सुना है क्या: माननीय से भी मांगा सुविधा शुल्क, पब्लिक सब जानती है; 'छन्न से टूटा कोई सपना' के पढ़ें किस्से
यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'माननीय से भी मांगा सुविधा शुल्क'की कहानी। इसके अलावा 'पब्लिक सब जानती है' और 'छन्न से टूटा कोई सपना' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...
माननीय से भी मांगा सुविधा शुल्क
अनाज बांटने वाले महकमे की कमान जब से नए माननीय के हाथ आई है, तब से अधिकारियों ने क्रय केंद्र वालों का सुविधा शुल्क बढ़ा दिया है। चर्चा है कि नया रेट 60 हजार तय किया गया है। इसका खुलासा तब हुआ जब क्षेत्रीय स्तर के अधिकारी के यहां से माननीय के पुराने दल वाले पड़ोसी जिले के एक दूसरे माननीय द्वारा खुलवाए गए केंद्र संचालक से भी सुविधा शुल्क मांग लिया गया।
संचालक ने बताया कि केंद्र माननीय का है लेकिन अधिकारी टस से मस नहीं हुआ। माननीय ने शासन वाले बड़े साहब को फोन किया कि आप कहें तो सुविधा शुल्क वहीं भिजवा दूं। इससे माननीय का शुल्क तो माफ हो गया लेकिन 600 से अधिक केंद्रों से वसूली की चर्चा जोरों पर है।
पब्लिक सब जानती है
आयोग वाले साहब ने पूरे देश से खबरनवीसों को जुटाया। फिर बोले, ये बातें मैं जनता के लिए छापने के लिए नहीं कह रहा हूं। बातें जनता से ही जुड़ी थीं। अब ऐसा कहां होता है कि नाटक में बंदूक हो और न चले। खबरनवीस के लिए जनता से जुड़ी खबर हो और न चले। वैसे भी पुराना गाना है- यह पब्लिक है सब जानती है।
छन्न से टूटा कोई सपना
एक माफिया के साथ नदी किनारे आशियाने बनाकर बेचने का एक ब्यूरोक्रेट का सपना छन्न से टूट गया। उनके प्रभाव में प्राधिकरण नदी का दायरा भुलाकर अनुमतियां देता रहा। इस बीच मामला दिल्ली के एक बड़े ट्रिब्यूनल पहुंच गया, जिसने सबकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। खुद को ब्यूरोक्रेट का रिश्तेदार बताने वाला माफिया बर्बाद होने की कगार पर है। लिहाजा दूसरी हरी डाल तलाशने में जुट गया है। शायद वहां से कुछ राहत मिल जाए।