देश के प्रसिद्ध संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा का हाल ही में निधन हो गया। उनका निधन कला और संगीत के क्षेत्र में अपूर्णीय क्षति हैं संगीत और कला के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए शिवकुमार शर्मा का जाना किसी दुखद घटना से कम नहीं है। संतूर का अभ्यास करने वालों के लिए भी पंडित शिवकुमार शर्मा एक पाठ्यपुस्तक की तरह रहे हैं, जिनके निधन से खालीपन दे गया है। कला और संगीत के क्षेत्र के कई दिग्गजों और पंडित शिवकुमार शर्मा के साथ काम कर चुके लोगों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि दी और उनके प्रति अपने विचारों और अनुभवों को साझा किया है।
पंडित शिवकुमार शर्मा स्मृति शेष: पंडित हरिप्रसाद चौरसिया सहित कई दिग्गजों ने किया संतूर के जादूगर को याद
फिल्म संगीत में प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी के साथ शिव-हरि की जोड़ी बनाकर उन्होंने कई लोकप्रिय गीतों का संगीत निर्माण किया।
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दुख से हैं लब सिले हुए
100 तारों की झंकार पर जैसे मानो पूर्ण विराम लग गया। पंडित शिव कुमार शर्मा का जाना सिर्फ एक बड़े कलाकार का अवसान भर नहीं है, संतूर की एक सदी का अपूर्ण रह जाना भी है।
सभी जानते हैं कि पंडित शिव कुमार शर्मा जी ने जम्मू-कश्मीर के लोकवाद्य संतूर को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थान दिलाया और इतना महत्व प्रदान किया कि इसको भी सितार, सरोद जैसे वाद्यों की तरह लोकप्रियता मिली। यह उनके कारण ही संभव हो सका कि संगीत सम्मेलनों में संतूर का प्रदर्शन भी एक जरूरी हिस्सा बन गया। लेकिन एक खास बात मैं यह कहना चाहूंगा कि उनकी जो प्रतिभा और विद्वता थी, उसके कारण कलाकारों के कुनबे में उन्हें विशेष सम्मान प्राप्त था। वास्तव में उन्हें कलाकारों का कलाकार कहना गलत न होगा। इसकी वजह यह थी कि उन्होंने कलाकारों को भी दिशा दिखाने का काम किया। वह पंडित शिव कुमार शर्मा ही थे जिन्होंने प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर के बाद बहुत ही श्रेष्ठ ढंग से अपने साज में लयकारी का प्रदर्शन किया। रूपक में झपताल या तीन ताल बजा देने जैसी कठिन लयकारियों का वे बहुत ही सधा प्रदर्शन करते थे। शायद इसकी वजह यह थी कि उन्होंने तबला भी सीखा था।
वे आरंभ में तबला बजाते थे। मेरे बड़े भाई ने एक बार मुझे बताया था कि आकाशवाणी जम्मू के एक कार्यक्रम में शिव कुमार जी ने उनके सितार में संगत करते हुए तबला बजाया था। संतूर जैसे वाद्य में यह लयकारी बहुत फबती थी। एक और बात कहना चाहूंगा कि सौ तारों वाले संतूर के सभी तारों को मिलाना ही बहुत ध्यान का कार्य होता है। इसके साथ ही इस साज पर दो स्वरों के बीच के अंतराल को संभव कर पाना भी बहुत कठिन है। पंडित शिव कुमार शर्मा ने अपनी कला से इस साज पर भी मींड का आभास दिया। उन्होंने अपने साज की इस कमी को कभी महसूस ही नहीं होने दिया।
फिल्म संगीत में प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी के साथ शिव-हरि की जोड़ी बनाकर उन्होंने कई लोकप्रिय गीतों का संगीत निर्माण किया। हम हर साल मिला करते थे। वे कई दशक तक लगातार अहमदाबाद के सप्तक समारोह में आते रहे। मुझे उनके साथ समय बिताने का अवसर मिलता था। वे बहुत शांत स्वभाव के थे। आने वाली पीढ़ियों को सैकड़ों वर्ष उनके संगीत को समझने में लग जाएंगे।
पंडित विश्व मोहन भट्ट (प्रसिद्ध मोहनवीणा वादक) आलोक पराड़कर से बातचीत पर आधारित
संगीत से जब वे निकलते थे बाहर
वह मेरे पिता जी (उस्ताद विलायत हुसैन खां) के बहुत नजदीक थे, इसलिए बचपन से मैं उनके बहुत नजदीक रहा। मैं उनके साथ बहुत घूमा, कभी विदेश में तो कभी अपने ही देश में। उनके साथ उठता-बैठता था, उनकी सेवा करता था। जब भी वह दिल्ली में होते थे तो एक दिन तो मेरे घर में ही रहते थे। मेरी पत्नी उनकी मनपसंद डिश बनाती और फिर वह हमारे साथ बातचीत करते हुए खाने का लुत्फ लेते थे। मैं तो उनको सुनता था, उनसे सीखता था। शांत स्वभाव तो उनका था ही, साथ में गंभीर बात को भी वह बेहद मजाकिया लहजे में समझा दिया करते थे। वह पूरी तरह से मानवीय गुणों से युक्त शख्सियत थे।
संगीत से बाहर वह यात्राओं और मस्ती की बातें करते थे। कोई छेड़ दे तो संगीत की चर्चा करने लगते थे। वह मेरे हीरो थे, जिनकी सभ्यता, बैठने का तरीका, प्रोफेशनलिज्म मिसाल रही मेरे लिए, बल्कि हम सभी के लिए। उनका जाना मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत गहरा धक्का है और पूरे संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति।
उस्ताद शुजात हुसैन खां (मशहूर सितार वादक) के साथ रघुवीर सिंह की बातचीत पर आधारित।
पंडित शिव कुमार शर्मा, पिता- उमा दत्त शर्मा
जन्म- 13 जनवरी, 1938 (जम्मू), मृत्यु-10 मई, 2022 (मुंबई)
- लोक शास्त्रीय वाद्य संतूर को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया।
- 1955 में मुंबई में संतूर वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन।
- पहला एकल एल्बम 1960 में रिकॉर्ड हुआ।
- पंडित हरि प्रसाद चौरसिया के साथ 'शिव-हरि' नाम से जोड़ी बनाई। सिलसिला (1981), फासले (1985), चांदनी (1989), लम्हे (1991) और डर (1993) जैसी फिल्मों में संगीत दिया।
- 2002 में 'जर्नी विद अ हंड्रेड स्ट्रिंग्स : माई लाइफ इन म्यूजिक' शीर्षक से आत्मकथा प्रकाशित।
- शास्त्रीय संगीत एल्बम 'कॉल ऑफ द वैली' के लिए 'प्लैटिनम डिस्क'।
- 1985 में अमेरिका के बाल्टीमोर शहर की मानद नागरिकता।
सम्मान
1986 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1990 में महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार, 1991 में पद्म श्री से सम्मानित, 2001 में पद्म विभूषण।
जीवन की हर खूबसूरत याद के लिए पापा का शुक्रिया!
जब मैं छोटा था, तो किसी भी बच्चे की तरह मेरे पिता मेरे रोल मॉडल थे, लेकिन मां बताती है कि पिताजी कुछ अलग ही सोचते थे। वह कहते थे, “यह जरूरी नहीं है कि हमेशा बड़े संगीतकार का बेटा बड़ा संगीतकार बनेगा। यह कई जन्मों का संयम होता है। रियाज से उसमें समझ पैदा होती है, लेकिन अगर उसमें संस्कार नहीं हैं, तो वह चाहे किसी भी महान कलाकार का लड़का क्यों न हो, वह संगीतकार नहीं बन पाता।” इसी सोच की वजह से उन्होंने मुझे बचपन से संगीत नहीं सिखाया। वह पहले यह देखना चाहते थे कि मेरी रुचि संगीत में है या नहीं। मेरे बड़े भाई रोहित ने संगीत नहीं सीखा। लेकिन जब मैं 10-11 साल का था तो पिताजी को लगने लगा कि मैं संगीत सीख सकता हूं। एक दिन मां को उन्होंने कहा, “अगर अब हम राहुल को नहीं सिखाएंगे, तो यह उसके साथ अन्याय होगा।” पढ़ने के साथ-साथ मेरी तालीम शुरू हुई। शुरुआत में मेरी दिलचस्पी कंपोजिंग में ज्यादा थी, लेकिन धीरे-धीरे मुझे संतूर वादन पसंद आने लगा। पापा ने ही फिल्मी म्यूजिक में संतूर वादन की शुरुआत की और मुंबई में बड़े-बड़े संगीत निर्देशकों के साथ काम किया।
एक सोलो क्लासिकल वाद्ययंत्र को इस स्तर पर पहुंचाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। वह एक अलग दर्शक वर्ग में संतूर को लेकर गए। पापा से ही सीखकर मैंने भी अपनी तरफ से कुछ कोशिशें शुरू की। ऐसे बहुत से मौके आए हैं, जब हमने एक साथ प्रस्तुति दी। कंसर्ट के लिए हमने दुनिया भर में यात्राएं की। साल 2011 में म्यूजिशियन केन्नीजी के साथ मेरी जुगलबंदी से उन्हें बहुत खुशी हुई थी।
एक पिता या गुरु के रूप में उन्होंने कभी मुझे अपनी फोटोकॉपी नहीं बनाना चाहा। जहां तक सवाल संगीत का है, उन्होंने ही मुझे सिखाया है। ठीक उसी समय उन्होंने बतौर कलाकार मुझे अपने आप आगे बढ़ने दिया। मेरे पिता ने संतूर को क्लासिकल वाद्य यंत्र का दर्जा दिलाने के लिए जिंदगी भर संघर्ष किया। यह कश्मीरी फोक इंस्ट्रूमेंट था, उन्होंने कुछ इनोवेशन करके इसे फाइन-ट्यूनिंग इंस्टमेंट में विकसित किया। साठ साल पहले किसी ने संतूर नहीं सुना था। आज यह वाद्ययंत्र दुनिया भर में संगीत की दुनिया का अभिन्न अंग है, लेकिन प्रेजेंटेशन के मामले में उन्होंने कभी संतूर के संगीत से समझौता नहीं किया। सिर्फ संगीत की शिक्षा के लिए ही नहीं, जीवन की हर खूबसूरत याद के लिए मैं उन्हें शुक्रिया कहना चाहूंगा।
(संतूर वादक राहुल शर्मा से अमर उजाला के लिए यह बातचीत कुछ दिन पहले हुई थी।)