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Srinagar News: हाईकोर्ट ने बारामुला जमीन मुआवजा विवाद में याचिकाएं खारिज कीं
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाई कोर्ट ने बारामुला के जिला कलेक्टर के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं जिसमें याचिकाकर्ताओं की नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 की धारा 3एच(4) के तहत रेफरेंस की अपील को खारिज कर दिया गया था।
यह मामला एस्टेट डेलिना में बारामुला-कुपवाड़ा नेशनल हाईवे को चौड़ा करने के लिए अधिग्रहित जमीन को लेकर हुए विवाद से जुड़ा है। याचिकाकर्ता जो मल्ला बेगम के कानूनी वारिस हैं, ने संपत्ति में अपने हिस्से के लिए मुआवजे की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रतिवादी संख्या 5 ने अवैध रूप से जमीन का म्यूटेशन (नामांतरण) केवल अपने नाम पर करवा लिया था।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कलेक्टर ने उनके आवेदन को खारिज करते समय सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया और राजस्व अधिकारियों की रिपोर्ट पर गलत तरीके से भरोसा किया। उन्होंने नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 के प्रावधानों का हवाला दिया।
इस बीच प्रतिवादी संख्या 5 ने यह दावा किया कि वह म्यूटेशन संख्या 1066 (विक्रमी) के तहत जमीन की वैध मालिक है जो 2011 में दर्ज किया गया था और याचिकाकर्ता दशकों तक जमीन के मालिकाना हक के मामले में चुप रहे थे। उन्होंने यह भी बताया कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया नेशनल हाईवे एक्ट के तहत कानूनी रूप से पूरी की गई थी, और मुआवजे (अवार्ड) की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति मोक्षा खजूरिया काजमी की पीठ ने यह टिप्पणी की कि जिला कलेक्टर ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर ही कार्य किया था और विवादित आदेश में किसी भी प्रकार की कोई अवैधता नजर नहीं आती है। संवाद
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यह मामला एस्टेट डेलिना में बारामुला-कुपवाड़ा नेशनल हाईवे को चौड़ा करने के लिए अधिग्रहित जमीन को लेकर हुए विवाद से जुड़ा है। याचिकाकर्ता जो मल्ला बेगम के कानूनी वारिस हैं, ने संपत्ति में अपने हिस्से के लिए मुआवजे की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रतिवादी संख्या 5 ने अवैध रूप से जमीन का म्यूटेशन (नामांतरण) केवल अपने नाम पर करवा लिया था।
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याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कलेक्टर ने उनके आवेदन को खारिज करते समय सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया और राजस्व अधिकारियों की रिपोर्ट पर गलत तरीके से भरोसा किया। उन्होंने नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 के प्रावधानों का हवाला दिया।
इस बीच प्रतिवादी संख्या 5 ने यह दावा किया कि वह म्यूटेशन संख्या 1066 (विक्रमी) के तहत जमीन की वैध मालिक है जो 2011 में दर्ज किया गया था और याचिकाकर्ता दशकों तक जमीन के मालिकाना हक के मामले में चुप रहे थे। उन्होंने यह भी बताया कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया नेशनल हाईवे एक्ट के तहत कानूनी रूप से पूरी की गई थी, और मुआवजे (अवार्ड) की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति मोक्षा खजूरिया काजमी की पीठ ने यह टिप्पणी की कि जिला कलेक्टर ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर ही कार्य किया था और विवादित आदेश में किसी भी प्रकार की कोई अवैधता नजर नहीं आती है। संवाद