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लखनऊ: धर्मांतरण और धमकी का चलता रहा खेल, केजीएमयू प्रशासन रहा खामोश; एसटीएफ की जांच में होश उड़ाने वाले खुलासे
Mon, 02 Nov 2026 08:08 AM IST
Bhupendra Singh
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: Bhupendra Singh
Updated Mon, 02 Nov 2026 08:08 AM IST
सार
एसटीएफ की जांच में लखनऊ के केजीएमयू में पिछले कुछ वर्षों में चले धर्मांतरण के बड़े खेल का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों और कर्मचारियों की संलिप्तता सामने आई है। मामले के तार एरा मेडिकल कॉलेज से भी जुड़ रहे हैं, और पीड़ितों की शिकायतों को दबाने तथा प्रशासनिक लापरवाही के गंभीर आरोप सामने आए हैं जिस पर 6 नवंबर को बैठक बुलाई गई है।
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केजीएमयू में धर्मांतरण।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
एसटीएफ की जांच में राजधानी लखनऊ के केजीएमयू में धर्मांतरण का पूरा खेल उजागर कर दिया। वह भी सिर्फ छह-सात महीने के भीतर। धर्मांतरण कराने वालों से लेकर सहयोगियों आदि को बेनकाब कर दिया। ऐसे में सवाल है कि आखिर केजीएमयू प्रशासन क्यों बेखबर रहा? प्रशासन जानबूझकर अनजान रहा या फिर बेखबर रहा, ये सबसे बड़ा सवाल है। अगर मामले में केस दर्ज होता है तो विवेचना की जद में और भी कई लोग आ सकते हैं, जिनमें कई डॉक्टर और कर्मचारी हो सकते हैं।
पिछले साल दिसंबर में डॉ. रमीज पर धर्मांतरण का केस दर्ज हुआ था। वह भी तब, जब पीड़िता ने काफी हिम्मत दिखाई थी और राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव ने मामले को जोर-शोर से उठाया था। वह मुख्यमंत्री से भी मिलकर जांच की मांग की थी। तब शासन ने प्रकरण की जांच एसटीएफ को सौंप दी थी।
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पिछले साल दिसंबर में डॉ. रमीज पर धर्मांतरण का केस दर्ज हुआ था। वह भी तब, जब पीड़िता ने काफी हिम्मत दिखाई थी और राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव ने मामले को जोर-शोर से उठाया था। वह मुख्यमंत्री से भी मिलकर जांच की मांग की थी। तब शासन ने प्रकरण की जांच एसटीएफ को सौंप दी थी।
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डॉक्टरों व अन्य कर्मचारियों की भूमिका
एसटीएफ ने छह-सात महीने के बाद गहनता से तफ्तीश की। सर्विलांस के जरिये तथ्य जुटाए। पीड़ितों के बयान भी लिए और उनसे सबूत भी इकट्ठा किए। इसके बाद शासन को रिपोर्ट भेजी, जिसमें दर्जनभर डॉक्टरों व अन्य कर्मचारियों की भूमिका सामने आने की बात कही गई है।ऐसे में सवाल है कि संस्थान में इतना कुछ हो रहा था। वह भी इतने वर्षों से, तो आखिर प्रशासन ने इसको लेकर कार्रवाई क्यों नहीं की। प्रशासन खामोश क्यों रहा। अगर विभागीय जांच हो तो प्रशासनिक जिम्मेदारों की भी भूमिका स्पष्ट हो सकेगी।
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पीड़ितों ने खुद किया बेनकाब
एसटीएफ की जांच रिपोर्ट में जो तथ्य दर्ज हैं, उससे एक बात एकदम साफ है कि पीड़ितों ने खुद डॉक्टरों और कर्मचारियों को बेनकाब किया है। उन्होंने खुलकर आपबीती बताई। यहां तक कि एसटीएफ ने ऐसे भी केस खोज निकाले, जिनमें पीड़िता ने बताया कि उसका शोषण किया गया। जब शिकायत की गई तो उसको ही नौकरी से निकाल दिया गया। इससे ये भी स्पष्ट है कि जिम्मेदारों को मामलों की जानकारी थी, लेकिन कार्रवाई नहीं की।कार्रवाई न करने से बढ़ती गई हिम्मत
जांच में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें पीड़िता को ही धमकाया, डराया गया, जिससे वह शिकायत न करे। फिर मामला दबा दिया गया। अगर मामलों में शुरू से ही कार्रवाई होती तो इतनी अधिक घटनाएं घटित नहीं होतीं। जिन डॉक्टरों व कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, शायद वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। प्रशासनिक लापरवाही व अनदेखी की वजह से वे मनबढ़ होते गए और हिंदू महिला डॉक्टर व कर्मी प्रताड़ित किए जाते रहे।
केजीएमयू प्रवक्ता डॉ. के.के सिंह ने कहा कि छह नवंबर को मामले की जांच के लिए कार्यपरिषद की बैठक प्रस्तावित है। बैठक में धर्मांतरण प्रकरण की एसटीएफ रिपोर्ट रखी जाएगी। रिपोर्ट में शामिल डॉक्टरों और अन्य लोगों के खिलाफ अलग-अलग अनुशासनात्मक जांच कमेटियां गठित करने का प्रस्ताव रखा जाएगा। इसके बाद जांच और कार्रवाई की दिशा तय होगी।
एरा मेडिकल कॉलेज से भी जुड़े धर्मांतरण के तार
एसटीएफ की जांच रिपोर्ट में केजीएमयू में धर्मांतरण के मामलों के तार एरा मेडिकल कॉलेज से जुड़ने का खुलासा हुआ है। कुलपति की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई गई है। मामला गृह विभाग तक पहुंचने के बाद इस प्रकरण में आगे की कार्रवाई को लेकर हलचल तेज हो गई है। रिपोर्ट में निजी मेडिकल संस्थान में केजीएमयू के कई डॉक्टरों के आर्थिक निवेश की बात भी कही गई है।
एसटीएफ की रिपोर्ट के मुताबिक, एरा मेडिकल कॉलेज के कुलपति पहले केजीएमयू में मेडिसिन विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि केजीएमयू में धर्मांतरण से जुड़ी करीब 80 फीसदी घटनाएं वर्ष 2006 से 2012 के बीच हुईं। उस दौरान संबंधित कुलपति मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष थे। एसटीएफ ने अपनी जांच में इस अवधि और उनकी भूमिका को लेकर कई सवाल उठाए हैं।
जांच रिपोर्ट में केजीएमयू में धर्मांतरण या मुस्लिम समुदाय से जुड़े मामलों की जांच के लिए गठित होने वाली कमेटियों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कमेटी के सदस्यों के नाम मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष के माध्यम से कुलपति तक पहुंचाए जाते थे। इससे जांच समितियों के गठन और उनकी निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। एसटीएफ ने इसे जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की संभावित कड़ी के रूप में देखा है।
कुछ डॉक्टरों पर कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होने के आरोप
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि केजीएमयू के कई डॉक्टरों ने निजी मेडिकल कॉलेज में आर्थिक निवेश कर रखा है। एसटीएफ ने इस नेटवर्क के केंद्र में मेडिसिन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष की भूमिका होने की बात कही है। इसके अलावा एक अन्य निजी विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों से जुड़े कुछ डॉक्टरों पर कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होने के आरोप भी रिपोर्ट में दर्ज हैं।जांच रिपोर्ट में केजीएमयू में धर्मांतरण या मुस्लिम समुदाय से जुड़े मामलों की जांच के लिए गठित होने वाली कमेटियों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कमेटी के सदस्यों के नाम मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष के माध्यम से कुलपति तक पहुंचाए जाते थे। इससे जांच समितियों के गठन और उनकी निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। एसटीएफ ने इसे जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की संभावित कड़ी के रूप में देखा है।