरी के डोरिमल और गंभीर मुगला के दुर्गम जंगलों में आतंकियों की तलाश में सेना का 'ऑपरेशन शेरूवाली' 24वें दिन भी जारी है। घने जंगल, कठिन मौसम और सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद सुरक्षाबल ड्रोन, खोजी कुत्तों और अतिरिक्त बलों की मदद से आतंकियों की घेराबंदी में जुटे हैं।
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विस्तार
राजोरी के दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों में आतंकवाद के खिलाफ सेना का महाअभियान जारी है। खड़ी चढ़ाई, गहरी खाइयों और रास्ता रोकने वाली झाड़ियों की बाधाओं को चीरते हुए सुरक्षाबल दिन-रात आतंकियों की तलाश में जुटे हैं। सोमवार यानी आज 24वें दिन में प्रवेश कर चुका ऑपरेशन शेरूवाली अब राजोरी के गंभीर मुगला और डोरिमल क्षेत्र में सबसे लंबा और चुनौतीपूर्ण आतंकवाद-रोधी अभियान बन गया है। रविवार को भी सुरक्षाबल आतंकियों की तलाश करते रहे।
ऑपरेशन शेरूवाली 23 मई 2026 को शुरू हुआ था। रक्षा सूत्रों के अनुसार, आतंकियों की मौजूदगी संबंधी खुफिया जानकारी मिलने के बाद शुरू किए गए इस अभियान में जंगलों के विशाल क्षेत्र को घेरे में लेकर लगातार तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। घने जंगलों में किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखने के लिए बड़े पैमाने पर तलाशी, अतिरिक्त निगरानी और पूरे इलाके में दबदबा (एरिया डोमिनेशन) बनाने के हर संभव उपाय किए जा रहे हैं।
इस ऑपरेशन की तुलना वर्ष 2021 में के जंगल में चले लंबे आतंकरोधी अभियान से की जा रही है जो अक्तूबर 2021 में तीन सप्ताह तक चला था। सुरक्षाबलों ने आठ किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्र में अभियान चलाया था।
ऑपरेशन शेरूवाली में जवान लगातार कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम की चुनौतियों और संभावित सुरक्षा खतरों का सामना कर रहे हैं। ऑपरेशन के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल बीरेश्वर गोस्वामी बलिदान हो चुके हैं। इसके बावजूद सुरक्षाबलों ने क्षेत्र में अपना दबाव बनाए रखा है और अभियान को निर्णायक परिणाम तक पहुंपुंछ जिले के भाटादूड़ियां चाने के लिए तलाशी जारी रखी है। आतंकियों की तलाश में अतिरिक्त सुरक्षाबल लगाए गए हैं। खोजी कुत्तों और ड्रोन से भी तलाशी ली जा ही है।
आतंकी किधर से भाग निकलें... अंदाजा नहीं लगाया जा सकता
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डोरिमल और गंभीर मुगला का क्षेत्र राजोरी, मंजाकोट, थन्नामंडी, दरहाल और इसके आगे पुंछ की ओर जाने वाले कई वन मार्गों से जुड़ा है। यदि सुरक्षा घेरा पूरी तरह प्रभावी न हो तो आतंकी घने जंगलों की आड़ में दूसरे इलाकों की ओर बच निकलने का प्रयास कर सकते हैं। ऐसे में सुरक्षाबलों ने बहुस्तरीय घेराबंदी, निगरानी उपकरणों और अतिरिक्त जवानों की तैनाती के जरिए ऐसे संभावित रास्तों पर विशेष नजर रखी है। इसके बावजूद आतंकियों के कहीं और भाग जाने से पूरी तरह से इन्कार नहीं किया जा सकता।
स्थानीय समर्थन के बिना लंबे समय तक छिपना नामुश्किल
सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी भी आतंकी समूह के लिए इतने लंबे समय तक घने जंगलों में लगातार छिपे रहना आसान नहीं होता। भोजन, दवाइयों व अन्य आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण होती है। इन आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं। ये जांच भी की जा रही है कि आतंकियों को कहीं से रसद और पानी तो नहीं मिल रहा है। अतीत में कई अभियानों में सुरक्षा एजेंसियां ओजीडब्ल्यू नेटवर्क का खुलासा कर चुकी हैं जो आतंकियों तक भोजन, सूचनाएं या अन्य मदद पहुंचाते रहे हैं। हालांकि, ऑपरेशन शेरूवाली में किसी स्थानीय सहायता नेटवर्क की भूमिका अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए कठिन है ये ऑपरेशन
डोरिमल और गंभीर मुगला के जंगल राजोेरी जिले के सबसे दुर्गम और घने वन क्षेत्रों में गिने जाते हैं। यहां घने चीड़ और मिश्रित वन के बीच संकरे पहाड़ी रास्ते हैं। अनेक प्राकृतिक गुफाएं हैं। कई स्थानों पर दृश्यता बेहद सीमित रहती है। इससे सुरक्षाबलों को तलाशी अभियान चलाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
वन क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में कई घंटे लग जाते हैं। घने पेड़ों और झाड़ियों के कारण दिन में भी निगरानी चुनौतीपूर्ण रहती है। रात में कठिनाई अधिक बढ़ जाती है। लगातार पैदल गश्त, भारी हथियारों और उपकरणों के साथ दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ने और उतरने में मुश्किल तथा बदलते मौसम के बीच अभियान चलाना जवानों के धैर्य और क्षमता की बड़ी परीक्षा है।
कब-कब चले लंबे तलाशी अभियान
ऑपरेशन सर्प विनाश
पीर पंजाल पर्वतमाला के सुरनकोटपुंछ 2023 में जनवरी से मई तक चले सबसे लंबे ऑपरेशन सर्प विनाश में करीब 100 आतंकवादी मार गिराए गए थे। 100 से अधिक बंकर, गुफाओं और आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया था। ये ऑपरेशन आज भी पीरपंजाल क्षेत्र के सबसे बड़े और कठिन आतंकरोधी अभियानों में गिना जाता है। इस अभियान में सुरक्षाबलों ने आतंकियों के ठिकानों, बंकरों और नेटवर्क को ध्वस्त किया था।
ऑपरेशन भाटा धुरियां
11 अक्तूबर 2021 को शुरू हुआ था। पुंछ-राजोेरी के डेरा की गली, भाटा धुलियां और सुरनकोट-मेंढर के घने जंगलों में चलाया गया। सेना और सुरक्षा बलों ने जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों के खिलाफ तीन सप्ताह तक अभियान चलाया। अभियान के दौरान नौ जवान बलिदान हुए थे। आतंकी भाग निकले थे।
बाजीमाल वन क्षेत्र सर्च ऑपरेशन
नवंबर 2023 में राजोरी के कालाकोट स्थित बाजीमाल जंगलों में सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई। 22-23 नवंबर को मुठभेड़ में सेना के दो कैप्टन सहित पांच सैन्यकर्मी बलिदान हुए। इसके बाद सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने पूरे बाजीमाल, कालाकोट, राजोेरी और पड़ोसी मेंढर क्षेत्र के घने जंगलों में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू किया। ये करीब 12 दिन तक जारी रहा। इस दौरान सुरक्षा बलों ने जंगलों, पहाड़ी इलाकों और संभावित छिपने के ठिकानों की गहन तलाशी ली थी।
कंडी फॉरेस्ट ऑपरेशन (ऑपरेशन त्रिनेत्र)
राजोरी जिले के कंडी (केसरी हिल) जंगल क्षेत्र में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन त्रिनेत्र वर्ष 2023 के लंबे आतंकवाद विरोधी अभियानों में से एक था। यह अभियान घने जंगलों, प्राकृतिक गुफाओं और दुर्गम पहाड़ियों वाले क्षेत्र में चला। 5 मई 2023 सेना की खोजी टीम का आतंकियों से संपर्क हुआ। आतंकियों ने गुफा के पास आईईडी विस्फोट किया जिसमें सेना के पांच जवान बलिदान हो गए थे। 10 दिन चले इस अभियान मे एक आतंकी को मार गिराया गया था।
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