फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   One Nation, One Election: 'Repeated elections harm every sector of government, with schools the worst affected

एक देश एक चुनाव: 'बार-बार चुनाव होने से सरकार के हर सेक्टर को नुकसान, सबसे ज्यादा प्रभावित स्कूल'

Wed, 15 Jul 2026 08:48 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजााल नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजााल नेटवर्क, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Wed, 15 Jul 2026 08:48 PM IST
सार

One country one election: संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष एवं भाजपा सांसद पीपी चौधरी ने एक देश एक चुनाव की वकालत करते हुए कहा कि बार-बार चुनाव से नुकसान होता है। 
 

विज्ञापन
One Nation, One Election: 'Repeated elections harm every sector of government, with schools the worst affected
एक देश एक चुनाव को लेकर सर्वदलीय बैठक। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष एवं भाजपा सांसद पीपी चौधरी ने कहा कि देश में बार-बार चुनाव होने से हर सेक्टर को नुकसान हो रहा है। सबसे ज्यादा शिक्षा क्षेत्र प्रभावित होता है। चुनावों में शिक्षकों की ड्यूटी से स्कूलों का कैलेंडर बिगड़ जाता है। सामर्थ्यवान लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजते। इसलिए एक राष्ट्र-एक चुनाव की दिशा में तेजी से कार्य किया जा रहा है।

विज्ञापन


पीपी चौधरी ने बुधवार को लखनऊ के होटल ताज में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हमारा लक्ष्य है कि वर्ष 2029 में पूरे देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों। इसके लिए आवश्यक संवैधानिक व कानूनी संशोधन किए जाएंगे। यह किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं, बल्कि राष्ट्रहित से जुड़ा व्यापक चुनावी सुधार है, जिससे लोकतंत्र और शासन व्यवस्था दोनों मजबूत होंगे।
विज्ञापन

 
उन्होंने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी लंबे समय से एक देश-एक चुनाव की अवधारणा का समर्थन करते रहे हैं। बार-बार होने वाले चुनाव देश के विकास, प्रशासनिक कार्यों और अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। लगातार चुनावी प्रक्रिया के कारण बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू होती है, जिससे विकास परियोजनाएं प्रभावित होती हैं और सरकारी मशीनरी का बड़ा हिस्सा चुनावी कार्यों में व्यस्त हो जाता है। अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे तो समय, संसाधनों और सरकारी धन की बचत होगी और शासन अधिक प्रभावी ढंग से चल सकेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन


जेपीसी अध्यक्ष ने कहा कि देश में एक साथ चुनाव कोई नई व्यवस्था नहीं है। स्वतंत्रता के बाद 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा तथा अधिकांश राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे। उस समय न ईवीएम थीं और न ही आज जैसी तकनीकी सुविधाएं। मतदान बैलेट पेपर से कराया जाता था। बाद में विभिन्न कारणों से यह चुनावी चक्र टूट गया। कुछ राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ, कुछ विधानसभाएं समय से पहले भंग हो गईं और नए राज्यों के गठन के कारण चुनावों का समय अलग-अलग हो गया। इसके बाद आपातकाल के दौरान लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया गया, जिससे चुनावों का कैलेंडर पूरी तरह प्रभावित हो गया।

मतदाता के भ्रमित होने की आशंका अनुचित

पीपी चौधरी ने कहा कि मतदाता राजनीतिक रूप से परिपक्व है। कई बार राजनीतिक दल और विश्लेषक चुनाव परिणामों का अनुमान लगाते हैं, लेकिन नतीजे अलग आते हैं क्योंकि भारतीय मतदाता स्वतंत्र रूप से सोचकर मतदान करता है। यह तर्क देना उचित नहीं है कि यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे तो मतदाता भ्रमित हो जाएगा। 1952 से 1967 तक करोड़ों मतदाताओं ने एक साथ दोनों चुनावों में मतदान किया था। इस तरह की आशंका का कोई ठोस आधार नहीं है।

एक साथ चुनाव के लिए बेहतर प्रबंधन मुमकिन
ईवीएम और चुनावी तैयारियों को लेकर पूछे गए सवाल पर पीपी चौधरी ने कहा कि आज तकनीक पहले की तुलना में काफी उन्नत है। यदि चुनाव आयोग को लगभग छह महीने पहले तैयारी का समय मिल जाए तो वह पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने में पूरी तरह सक्षम है। पहले बैलेट पेपर से चुनाव सफलतापूर्वक होते थे, जबकि आज आधुनिक तकनीक और बेहतर चुनावी प्रबंधन उपलब्ध है। संयुक्त संसदीय समिति सभी सुझावों और आपत्तियों का गंभीरता से अध्ययन कर रही है। समिति का प्रयास है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए ऐसी रिपोर्ट तैयार की जाए, जिससे भविष्य में देश में एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था प्रभावी और व्यवहारिक रूप से लागू की जा सके।

न संघीय व्यवस्था और न लोकतंत्र के खिलाफ एकसाथ चुनाव कराना : जेपीसी अध्यक्ष

जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन आपत्तियों का भी जवाब दिया जिनमें कहा जाता है कि एक देश-एक चुनाव संविधान के मूल ढांचे, संघीय व्यवस्था या लोकतंत्र के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि यदि 1952 से 1967 तक एक साथ चुनाव होने पर लोकतंत्र या संघीय ढांचे का उल्लंघन नहीं हुआ था, तो आज ऐसा तर्क देना केवल राजनीतिक बहस का हिस्सा है। 1967 के बाद भी कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ होते रहे। इसलिए यह कहना कि एक साथ चुनाव भारतीय लोकतंत्र की भावना के विपरीत हैं, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

उन्होंने कहा कि एक राष्ट्र-एक चुनाव संबंधी बिल पर जनसामान्य की आपत्तियां और सुझाव भी ऑनलाइन आमंत्रित करेंगे। एक देश-एक चुनाव का विचार किसी एक सरकार की देन नहीं है। कई संवैधानिक संस्थाओं और विशेषज्ञ समितियों ने समय-समय पर इसकी सिफारिश की है। वर्ष 1983 में चुनाव आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की अनुशंसा की थी। 2015 में संसद की विधि एवं कार्मिक संबंधी स्थायी समिति, जिसकी अध्यक्षता कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कर रहे थे, ने भी अपनी रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया था। इसके अलावा नीति आयोग ने 2018 में अपनी रिपोर्ट में इस दिशा में कदम बढ़ाने की सिफारिश की।

जेपीसी अध्यक्ष ने कहा कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2020 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। इस समिति में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राज्यसभा सांसद गुलाम नबी आजाद सहित कई विशेषज्ञ और संवैधानिक मामलों के जानकार शामिल थे। समिति ने विभिन्न राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों, चुनाव आयोग, संवैधानिक संस्थाओं और अन्य हितधारकों से व्यापक चर्चा की। करीब 18 हजार पेज से अधिक की रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपी गई। समिति ने अपनी रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की और स्थानीय निकायों के चुनाव भी निर्धारित समयसीमा में कराने का सुझाव दिया।

संसद से जेपीसी तक पहुंचा विधेयक

पीपी चौधरी ने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों पर विचार करने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संबंधित विधेयकों को मंजूरी दी। इसके बाद इन्हें संसद में पेश किया गया। संसद में विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने विचार रखे और व्यापक चर्चा के बाद विधेयकों को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेज दिया गया ताकि सभी पक्षों की राय लेकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा सके। समिति का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में रिपोर्ट देना नहीं है, बल्कि सभी हितधारकों से सुझाव लेकर देशहित में ठोस अनुशंसाएं करना है। विधेयक में जो भी कमियां दूर होंगी, उन्हें दूर करने के लिए भी संस्तुतियां की जाएंगी।

10 राज्यों का दौरा कर चुकी है समिति
जेपीसी अध्यक्ष ने बताया कि समिति देशभर में विभिन्न राज्यों का दौरा कर रही है। अब तक उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, गोवा और उत्तर प्रदेश समेत करीब 10 राज्यों का दौरा किया जा चुका है। इन दौरों के दौरान मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, राजनीतिक दलों, विधि विशेषज्ञों और विभिन्न संगठनों से सुझाव लिए गए हैं। उत्तर प्रदेश के दौरे में भी कई महत्वपूर्ण सुझाव प्राप्त हुए हैं। समिति अभी केवल सभी पक्षों की बात सुन रही है और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है। प्राप्त सुझावों का अध्ययन करने के बाद अंतिम रिपोर्ट तैयार की जाएगी।

बार-बार चुनाव होने से विकास कार्य प्रभावित होते
पीपी चौधरी ने कहा कि समिति के सामने सबसे बड़ा प्रश्न किसी राजनीतिक दल का हित नहीं, बल्कि राष्ट्रहित है। अगर बार-बार चुनाव होने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं, निवेश का माहौल कमजोर पड़ता है और सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है तो इस व्यवस्था में सुधार पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। देश के उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और आधारभूत संरचना से जुड़े कार्यों पर लगातार चुनावी प्रक्रिया का असर पड़ता है। बार-बार चुनाव होने से प्रशासनिक अधिकारियों और सुरक्षा बलों की बड़ी संख्या चुनाव ड्यूटी में लग जाती है। यदि चुनाव एक साथ होंगे तो इन संसाधनों का बेहतर उपयोग विकास कार्यों में किया जा सकेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed