UP: राजस्थान पुलिस ने मृत आरोपी के वारंट पर सिपाही को उठाया, 166 दिन जेल में रहा, 25 हजार का बताया था इनामी
अदालत ने पुलिस को भविष्य में अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन रोकना है। जिस अखिलेश त्रिपाठी के खिलाफ वारंट था, वह अलीगंज, लखनऊ का निवासी था।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
राजस्थान के सवाई माधोपुर पुलिस ने एक बड़ी चूक की है। उन्होंने करीब 26 साल पहले मर चुके व्यक्ति के खिलाफ जारी वारंट पर एक सिपाही को गिरफ्तार कर लिया। लखनऊ सुरक्षा में तैनात सिपाही अखिलेश त्रिपाठी को 15 फरवरी 2026 को पकड़ा गया था। उन्हें 16 फरवरी 2026 को जेल भेज दिया गया, जहां वह 166 दिनों तक रहे।
सिपाही अखिलेश को 1 अगस्त 2026 को रिहा किया गया। हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने इस मामले में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पुलिस को भविष्य में अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन रोकना है। जिस अखिलेश त्रिपाठी के खिलाफ वारंट था, वह अलीगंज, लखनऊ का निवासी था। उसका मूल निवास देवरिया में था। उसने अलीगंज के पते पर एक फर्म पंजीकृत कराई थी। इसी फर्म के जरिये धोखाधड़ी के मामले में सवाई माधोपुर में केस दर्ज हुआ था। वारंट में आरोपी अखिलेश के पिता का नाम विश्वनाथ दर्ज था।
ये भी पढ़ें - ग्राउंड रिपोर्ट: दोगुना हुआ लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर चलने का समय, 63 किमी लंबे मार्ग पर 64 गड्ढे
ये भी पढ़ें - अयोध्या: राम मंदिर CEO के लिए साक्षात्कार पूरे, आए थे साढ़े पांच हजार से ज्यादा आवेदन; ये लगाएंगे अंतिम मुहर
गलत पहचान और गिरफ्तारी : वारंट वाला अखिलेश त्रिपाठी 17 सितंबर 1998 को ही मर चुका था। इसके बावजूद राजस्थान पुलिस ने नाम से मिलती-जुलती जानकारी के आधार पर सिपाही अखिलेश त्रिपाठी को गिरफ्तार किया। पुलिस ने आरोपी को 25 हजार रुपये का इनामी बताया था। गिरफ्तारी की सूचना लखनऊ पुलिस को नहीं दी गई थी। सिपाही अखिलेश ने पुलिस को गलतफहमी के बारे में बताया था, पर उनकी बात नहीं सुनी गई। पुलिस ने बिना तस्दीक किए उन्हें जेल भेज दिया, जबकि पिता के नाम अलग थे। मामले में कमांडेट से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुआ। ब्यूरो
एसपी ने गलती मानी: हाईकोर्ट में सिपाही की ओर से बताया गया कि वह वारंट में वांछित व्यक्ति नहीं हैं। अदालत ने भी माना कि जारी वारंट और वर्तमान आवेदक के बीच कोई संबंध नहीं था। मामले की सुनवाई के दौरान सवाई माधोपुर की पुलिस अधीक्षक ज्येष्ठा मैत्रेयी अदालत में पेश हुईं। उन्होंने स्वीकार किया कि सही पहचान नहीं होने के कारण सिपाही अखिलेश की गिरफ्तारी हुई। पुलिस के अनुरोध पर संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत उन्हें पहले ही रिहा कर चुकी थी।
नहीं दी जा रही जॉइनिंग
जेल से छूटने के बाद सिपाही अखिलेश सीधे लखनऊ आए। उन्होंने अपने कमांडेंट से मुलाकात की, लेकिन उन्हें जॉइनिंग नहीं कराई गई। इसके बाद वह पुलिस महानिरीक्षक से भी मिले, पर वहां से भी जॉइनिंग नहीं मिली। अखिलेश अब अपनी जॉइनिंग के लिए इधर-उधर चक्कर लगा रहे हैं। उनके पास हाईकोर्ट के आदेश सहित सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध हैं।
डीआईजी पीएसी सुनीता सिंह का कहना है कि सिपाही मेरे पास नहीं आया। मुझे इसके बारे में जानकारी भी नहीं है। वैसे भी जॉइनिंग कमांडेंट स्तर से ही होगी।