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Lucknow News: खुले नाले, गोमती के तली में जमी गाद और लचर एसटीपी व्यवस्था बनी गोमती की दुश्मन
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गोमती नदी का हाल।
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विनीत चतुर्वेदी
लखनऊ। राजधानी के पर्यावरणविदों का कहना है कि जीवनदायिनी गोमती को बचाना है तो सबसे पहले इसमें सीधे गिरते ठोस कचरे को रोकना होगा। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के संचालन की लचर व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा। इसके साथ ही गोमती के बहाव क्षेत्र के दो किमी के दायरे और इसकी सहायक नदियों के आसपास मौजूद लगभग 10 हजार तालाब और झीलों को पुनर्जीवित करना होगा। उप्र. स्टेट वेटलैंड अथॉरिटी को इस काम में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
नदी विशेषज्ञ और पर्यावरणविद डॉ. वेंकटेश दत्ता का कहना है कि गोमती पर अब आगे रिवरफ्रंट जैसी त्रासदीपूर्ण योजनाओं को दोहराने की गलती से बचना होगा। उन्होंने सुझाया कि शहर के सभी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का संचालन महज कागजों में नहीं, बल्कि शत प्रतिशत ईमानदारी से धरातल पर उतारना होगा। नदी में गिरते नालों के मुंह पर जाली लगानी होगी।
नदी की तली से निकालनी होगी हजारों ट्रक जमी गाद
डॉ. दत्ता के अनुसार गोमती की तली में वर्षों से जमा हजारों ट्रक गाद उसकी जलधारण क्षमता और प्रवाह को प्रभावित कर रही है। उनका सुझाव है कि नदी की गाद को वैज्ञानिक तरीके से निकालकर दूर निस्तारित किया जाए। इससे नदी की जल वहन क्षमता बढ़ेगी और बाढ़ का खतरा भी कम होगा। विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि नदी की प्राकृतिक गहराई बहाल नहीं हुई तो अत्यधिक वर्षा के दौरान शहर को गंभीर जलभराव और बाढ़ जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
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10 हजार तालाब और झीलों के पुनर्जीवन पर जोर
नदी विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद डॉ. वेंकटेश दत्ता का कहना है कि गोमती को पुनर्जीवित करने के लिए केवल नदी की सफाई पर्याप्त नहीं होगी। गोमती और उसकी सहायक नदियों के दोनों ओर दो किलोमीटर के दायरे में स्थित करीब 10 हजार तालाबों और झीलों को पुनर्जीवित करना होगा। आज इनमें से बड़ी संख्या अतिक्रमण, अवैध कब्जों और उपेक्षा के कारण सूखने या खत्म होने के कगार पर है। गोमती की सहायक सरायन नदी जो गोमती में सीतापुर में मिलती है, इसके दो किलोमीटर क्षेत्र में ही 956 तालाब और झीलें मौजूद हैं। ये जलाशय नदी के प्राकृतिक जलभरण और प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
गोमती के प्रवाह क्षेत्र में तालाब व झीलों की स्थिति
हरदोई - 4,000
लखीमपुर खीरी- 2,000
सीतापुर -2,000
लखनऊ- 1,344
सीवेज, प्लास्टिक और नाले सबसे बड़ी चुनौती
पर्यावरणविद आलोक सिंह के अनुसार, गोमती में प्रतिदिन लगभग 10 मीट्रिक टन ठोस अपशिष्ट, प्लास्टिक, घरेलू कचरा और निर्माण सामग्री पहुंच रही है। हैदर नाला, कुकरैल और अन्य बड़े नालों से गिरने वाला पानी भी नदी को प्रदूषित कर रहा है।
जल संकट की चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि पीलीभीत से लेकर लखनऊ तक गोमती के बहाव क्षेत्र में बढ़ते अतिक्रमण, सिकुड़ते वेटलैंड और भूजल दोहन ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। गोमती के प्रवाह में चार दशकों में करीब 40 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि अतिक्रमण हटाने, वेटलैंड संरक्षण, सीवेज शोधन और ठोस कचरा प्रबंधन पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो लाखों लोगों की प्यास बुझाने वाली गोमती आने वाले वर्षों में और बड़े जल संकट का कारण बन सकती है।
लखनऊ। राजधानी के पर्यावरणविदों का कहना है कि जीवनदायिनी गोमती को बचाना है तो सबसे पहले इसमें सीधे गिरते ठोस कचरे को रोकना होगा। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के संचालन की लचर व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा। इसके साथ ही गोमती के बहाव क्षेत्र के दो किमी के दायरे और इसकी सहायक नदियों के आसपास मौजूद लगभग 10 हजार तालाब और झीलों को पुनर्जीवित करना होगा। उप्र. स्टेट वेटलैंड अथॉरिटी को इस काम में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
नदी विशेषज्ञ और पर्यावरणविद डॉ. वेंकटेश दत्ता का कहना है कि गोमती पर अब आगे रिवरफ्रंट जैसी त्रासदीपूर्ण योजनाओं को दोहराने की गलती से बचना होगा। उन्होंने सुझाया कि शहर के सभी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का संचालन महज कागजों में नहीं, बल्कि शत प्रतिशत ईमानदारी से धरातल पर उतारना होगा। नदी में गिरते नालों के मुंह पर जाली लगानी होगी।
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नदी की तली से निकालनी होगी हजारों ट्रक जमी गाद
डॉ. दत्ता के अनुसार गोमती की तली में वर्षों से जमा हजारों ट्रक गाद उसकी जलधारण क्षमता और प्रवाह को प्रभावित कर रही है। उनका सुझाव है कि नदी की गाद को वैज्ञानिक तरीके से निकालकर दूर निस्तारित किया जाए। इससे नदी की जल वहन क्षमता बढ़ेगी और बाढ़ का खतरा भी कम होगा। विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि नदी की प्राकृतिक गहराई बहाल नहीं हुई तो अत्यधिक वर्षा के दौरान शहर को गंभीर जलभराव और बाढ़ जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
10 हजार तालाब और झीलों के पुनर्जीवन पर जोर
नदी विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद डॉ. वेंकटेश दत्ता का कहना है कि गोमती को पुनर्जीवित करने के लिए केवल नदी की सफाई पर्याप्त नहीं होगी। गोमती और उसकी सहायक नदियों के दोनों ओर दो किलोमीटर के दायरे में स्थित करीब 10 हजार तालाबों और झीलों को पुनर्जीवित करना होगा। आज इनमें से बड़ी संख्या अतिक्रमण, अवैध कब्जों और उपेक्षा के कारण सूखने या खत्म होने के कगार पर है। गोमती की सहायक सरायन नदी जो गोमती में सीतापुर में मिलती है, इसके दो किलोमीटर क्षेत्र में ही 956 तालाब और झीलें मौजूद हैं। ये जलाशय नदी के प्राकृतिक जलभरण और प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
गोमती के प्रवाह क्षेत्र में तालाब व झीलों की स्थिति
हरदोई - 4,000
लखीमपुर खीरी- 2,000
सीतापुर -2,000
लखनऊ- 1,344
सीवेज, प्लास्टिक और नाले सबसे बड़ी चुनौती
पर्यावरणविद आलोक सिंह के अनुसार, गोमती में प्रतिदिन लगभग 10 मीट्रिक टन ठोस अपशिष्ट, प्लास्टिक, घरेलू कचरा और निर्माण सामग्री पहुंच रही है। हैदर नाला, कुकरैल और अन्य बड़े नालों से गिरने वाला पानी भी नदी को प्रदूषित कर रहा है।
जल संकट की चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि पीलीभीत से लेकर लखनऊ तक गोमती के बहाव क्षेत्र में बढ़ते अतिक्रमण, सिकुड़ते वेटलैंड और भूजल दोहन ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। गोमती के प्रवाह में चार दशकों में करीब 40 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि अतिक्रमण हटाने, वेटलैंड संरक्षण, सीवेज शोधन और ठोस कचरा प्रबंधन पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो लाखों लोगों की प्यास बुझाने वाली गोमती आने वाले वर्षों में और बड़े जल संकट का कारण बन सकती है।

गोमती नदी का हाल।

गोमती नदी का हाल।