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लविवि : 106 साल की विरासत में महिला नेतृत्व के 14 अध्याय
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लविवि
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रविशंकर गुप्ता
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के 106 साल के सफर में महिला नेतृत्व ने 14 अहम पड़ाव पार कर लिए हैं। अर्थशास्त्र विभाग में 106 साल बाद पहली महिला विभागाध्यक्ष बनने के साथ अब विश्वविद्यालय के 51 विभागों में से 14 की कमान महिलाओं के हाथ में है। यह बदलाव बताता है कि विश्वविद्यालय की लंबी शैक्षणिक यात्रा में महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिका लगातार बढ़ रही है। हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि कई प्रमुख विभागों में अब तक महिला प्रोफेसर विभागाध्यक्ष की कुर्सी तक नहीं पहुंच सकी हैं।
बीते बृहस्पतिवार को अर्थशास्त्र विभाग में प्रो. रोली मिश्रा ने विभागाध्यक्ष का कार्यभार संभाला। 106 साल के इतिहास में पहली बार किसी महिला को यह जिम्मेदारी मिलना विभाग के साथ-साथ विश्वविद्यालय में महिला नेतृत्व के लिहाज से भी अहम पड़ाव है।
वर्तमान में अंग्रेजी एवं आधुनिक यूरोपीय भाषाएं, मनोविज्ञान, लोक प्रशासन, मानवशास्त्र, पाश्चात्य इतिहास, शारीरिक शिक्षा, प्राच्य संस्कृत, वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित एवं खगोल विज्ञान, व्यावसायिक प्रशासन/प्रबंधन, महिला एवं जेंडर अध्ययन संस्थान और अब अर्थशास्त्र विभाग की कमान महिलाओं के हाथ में है।
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लेकिन 14 विभागों तक पहुंची यह तस्वीर अभी पूरी नहीं है।
पत्रकारिता व जनसंचार, समाज कार्य, अरबी, फारसी, प्राचीन भारतीय इतिहास व पुरातत्व, ललित कला संकाय, योग व वैकल्पिक चिकित्सा जैसे विभागों में आज तक महिला प्रोफेसर विभागाध्यक्ष नहीं बन सकी हैं। वाणिज्य विभाग में भी ऐतिहासिक रूप से महिला विभागाध्यक्ष का अभाव रहा है। यहां मुख्य वाणिज्य विभाग की कमान पारंपरिक रूप से पुरुष प्राध्यापकों के पास रही है। हाल ही में अगस्त 2026 में प्रो. अवधेश कुमार को यह दायित्व सौंपा गया है।
भौतिक विज्ञान विभाग को भी अब तक महिला विभागाध्यक्ष नहीं मिला है। हालांकि विज्ञान संकाय के पुराने और बड़े विभागों जैसे वनस्पति विज्ञान और प्राणि विज्ञान में महिला प्राध्यापकों ने विभागाध्यक्ष का पद संभाला है, लेकिन भौतिक विज्ञान जैसे पारंपरिक कोर विभाग में यह पद मुख्य रूप से पुरुष प्राध्यापकों के अधीन ही रहा है। (संवाद)
वरिष्ठता की सीढ़ी से तय होती है विभागाध्यक्ष की कुर्सी
विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष का पद पदोन्नति या सीधी नियुक्ति से नहीं, बल्कि वरिष्ठता चक्र के अनुसार विभाग के सबसे वरिष्ठ प्रोफेसरों को तीन-तीन वर्ष के कार्यकाल के आधार पर दिया जाता है। करीब 50-60 साल पहले विश्वविद्यालय के कुछ विभागों में महिला प्राध्यापकों की भर्ती कम संख्या में हुई थी। इसके कारण वरिष्ठता सूची में शीर्ष तक पहुंचने में महिलाओं को लंबा समय लगा।
इन विभागों की कमान महिलाओं के हाथ में
अर्थशास्त्र: प्रो. रोली मिश्रा
अंग्रेजी एवं आधुनिक यूरोपीय भाषाएं: प्रो. नाजनीन खान
मनोविज्ञान: डॉ. अर्चना शुक्ला
लोक प्रशासन: प्रो. वैशाली सक्सेना
मानवशास्त्र: डॉ. केया पांडेय
पाश्चात्य इतिहास: प्रो. अमिता सोनकर
शारीरिक शिक्षा: डॉ. शशी कनौजिया
प्राच्य संस्कृत: डॉ. प्रेरणा माथुर
वनस्पति विज्ञान: प्रो. गौरी सक्सेना
प्राणि विज्ञान: प्रो. अमिता कनौजिया
रसायन विज्ञान: डॉ. आभा विश्नोई
गणित एवं खगोल विज्ञान: डॉ. मीना सहाय
व्यावसायिक प्रशासन/प्रबंधन: डॉ. रितु नारंग
महिला एवं जेंडर अध्ययन संस्थान: डॉ. मानिनी श्रीवास्तव
कोट:
बदलते वक्त के साथ लखनऊ विश्वविद्यालय भी बदल रहा है। जैसे-जैसे समाज के हर क्षेत्र में महिलाओं को प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है, उसी अनुपात में लखनऊ विश्वविद्यालय में भी बढ़ रहा है। भविष्य में यह अंतर और घटेगा।
- प्रो. मुकुल श्रीवास्तव, प्रवक्ता, लखनऊ विश्वविद्यालय
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लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के 106 साल के सफर में महिला नेतृत्व ने 14 अहम पड़ाव पार कर लिए हैं। अर्थशास्त्र विभाग में 106 साल बाद पहली महिला विभागाध्यक्ष बनने के साथ अब विश्वविद्यालय के 51 विभागों में से 14 की कमान महिलाओं के हाथ में है। यह बदलाव बताता है कि विश्वविद्यालय की लंबी शैक्षणिक यात्रा में महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिका लगातार बढ़ रही है। हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि कई प्रमुख विभागों में अब तक महिला प्रोफेसर विभागाध्यक्ष की कुर्सी तक नहीं पहुंच सकी हैं।
बीते बृहस्पतिवार को अर्थशास्त्र विभाग में प्रो. रोली मिश्रा ने विभागाध्यक्ष का कार्यभार संभाला। 106 साल के इतिहास में पहली बार किसी महिला को यह जिम्मेदारी मिलना विभाग के साथ-साथ विश्वविद्यालय में महिला नेतृत्व के लिहाज से भी अहम पड़ाव है।
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वर्तमान में अंग्रेजी एवं आधुनिक यूरोपीय भाषाएं, मनोविज्ञान, लोक प्रशासन, मानवशास्त्र, पाश्चात्य इतिहास, शारीरिक शिक्षा, प्राच्य संस्कृत, वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित एवं खगोल विज्ञान, व्यावसायिक प्रशासन/प्रबंधन, महिला एवं जेंडर अध्ययन संस्थान और अब अर्थशास्त्र विभाग की कमान महिलाओं के हाथ में है।
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लेकिन 14 विभागों तक पहुंची यह तस्वीर अभी पूरी नहीं है।
पत्रकारिता व जनसंचार, समाज कार्य, अरबी, फारसी, प्राचीन भारतीय इतिहास व पुरातत्व, ललित कला संकाय, योग व वैकल्पिक चिकित्सा जैसे विभागों में आज तक महिला प्रोफेसर विभागाध्यक्ष नहीं बन सकी हैं। वाणिज्य विभाग में भी ऐतिहासिक रूप से महिला विभागाध्यक्ष का अभाव रहा है। यहां मुख्य वाणिज्य विभाग की कमान पारंपरिक रूप से पुरुष प्राध्यापकों के पास रही है। हाल ही में अगस्त 2026 में प्रो. अवधेश कुमार को यह दायित्व सौंपा गया है।
भौतिक विज्ञान विभाग को भी अब तक महिला विभागाध्यक्ष नहीं मिला है। हालांकि विज्ञान संकाय के पुराने और बड़े विभागों जैसे वनस्पति विज्ञान और प्राणि विज्ञान में महिला प्राध्यापकों ने विभागाध्यक्ष का पद संभाला है, लेकिन भौतिक विज्ञान जैसे पारंपरिक कोर विभाग में यह पद मुख्य रूप से पुरुष प्राध्यापकों के अधीन ही रहा है। (संवाद)
वरिष्ठता की सीढ़ी से तय होती है विभागाध्यक्ष की कुर्सी
विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष का पद पदोन्नति या सीधी नियुक्ति से नहीं, बल्कि वरिष्ठता चक्र के अनुसार विभाग के सबसे वरिष्ठ प्रोफेसरों को तीन-तीन वर्ष के कार्यकाल के आधार पर दिया जाता है। करीब 50-60 साल पहले विश्वविद्यालय के कुछ विभागों में महिला प्राध्यापकों की भर्ती कम संख्या में हुई थी। इसके कारण वरिष्ठता सूची में शीर्ष तक पहुंचने में महिलाओं को लंबा समय लगा।
इन विभागों की कमान महिलाओं के हाथ में
अर्थशास्त्र: प्रो. रोली मिश्रा
अंग्रेजी एवं आधुनिक यूरोपीय भाषाएं: प्रो. नाजनीन खान
मनोविज्ञान: डॉ. अर्चना शुक्ला
लोक प्रशासन: प्रो. वैशाली सक्सेना
मानवशास्त्र: डॉ. केया पांडेय
पाश्चात्य इतिहास: प्रो. अमिता सोनकर
शारीरिक शिक्षा: डॉ. शशी कनौजिया
प्राच्य संस्कृत: डॉ. प्रेरणा माथुर
वनस्पति विज्ञान: प्रो. गौरी सक्सेना
प्राणि विज्ञान: प्रो. अमिता कनौजिया
रसायन विज्ञान: डॉ. आभा विश्नोई
गणित एवं खगोल विज्ञान: डॉ. मीना सहाय
व्यावसायिक प्रशासन/प्रबंधन: डॉ. रितु नारंग
महिला एवं जेंडर अध्ययन संस्थान: डॉ. मानिनी श्रीवास्तव
कोट:
बदलते वक्त के साथ लखनऊ विश्वविद्यालय भी बदल रहा है। जैसे-जैसे समाज के हर क्षेत्र में महिलाओं को प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है, उसी अनुपात में लखनऊ विश्वविद्यालय में भी बढ़ रहा है। भविष्य में यह अंतर और घटेगा।
- प्रो. मुकुल श्रीवास्तव, प्रवक्ता, लखनऊ विश्वविद्यालय