अमर उजाला संवाद: साइना नेहवाल बोलीं- बैटमिंटन नहीं था पसंद, पीटी ऊषा ने कहा- मेरे पास दौड़ने को नहीं था ट्रैक
Amar Ujala Samvad: साइना ने कहा कि मेरी दादी चाहती थी कि लड़का हो, लेकिन मैं हुईं। इसलिए पापा और मम्मी की इच्छा थी कि मैं कुछ करके दिखाऊं।
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देश की दिग्गज महिला बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने कहा कि सच बोलूं तो कभी यह नहीं सोचा था कि शटलर बनकर देश के लिए ओलंपिक में पदक जीतूंगी। शौक कब कॅरिअर में बदला, पता ही नहीं चला। इसमें मां (ऊषा) का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने मुझे चीन की दीवार को लांघकर ओलंपिक पदक जीतने की प्रेरणा दी। आज जो भी हूं, मां की बदौलत हूं।
साइना ने कहा कि बचपन में जब मेरे पिता का ट्रांसफर हैदराबाद में हुआ, तो दोस्तो का साथ छूट जाने को लेकर बहुत दुखी हो गई थी। शुरुआत में कराटे की ट्रेनिंग की, जो पसंद नहीं आई। मां मुझे बैडमिंटन सिखाने ले गई और वहीं से मेरा बैडमिंटन में मन रम गया। देश के लिए कई पदक जीते, लेकिन लंदन ओलंपिक (वर्ष 2012) में कांस्य पदक जीतना हमेशा याद रहेगा।
शटलर न होती तो शायद टेनिस खिलाड़ी बनती
जिस तरह मेरी मां मुझे खिलाड़ी बनाने में जुटी थी तो कोई मतलब नहीं था कि मैं खिलाड़ी न बनती। हालांकि अगर बैडमिंटन में सफलता नहीं मिलती तो शायद टेनिस खिलाड़ी बन जाती, क्योंकि रोजर फेडरर और मारिया शारापोवा मेरे पसंदीदा खिलाड़ी हैं, और उनकी तरह मैं भी देश का नाम रोशन करना चाहती हूं।
खेल में कोई रीटेक नहीं होता
साइना ने कहा कि देखिए, मेहनत का कोई शॉर्टकट नहीं होता है। साथ ही यहां कोई रीटेक नहीं होता। एक बार में मिले मौके को भुनाना होता है। अगर आपको कामयाब खिलाड़ी बनना है तो प्रेशर में जीतना सीखना होगा। आज के समय में सुविधाओं के साथ खेल का स्तर भी बढ़ा है। अगर आपको जीतना है तो दिन में आठ से दस घंटे ट्रेनिंग करनी होगी। ऐसा नहीं कर सकते तो खेल में जाने का कोई फायदा नहीं।
पानी पूरी और आलू का पराठा मेरी कमजोरी
एक खिलाड़ी होने के कारण अपनी डाइट का बहुत ख्याल रखना होता है। हालांकि खुद को पानी पूरी और आलू का पराठा खाने से नहीं रोक पाती हूं। मीठा और आइस्क्रीम भी बहुत पसंद है, लेकिन ज्यादा नहीं खाती हूं। खिलाड़ी होने के नाते हमें अपना ख्याल रखना होता है, ताकि ट्रेनिंग सही ढंग से हो सके।
पारुपल्ली ने हमेशा दिया साथ
साइना ने अपने पति और दिग्गज शटलर पारुपल्ली कश्यप के बारे में कहा कि मां की तरह पारुपल्ली ने भी मुझे बेहतर खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। ट्रेनिंग के दौरान हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाया। मेरे विचार से पुरुष बैडमिंटन में पदक जीतना मुश्किल है, नहीं तो आज उनके पास भी पदकों का अंबार होता।
आईओए में बदल रहा माहौल : पीटी ऊषा
भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन (आईओए) की अध्यक्ष और देश की महानतम एथलीट पीटी ऊषा कहती हैं कि एक वक्त वह भी हुआ करता था, जब आईओए में अपनी बात रखने के लिए खिलाड़ियों के पसीने छूट जाते थे। वर्तमान में एसोसिएशन का स्वरूप ही बदल गया है। आज खिलाड़ी सीधे आकर मुझसे बात करते हैं और उनकी समस्याओं का समाधान तुरंत करने का प्रयास किया जाता है। शायद यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रदर्शन में सुधार आया है। जहां तक इसी साल होने वाले पेरिस ओलंपिक का सवाल है, तो मुझे पूरा विश्वास है कि इस बार भारतीय दल की पदक संख्या में इजाफा होगा।
लॉस एंजिल्स में पदक से चूकने का आज भी मलाल
पीटी ऊषा कहती हैं कि मुझे लॉस एंजिल्स ओलंपिक (1984) की 400 मीटर बाधा दौड़ में कांस्य से चूकने का मलाल आज भी है। ओलंपिक दौड़ने से पहले महज तीन बार 400 मीटर बाधा दौड़ में हिस्सा लिया था। स्टार्ट खराब होने के कारण शुरुआती तीन बाधा के बाद मैं अन्य एथलीटों से काफी पिछड़ गई थी। चौथी बाधा को पार करने के बाद पूरा दम लगा दिया, लेकिन फिनिश लाइन पर अनुभव की कमी के चलते मामूली अंतर से कांस्य से चूक गई। आज भी उस दौड़ को याद करती हूं तो आंख में आंसू आ जाते हैं।
बदल चुका है खेल परिदृश्य
पीटी ऊषा ने कहा कि आज का खेल परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। तब सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं था। बस तेज दौड़ना मेरी खासियत थी। शायद यही कारण रहा कि 16 साल की उम्र में देश के लिए पहली बार खेलने का मौका मिला। मौजूदा दौर में एथलीटों के उच्च स्तरीय ट्रेनिंग के अलावा विदेशी कोच तक उपलब्ध हैं। बेहतर सुविधाओं से परिणाम भी आना शुरू हो गए हैं।
स्कूल पर नहीं दे पा रही ध्यान
ओलंपिक में पदक से चूक जाने के कारण मैंने अपना ट्रेनिंग सेंटर बनाया। मेरी इच्छा है कि केरल के कोझिकोड में बने एथलेटिक्स स्कूल से कोई खिलाड़ी निकलकर ओलंपिक पदक जीते, तो लगेगा कि मैंने ओलंपिक पदक जीत लिया। आईओए में अध्यक्ष बनने के बाद अपने स्कूल के लिए समय नहीं निकाल पा रही हूं। कोशिश है कि कुछ समय स्कूल के लिए निकालकर फिर से ट्रेनिंग देना शुरू करूं ताकि ओलंपिक चैंपियन तैयार करने का सपना पूरा कर सकूं।