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उपलब्धि: पिता करते हैं दूसरे के खेतों में किसानी, बेटी ने चार गोल्ड मेडल किए अपने नाम, पढ़ाई के लिए छोड़ा गांव
Thu, 27 Aug 2026 11:31 AM IST
Ishwar Ashish Bhartiya
अभिषेक सहज, अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक सहज, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Ishwar Ashish Bhartiya
Updated Thu, 27 Aug 2026 11:31 AM IST
सार
बीबीएयू के दीक्षांत समारोह में सीतापुर की प्रभा चंद्रा को आरडी सोनकर अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने चार गोल्ड मेडल अपने नाम किए।
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बीबीएयू की छात्रा प्रभा चंद्रा व मां रेनू, पिता निर्मल।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
कुछ दिनों की बात है, यह वक्त भी गुजर जाएगा...। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह स्टेटस एक ऐसी बेटी का है जिसके पिता दूसरों के खेत बंटाई पर लेकर किसानी करते हैं और उसने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के 29 अगस्त को होने वाले दीक्षांत समारोह से पहले चार गोल्ड मेडल अपने नाम किए हैं।
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सीतापुर की तहसील सिधौली के गांव भेड़ड्या की होनहार प्रभा चंद्रा ने पढ़ाई के लिए चार भाई-बहनों के साथ दस साल पहले गांव छोड़ दिया था। दीक्षांत समारोह में प्रभा को बीए और एमए में टॉप करने के लिए गोल्ड मेडल के लिए चयनित किया गया है।
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प्रभा ने बीबीएयू के सेटेलाइट सेंटर अमेठी से वर्ष 2024 में बीए में टॉप किया था। इसके बाद 2026 में एमए इतिहास में एससी के साथ ओपन कैटेगरी में भी टॉप किया। इन तीन गोल्ड मेडल के साथ उन्हें विवि के प्रतिष्ठित आरडी सोनकर अवॉर्ड के लिए भी चुना गया है। यह अवॉर्ड ऐसे मेधावी को दिया जाता है जिसने सोशल साइंस स्कूल में पढ़ाए जाने वाले पांचों विषयों में भी टॉप किया हो। प्रभा ने यह भी कर दिखाया है।
पांच भाई-बहनों में चौथे नंबर की प्रभा ने बताया कि हमने पढ़ाई के लिए लखनऊ में किराये के घर में रहना शुरू किया था। बड़ा भाई आईटीआई पूरी करके ट्रेनिंग कर रहा है। बड़ी बहन फूड टेक्नोलॉजी से एमएससी करके नौकरी कर रही है। दूसरी बड़ी बहन ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है। छोटे भाई ने लविवि से स्नातक किया है।
पीएचडी करने के बाद आईएएस अफसर बनने का है सपना
प्रभा ने बताया कि वह पीएचडी करने के बाद सिविल सेवा परीक्षा में बैठेंगी। इसके लिए तैयारी शुरू कर दी है। प्रभा ने कहा, मेरा सपना है कि आईएएस अफसर बनकर माता-पिता का नाम रोशन करूं। उन्होंने बताया कि बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए उनके पिता निर्मल चंद्रा ने दूसरे के खेतों में किसानी की और मां रेनू ने भी उनकी मदद की। उनके त्याग के बल पर ही आज यह मुकाम हासिल किया है।