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Lucknow News: बुद्ध ने दी अपना मार्ग स्वयं बनाने की सीख
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बीएनए में नाटक का मंचन करते कलाकार।
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लखनऊ। भारतेंदु नाट्य अकादमी के स्वर्ण जयंती समारोह के चौथे दिन बुधवार को राज बिसारिया प्रेक्षागृह में विजय मिश्र के ओड़िया नाटक ‘तट निरंजना’ पर आधारित ‘निर्माण से निर्वाण तक’ नाटक का मंचन किया गया। यह नदी के भू-आकृति विज्ञान को रूपक के रूप में उपयोग कर गौतम बुद्ध के मन के चरणों को दर्शाता है। नीललोहित और इच्छामती जैसे पात्र बुद्ध के युवावस्था के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंत में बुद्ध पुत्र राहुल को अपना मार्ग स्वयं बनाने की सीख देते हैं। नाटक का निर्देशन बीएनए के निदेशक बिपिन कुमार ने किया।
नाटक में नीललोहित भ्रमित पात्र है, जबकि इच्छामती दृढ़ विचारों वाली है। नदी के पहले चरण में नीललोहित आनंद के नियमों और इच्छामती के मुक्त विचारों के बीच उलझा रहता है। दूसरे दृश्य में सुजाता और इच्छामती के प्रश्नों से गौतम बुद्ध व्यग्र हो उठते हैं। नाटक उनके आंतरिक संघर्ष को दर्शाता है। बुद्ध, सुजाता और इच्छामती के सवालों से परेशान होकर मानवीय इच्छाओं की असीमता पर विचार करते हैं। बुद्ध पत्नी यशोधरा से मिलते हैं, लेकिन यह मुलाकात व्यर्थ साबित होती है। यशोधरा और आनंद को चिंता है कि बुद्ध की नई शिक्षाएं जनता को भ्रमित कर सकती हैं। आनंद उन्हें आम जनता की भलाई के लिए चुप रहने की सलाह देते हैं।
अंत में बुद्ध राहुल को अपना मार्ग खुद बनाने की सीख देते हैं। नाटक के शुरुआती और अंतिम दृश्यों में बुद्ध पूर्ण मौन धारण कर निर्वाण प्राप्त करते हैं। यह नदी के समुद्र में विलीन होकर अपना अस्तित्व खोने के रूपक से बुद्ध के निर्वाण को दर्शाता है। मंच पर प्रदीप शिवहरे, वैष्णवी सेठ, धीरज कुमार, आशुतोष जायसवाल, श्रुतिकीर्ति सिंह, भावना द्विवेदी, कौस्तुभी शर्मा, राजर्षि राय, अर्घ्य सामंत, चैतन्य महाप्रभु त्रिपाठी, अमित हरिश्चंद्र आदि ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं।
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नाटक में नीललोहित भ्रमित पात्र है, जबकि इच्छामती दृढ़ विचारों वाली है। नदी के पहले चरण में नीललोहित आनंद के नियमों और इच्छामती के मुक्त विचारों के बीच उलझा रहता है। दूसरे दृश्य में सुजाता और इच्छामती के प्रश्नों से गौतम बुद्ध व्यग्र हो उठते हैं। नाटक उनके आंतरिक संघर्ष को दर्शाता है। बुद्ध, सुजाता और इच्छामती के सवालों से परेशान होकर मानवीय इच्छाओं की असीमता पर विचार करते हैं। बुद्ध पत्नी यशोधरा से मिलते हैं, लेकिन यह मुलाकात व्यर्थ साबित होती है। यशोधरा और आनंद को चिंता है कि बुद्ध की नई शिक्षाएं जनता को भ्रमित कर सकती हैं। आनंद उन्हें आम जनता की भलाई के लिए चुप रहने की सलाह देते हैं।
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अंत में बुद्ध राहुल को अपना मार्ग खुद बनाने की सीख देते हैं। नाटक के शुरुआती और अंतिम दृश्यों में बुद्ध पूर्ण मौन धारण कर निर्वाण प्राप्त करते हैं। यह नदी के समुद्र में विलीन होकर अपना अस्तित्व खोने के रूपक से बुद्ध के निर्वाण को दर्शाता है। मंच पर प्रदीप शिवहरे, वैष्णवी सेठ, धीरज कुमार, आशुतोष जायसवाल, श्रुतिकीर्ति सिंह, भावना द्विवेदी, कौस्तुभी शर्मा, राजर्षि राय, अर्घ्य सामंत, चैतन्य महाप्रभु त्रिपाठी, अमित हरिश्चंद्र आदि ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं।

बीएनए में नाटक का मंचन करते कलाकार।

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