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Srinagar News: श्रीनगर में 13 साल तक चली सुनवाई, आरोपी बरी
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- लैब सैंपल खराब होने का मामला, अदालत ने कहा-अभियोजन पक्ष धोखाधड़ी के इरादे का कोई भी सबूत पेश करने में रहा नाकाम
अदालत से ... लोगो लगाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। शहर की एक अदालत ने बुधवार को 13 साल तक चली सुनवाई के बाद 2013 के एक धोखाधड़ी के मामले में एक आरोपी को बरी कर दिया। यह मामला एक कथित तौर पर खराब हो चुके मेडिकल सैंपल से जुड़ा था। अदालत ने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष धोखाधड़ी या बेईमानी के इरादे का कोई भी सबूत पेश करने में नाकाम रहा।
श्रीनगर के तीसरे अतिरिक्त मुंसिफ की अदालत ने फैसला सुनाया कि अगर धोखाधड़ी के लिए उकसाने का कोई सबूत न हो तो सिर्फ मेडिकल सैंपल का खराब हो जाना आरपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। यह चालान 2013 में करण नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा था। यह एफआईआर अब्दुल रहमान वागे नाम के एक व्यक्ति की शिकायत पर दर्ज की गई थी। वागे ने आरोप लगाया था कि एक लैब ने उनकी पत्नी की सर्जरी के बाद लिए गए बायोप्सी सैंपल को ठीक से नहीं संभाला जिससे वह सैंपल इस्तेमाल के लायक नहीं रहा। उन्हें मेडिकल परेशानी का सामना करना पड़ा।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने केवल दो गवाहों के बयान दर्ज करवाए जिनमें वागे भी शामिल थे। अदालत ने गवाहों के बयानों में कई बड़ी विसंगतियां (विरोधाभास) पाईं। इसके अलावा तारीखों और सैंपल को संभालने के तरीके जैसे अहम तथ्यों को लेकर भी स्पष्टता की कमी थी। साथ ही जांच अधिकारी के बयान जैसे कई अहम सबूत भी नदारद थे। सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद किसी भी सामग्री से यह साबित नहीं होता कि आरोपी का कोई बेईमानी का इरादा था या उसने शिकायतकर्ता को किसी तरह की धोखाधड़ी करके उकसाया था। ये दोनों ही बातें आरपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत अपराध साबित करने के लिए बेहद जरूरी होती हैं।
अदालत ने कहा कि यह मामला मुख्य रूप से मेडिकल सैंपल को पेशेवर तरीके से संभालने से जुड़ा है। सैंपल कई कारणों से प्रभावित हो सकता है जैसे कि तापमान या बाहरी माहौल के संपर्क में आना। इसलिए इसे धोखाधड़ी के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इस मामले में एक आरोपी उमर यासीन शाह की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई थी जिसके चलते उसके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी। संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने दूसरे आरोपी मुश्ताक अहमद भट को बरी कर दिया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। शहर की एक अदालत ने बुधवार को 13 साल तक चली सुनवाई के बाद 2013 के एक धोखाधड़ी के मामले में एक आरोपी को बरी कर दिया। यह मामला एक कथित तौर पर खराब हो चुके मेडिकल सैंपल से जुड़ा था। अदालत ने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष धोखाधड़ी या बेईमानी के इरादे का कोई भी सबूत पेश करने में नाकाम रहा।
श्रीनगर के तीसरे अतिरिक्त मुंसिफ की अदालत ने फैसला सुनाया कि अगर धोखाधड़ी के लिए उकसाने का कोई सबूत न हो तो सिर्फ मेडिकल सैंपल का खराब हो जाना आरपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। यह चालान 2013 में करण नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा था। यह एफआईआर अब्दुल रहमान वागे नाम के एक व्यक्ति की शिकायत पर दर्ज की गई थी। वागे ने आरोप लगाया था कि एक लैब ने उनकी पत्नी की सर्जरी के बाद लिए गए बायोप्सी सैंपल को ठीक से नहीं संभाला जिससे वह सैंपल इस्तेमाल के लायक नहीं रहा। उन्हें मेडिकल परेशानी का सामना करना पड़ा।
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सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने केवल दो गवाहों के बयान दर्ज करवाए जिनमें वागे भी शामिल थे। अदालत ने गवाहों के बयानों में कई बड़ी विसंगतियां (विरोधाभास) पाईं। इसके अलावा तारीखों और सैंपल को संभालने के तरीके जैसे अहम तथ्यों को लेकर भी स्पष्टता की कमी थी। साथ ही जांच अधिकारी के बयान जैसे कई अहम सबूत भी नदारद थे। सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद किसी भी सामग्री से यह साबित नहीं होता कि आरोपी का कोई बेईमानी का इरादा था या उसने शिकायतकर्ता को किसी तरह की धोखाधड़ी करके उकसाया था। ये दोनों ही बातें आरपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत अपराध साबित करने के लिए बेहद जरूरी होती हैं।
अदालत ने कहा कि यह मामला मुख्य रूप से मेडिकल सैंपल को पेशेवर तरीके से संभालने से जुड़ा है। सैंपल कई कारणों से प्रभावित हो सकता है जैसे कि तापमान या बाहरी माहौल के संपर्क में आना। इसलिए इसे धोखाधड़ी के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इस मामले में एक आरोपी उमर यासीन शाह की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई थी जिसके चलते उसके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी। संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने दूसरे आरोपी मुश्ताक अहमद भट को बरी कर दिया।