अमर उजाला संवाद: योगीराज अरुण बोले- दिवाली की रात मुझे राम का चेहरा दिखा, जो दीपों की आभा लिए हुए था
अमर उजाला संवाद कार्यक्रम का पहला सत्र राम मंदिर से राष्ट्र मंदिर विषय पर केंद्रित रहा। इस सेशन में राज्यसभा सांसद डा सुधांशु त्रिवेदी, रामलला की प्रतिमा बनाने वाले मूर्तिकार अरुण योगीराज और आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण मौजूद रहे।
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आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा कि अयोध्या ने बहुत आंसू बहाएं हैं। बधाई इस बात की अयोध्या ने अपने आप को धन्य कर लिया है। राम ने उन आंसुओं को तीर्थ में परिवर्तित कर दिया है। आचार्य नंदिनी शरण ने कहा कि राम के आगमन से अयोध्या में उत्सव नहीं है। मैं देश के जिस कोने में जा रहा हूं वहां ये उत्सव मनाया जा रहा है।
राज्यसभा सांसद सुंधाशु त्रिवेदी ने कहा कि जब हम बच्चे थे तो हम एक नारा सुन रहे थे कि सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वही बनाएंगे। यह नारा हम बचपन से सुन रहे थे जब यह पूरा हुआ तो खुशी की कोई सीमा नहीं रही।
राम की आंखे कैसे तराशी
बालक राम की वह आंखें कैसे तराशी इस सवाल के जवाब में योगीराज ने कहा कि मैंने पत्थर के साथ इतना समय बिताया कि मैं पत्थर से बात कर लेता हूं। नेत्र तराशने से पहले सरयू नदी में स्नान करके हनुमान गढ़ी में दर्शन करना है। मैंने बहुत सारी आंखे बनाई हैं लेकिन उस समय मैं ब्लैंक हो गया था। मैंने राम से ही निवेदन किया कि आप जैसी आंखें चाहते हैं वैसी आंखें बनवा लीजिए। मैं उन आंखों को देश के साथ कनेक्ट करना चाहता था। यह भगवान की कृपा है कि वह नेत्र सबको अच्छे लग रहे हैं।
राम मंदिर कोई इमारत नहीं थी
सरयू का एक नाम नेत्रजा है। वे भगवान के नेत्रों से प्रकट हुई हैं।
उन्होंने कहा कि 22 जनवरी के बाद निरंतर यात्राएं करनी पड़ रही हैं। देश श्रीराम से इस तरह जुड़ा हुआ है, यह पहले अनुभव नहीं हुआ। अभी राजस्थान गया था। वहां लोगों ने कहा कि रामलला अयोध्या में ही नहीं आए, हमारे यहां भी आए। राजा राम लौटकर जब अयोध्या आए और भरत ने जब राज्य उन्हें लौटाया तो कहा कि मां की जिद पर आपने राज्य लौटा दिया था। अब अवसर है कि मैं आपको यह राज्य लौटा दूं। जब तक नक्षत्र मंडल विद्यमान रहें, तब तक आप इस लोक के शासक होकर विद्यमान रहें। भरत की प्रतिज्ञा कैसे व्यर्थ हो सकती थी। श्रीराम ने उस प्रतिज्ञा को चरितार्थ करने के लिए फिर से अवतार लिया है।
पांच वर्ष के बालक के साथ राम भी चाहिए था
योगीराज अरुण ने कहा कि हमें पांच साल के बालक का रूप भी देना था और राम की गंभीरता भी लेकर आनी थी। इसके लिए मैंने बच्चों के साथ बहुत समय बिताया है। ताकि मैं समझ सकूं कि पांच साल का बच्चा आखिर होता कैसा है। यह पहली बार था कि मैं इसको लेकर नर्वस था। दीवाली की रात मैं अयोध्या में था। उसी रात मुझे दीपों की रोशनी में राम का चेहरा मिला।