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दिवाली 2018 स्पेशल: इस दिवाली जलाएं ग्रीन पटाखे, त्योहार बन जाएगा खुशबूदार, जानें कैसे
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
Updated Thu, 25 Oct 2018 11:25 AM IST
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दिवाली
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देशभर में पटाखों की बिक्री पर पाबंदी लगाने से इनकार करते हुए कुछ शर्तों के साथ दिवाली पर आतिशबाजी की छूट दी है। दिवाली पर सिर्फ दो घंटे के लिए रात 8 से 10 बजे तक पटाखे जलाए जा सकेंगे। इसके साथ कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि त्योहारों में कम प्रदूषण वाले 'ग्रीन पटाखे' ही जलाए और बेचे जाने चाहिए। जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने कहा कि प्रतिबंधित पटाखे बेचे जाते हैं तो संबंधित इलाके के थाना प्रभारियों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा और उन पर अवमानना का मामला चलेगा।
- फोटो : file photo
ग्रीन पटाखे होते क्या हैं?
ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं, लेकिन इनसे प्रदूषण कम होता है। सामान्य पटाखों की तुलना में इन्हें जलाने पर 40 से 50 फीसदी तक कम हानिकारण गैस पैदा होते हैं।
नीरी के चीफ साइंटिस्ट डॉक्टर साधना रायलू कहती हैं, "इनसे जो हानिकारक गैसें निकलेंगी, वो कम निकलेंगी। 40 से 50 फ़ीसदी तक कम। ऐसा भी नहीं है कि इससे प्रदूषण बिल्कुल भी नहीं होगा पर हां ये कम हानिकारक पटाखे होंगे।"
डॉक्टर साधना बताती हैं कि सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फर गैस निकलती है, लेकिन उनके शोध का लक्ष्य इनकी मात्रा को कम करना था। ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं। नीरी ने कुछ ऐसे फॉर्मूले बनाए हैं जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे।
ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं, लेकिन इनसे प्रदूषण कम होता है। सामान्य पटाखों की तुलना में इन्हें जलाने पर 40 से 50 फीसदी तक कम हानिकारण गैस पैदा होते हैं।
नीरी के चीफ साइंटिस्ट डॉक्टर साधना रायलू कहती हैं, "इनसे जो हानिकारक गैसें निकलेंगी, वो कम निकलेंगी। 40 से 50 फ़ीसदी तक कम। ऐसा भी नहीं है कि इससे प्रदूषण बिल्कुल भी नहीं होगा पर हां ये कम हानिकारक पटाखे होंगे।"
डॉक्टर साधना बताती हैं कि सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फर गैस निकलती है, लेकिन उनके शोध का लक्ष्य इनकी मात्रा को कम करना था। ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं। नीरी ने कुछ ऐसे फॉर्मूले बनाए हैं जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे।
आतिशबाजी
- फोटो : अमर उजाला
कैसे-कैसे ग्रीन पटाखे
डॉक्टर साधना बताती हैं कि उनके संस्थान ने ऐसे फॉर्मूले तैयार किए हैं जिसके जलने के बाद पानी बनेगा और हानिकारक गैस उसमें घुल जाएगी। इन ग्रीन पटाखों की बेहद खास बात है जो सामान्य पटाखों से उन्हें अलग करती है। नीरी ने चार तरह के ग्रीन पटाखे बनाए हैं।
पानी पैदा करने वाले पटाखेः ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे। नीरी ने इन्हें सेफ वाटर रिलीजर का नाम दिया है। पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है। पिछले साल दिल्ली के कई इलाकों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर पानी के छिड़काव की बात कही जा रही थी।
सल्फर और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखेः नीरी ने इन पटाखों को STAR क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ थर्माइट क्रैकर। इनमें ऑक्सीडाइजिंग एजेंट का उपयोग होता है जिससे जलने के बाद सल्फर और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं। इसके लिए खास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है।
कम एल्यूमीनियम का इस्तेमालः इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है। इसे संस्थान ने सेफ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी SAFAL का नाम दिया है।
अरोमा क्रैकर्सः इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ हानिकारण गैस कम पैदा होगी बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे।
डॉक्टर साधना बताती हैं कि उनके संस्थान ने ऐसे फॉर्मूले तैयार किए हैं जिसके जलने के बाद पानी बनेगा और हानिकारक गैस उसमें घुल जाएगी। इन ग्रीन पटाखों की बेहद खास बात है जो सामान्य पटाखों से उन्हें अलग करती है। नीरी ने चार तरह के ग्रीन पटाखे बनाए हैं।
पानी पैदा करने वाले पटाखेः ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे। नीरी ने इन्हें सेफ वाटर रिलीजर का नाम दिया है। पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है। पिछले साल दिल्ली के कई इलाकों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर पानी के छिड़काव की बात कही जा रही थी।
सल्फर और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखेः नीरी ने इन पटाखों को STAR क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ थर्माइट क्रैकर। इनमें ऑक्सीडाइजिंग एजेंट का उपयोग होता है जिससे जलने के बाद सल्फर और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं। इसके लिए खास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है।
कम एल्यूमीनियम का इस्तेमालः इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है। इसे संस्थान ने सेफ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी SAFAL का नाम दिया है।
अरोमा क्रैकर्सः इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ हानिकारण गैस कम पैदा होगी बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे।
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eco-friendly crackers
- फोटो : @sunoneta
कहां मिलेंगे ग्रीन पटाखे
ग्रीन पटाखे फिलहाल भारत के बाजारों में उपलब्ध नहीं हैं। यह नीरी की खोज है और इसे बाजार में आने में काफी वक़्त लग सकता है। इसे बाजार में उतारने से पहले सरकार के सामने इसके गुण और दोष का प्रदर्शन करना होगा जिसके बाद इसे बाजार में उतारने की अनुमति मिलेगी। फिलहाल भारत के बाजारों में पारंपरिक तरीके से पटाखों का निर्माण हो रहा है। हालांकि कुछ केमिकल पर प्रतिबंध लगने के बाद कई तरह के पटाखों का निर्माण बंद हो चुका है। नीरी ने भले ही ग्रीन पटाखे बनाए हों, लेकिन इसके निर्माण की जिम्मेदारी भारतीय बाजारों पर ही होगी। ऐसे में बिना बेहतर प्रशिक्षण के इसे बनाना चुनौती होगी।
ग्रीन पटाखे फिलहाल भारत के बाजारों में उपलब्ध नहीं हैं। यह नीरी की खोज है और इसे बाजार में आने में काफी वक़्त लग सकता है। इसे बाजार में उतारने से पहले सरकार के सामने इसके गुण और दोष का प्रदर्शन करना होगा जिसके बाद इसे बाजार में उतारने की अनुमति मिलेगी। फिलहाल भारत के बाजारों में पारंपरिक तरीके से पटाखों का निर्माण हो रहा है। हालांकि कुछ केमिकल पर प्रतिबंध लगने के बाद कई तरह के पटाखों का निर्माण बंद हो चुका है। नीरी ने भले ही ग्रीन पटाखे बनाए हों, लेकिन इसके निर्माण की जिम्मेदारी भारतीय बाजारों पर ही होगी। ऐसे में बिना बेहतर प्रशिक्षण के इसे बनाना चुनौती होगी।
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crackers
दुनिया में कहा-कहां ग्रीन क्रैकर्स जलाए जाते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने जिस ग्रीन पटाखों के बारे में बात की है उसका इस्तेमाल दुनिया के किसी देश में नहीं होता है। डॉक्टर साधना कहती हैं कि ग्रीन पटाखे का आइडिया भारत का है और अगर इसे बाजारों में उतारा जाता है तो हम दुनिया को एक नई दिशा दे सकते हैं।
वो बताती हैं कि इस दिशा में संस्थान का शोध पूरा हो चुका है और अब मामला सरकारी एजेंसियो के पास है। डॉक्टर साधना कहती हैं, "हमलोगों ने अप्रूवल के लिए पेट्रोलियम तथा विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) को लिखा है। उसकी अनुमति मिलने के बाद इसे बाजार में उतारा जा सकेगा।"
सुप्रीम कोर्ट ने जिस ग्रीन पटाखों के बारे में बात की है उसका इस्तेमाल दुनिया के किसी देश में नहीं होता है। डॉक्टर साधना कहती हैं कि ग्रीन पटाखे का आइडिया भारत का है और अगर इसे बाजारों में उतारा जाता है तो हम दुनिया को एक नई दिशा दे सकते हैं।
वो बताती हैं कि इस दिशा में संस्थान का शोध पूरा हो चुका है और अब मामला सरकारी एजेंसियो के पास है। डॉक्टर साधना कहती हैं, "हमलोगों ने अप्रूवल के लिए पेट्रोलियम तथा विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) को लिखा है। उसकी अनुमति मिलने के बाद इसे बाजार में उतारा जा सकेगा।"