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Srinagar News: जल निकायों का सिकुड़ना गंभीर पर्यावरणीय संकट
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- एनवायरनमेंटल पॉलिसी ग्रुप ने जम्मू-कश्मीर में जल निकायों पर जताई चिंता
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। एनवायरनमेंटल पॉलिसी ग्रुप (ईपीजी) ने जम्मू-कश्मीर में जल निकायों के तेजी से सिकुड़ने और गायब होने पर गहरी चिंता जताई है। ग्रुप ने इसे एक गंभीर पर्यावरणीय संकट माना है। इसके लिए नीति निर्माताओं और नियामक अधिकारियों से तत्काल और निर्णायक कार्रवाई की जरूरत है।
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट का जिक्र करते हुए ग्रुप के संयोजक, फैज बख्शी ने कहा कि रिपोर्ट के निष्कर्षों ने उन चिंताओं की पूरी तरह से पुष्टि कर दी है, जिन्हें यह संगठन एक दशक से भी ज्यादा समय से लगातार उठाता आ रहा है। हालांकि, ग्रुप ने आगाह किया कि नुकसान का वास्तविक दायरा आधिकारिक तौर पर दर्ज किए गए आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकता है।
ग्रुप ईपीजी बनाम भारत संघ और अन्य शीर्षक से एक जनहित याचिका पर काम कर रहा है। इसमें पर्यावरण, पारिस्थितिकी और रिमोट सेंसिंग विभाग की ओर से दर्ज किए गए 1230 वेटलैंड्स (आर्द्रभूमियों) के संरक्षण के संबंध में कई आदेश जारी किए गए हैं। इसके बावजूद, वेटलैंड्स, झीलों और जल निकायों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है जिसके पर्यावरण पर गंभीर परिणाम हो रहे हैं। विशेष रूप से बाढ़ के दौरान और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, जिस कारण मौसम चक्र में पहले ही बदलाव आ चुके हैं।
ईपीजी संयोजक ने नारकारा नंबल के लगातार हो रहे क्षरण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच की ओर से यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का उल्लंघन करते हुए इस वेटलैंड को पर्यावरणीय मानदंडों के विपरीत एक आवासीय और व्यावसायिक कॉलोनी में बदला जा रहा है। ईपीजी ने इसे प्रशासनिक निष्क्रियता और संस्थागत विफलता का एक ज्वलंत उदाहरण बताया।
बख्शी ने संयोजक ने हैगाम और शल्लाबुग जैसे प्रमुख वेटलैंड्स की बिगड़ती स्थिति पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि उपेक्षा और कुप्रबंधन के कारण इन पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण आवासों पर गंभीर दबाव पड़ रहा है। मीरगुंड वेटलैंड जो 3-4 साल पहले तक एक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र था, अब अपर्याप्त रखरखाव, पानी की आवक सुनिश्चित करने में विफलता और कर्मचारियों की भारी कमी के कारण काफी हद तक घास के मैदान में बदल गया है।
वेटलैंड्स के रखरखाव की कमी और कुप्रबंधन के कारण अपनी आजीविका के लिए इन पारिस्थितिकी तंत्रों पर निर्भर हजारों लोगों के पास अब आय का कोई स्रोत नहीं बचा है। इससे बेरोजगारी बढ़ गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि होकरसर, हैगम और शल्लाबुग वेटलैंड्स को रामसर कन्वेंशन के तहत अधिसूचित किया गया है। यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। यह संधि रामसर की ओर से अधिसूचित वेटलैंड्स के प्रबंधन और उनके समझदारी भरे उपयोग को अनिवार्य बनाती है। यदि हम ऐसा करने में विफल रहते हैं तो हमें इसका उल्लंघनकर्ता माना जाएगा जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
ईपीजी सवाल उठाता है कि हाल के वर्षों में इन वेटलैंड्स का आकार कैसे और क्यों सिकुड़ गया है जबकि इन वेटलैंड्स और झीलों का क्षेत्रफल रामसर के रिकॉर्ड में दर्ज है। क्या संबंधित विभाग और अधिकारी इस मामले से पूरी तरह अवगत हैं। दक्षिण और उत्तरी कश्मीर में कई वेटलैंड्स और जल निकाय इंसानी दबाव के कारण खत्म हो गए हैं। इनके बड़े हिस्से को धान के खेतों, फलों के बागों और कामर्शियल जगहों में बदल दिया गया है। इसके चलते वेटलैंड्स का रकबा काफी कम हो गया है जिसका सीधा असर जैव विविधता और इकोलॉजिकल संतुलन पर पड़ रहा है।
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श्रीनगर। एनवायरनमेंटल पॉलिसी ग्रुप (ईपीजी) ने जम्मू-कश्मीर में जल निकायों के तेजी से सिकुड़ने और गायब होने पर गहरी चिंता जताई है। ग्रुप ने इसे एक गंभीर पर्यावरणीय संकट माना है। इसके लिए नीति निर्माताओं और नियामक अधिकारियों से तत्काल और निर्णायक कार्रवाई की जरूरत है।
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट का जिक्र करते हुए ग्रुप के संयोजक, फैज बख्शी ने कहा कि रिपोर्ट के निष्कर्षों ने उन चिंताओं की पूरी तरह से पुष्टि कर दी है, जिन्हें यह संगठन एक दशक से भी ज्यादा समय से लगातार उठाता आ रहा है। हालांकि, ग्रुप ने आगाह किया कि नुकसान का वास्तविक दायरा आधिकारिक तौर पर दर्ज किए गए आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकता है।
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ग्रुप ईपीजी बनाम भारत संघ और अन्य शीर्षक से एक जनहित याचिका पर काम कर रहा है। इसमें पर्यावरण, पारिस्थितिकी और रिमोट सेंसिंग विभाग की ओर से दर्ज किए गए 1230 वेटलैंड्स (आर्द्रभूमियों) के संरक्षण के संबंध में कई आदेश जारी किए गए हैं। इसके बावजूद, वेटलैंड्स, झीलों और जल निकायों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है जिसके पर्यावरण पर गंभीर परिणाम हो रहे हैं। विशेष रूप से बाढ़ के दौरान और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, जिस कारण मौसम चक्र में पहले ही बदलाव आ चुके हैं।
ईपीजी संयोजक ने नारकारा नंबल के लगातार हो रहे क्षरण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच की ओर से यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का उल्लंघन करते हुए इस वेटलैंड को पर्यावरणीय मानदंडों के विपरीत एक आवासीय और व्यावसायिक कॉलोनी में बदला जा रहा है। ईपीजी ने इसे प्रशासनिक निष्क्रियता और संस्थागत विफलता का एक ज्वलंत उदाहरण बताया।
बख्शी ने संयोजक ने हैगाम और शल्लाबुग जैसे प्रमुख वेटलैंड्स की बिगड़ती स्थिति पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि उपेक्षा और कुप्रबंधन के कारण इन पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण आवासों पर गंभीर दबाव पड़ रहा है। मीरगुंड वेटलैंड जो 3-4 साल पहले तक एक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र था, अब अपर्याप्त रखरखाव, पानी की आवक सुनिश्चित करने में विफलता और कर्मचारियों की भारी कमी के कारण काफी हद तक घास के मैदान में बदल गया है।
वेटलैंड्स के रखरखाव की कमी और कुप्रबंधन के कारण अपनी आजीविका के लिए इन पारिस्थितिकी तंत्रों पर निर्भर हजारों लोगों के पास अब आय का कोई स्रोत नहीं बचा है। इससे बेरोजगारी बढ़ गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि होकरसर, हैगम और शल्लाबुग वेटलैंड्स को रामसर कन्वेंशन के तहत अधिसूचित किया गया है। यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। यह संधि रामसर की ओर से अधिसूचित वेटलैंड्स के प्रबंधन और उनके समझदारी भरे उपयोग को अनिवार्य बनाती है। यदि हम ऐसा करने में विफल रहते हैं तो हमें इसका उल्लंघनकर्ता माना जाएगा जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
ईपीजी सवाल उठाता है कि हाल के वर्षों में इन वेटलैंड्स का आकार कैसे और क्यों सिकुड़ गया है जबकि इन वेटलैंड्स और झीलों का क्षेत्रफल रामसर के रिकॉर्ड में दर्ज है। क्या संबंधित विभाग और अधिकारी इस मामले से पूरी तरह अवगत हैं। दक्षिण और उत्तरी कश्मीर में कई वेटलैंड्स और जल निकाय इंसानी दबाव के कारण खत्म हो गए हैं। इनके बड़े हिस्से को धान के खेतों, फलों के बागों और कामर्शियल जगहों में बदल दिया गया है। इसके चलते वेटलैंड्स का रकबा काफी कम हो गया है जिसका सीधा असर जैव विविधता और इकोलॉजिकल संतुलन पर पड़ रहा है।