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सुना है क्या: "पावर वाले अफसर का फ्यूज उड़ा", "मुखिया का पुरानों पर भरोसा", "काम में थोड़े कच्चे हैं साहब"
Sun, 25 Oct 2026 03:03 PM IST
Ishwar Ashish Bhartiya
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: Ishwar Ashish Bhartiya
Updated Sun, 25 Oct 2026 03:03 PM IST
सार
"सुना है क्या" कॉलम में आज पावर कॉरिडोर के उन किस्सों की चर्चा जो कि लगातार बातचीत का केंद्र बने हुए हैं। एक विभाग के अफसर को अंदाजा था कि चहेते को कुर्सी मिलते ही सब ठीक हो जाएगा पर वो कुर्सी मिलते ही पलट गया। पढ़ें ये किस्से:
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विस्तार
यूपी के पावर कॉरिडोर में हर रोज कुछ न कुछ घटित होता रहता है जिनकी चर्चा लगातार होती रहती है। आज चर्चा कुछ ऐसे ही किस्सों की। प्रदेश के पावर वाले विभाग के एक अफसर जिन्हें अपने चहेते के मुख्य कुर्सी पर बैठने से करिश्मे की आस थी लेकिन मामला ही पूरा उल्टा पड़ गया। वहीं, विश्वविद्यालय के एक मुखिया नए लोगों पर भरोसा ही नहीं कर पा रहे हैं। इसके साथ ही चर्चा एक साहब की जिनकी कार्यशैली को लेकर सवाल उठ रहे हैं और उन्हें काम में कच्चा बताया जा रहा है। पढ़ें, ये किस्से:
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पावर वाले अफसर का फ्यूज उड़ा
पावर वाले विभाग के एक अफसर की बेचैनी बढ़ती जा रही है। उन्हें उम्मीद थी कि मुख्य कुर्सी पर उनके चहेते के बैठते ही करिश्मा हो जाएगा। न सिर्फ उनकी पावर बढ़ेगी, बल्कि वे मुखिया के सबसे प्यारे शागिर्द भी बन जाएंगे। कुछ दिन तक वह इस आशय के बयान भी देते रहे, लेकिन मुखिया ने कुर्सी संभालते ही पैंतरा बदल दिया। कल तक जो सबसे खास था, वह बेगाना हो गया है। अब पावर बढ़ने की उम्मीद लगाए बैठे अफसर परेशान हैं। वह खुद ही लोगों से कह रहे हैं कि करंट आना बंद हो गया है। अब तो वह न घर के रहे, न घाट के।
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मुखिया का पुरानों पर भरोसा
प्रदेश के एक प्रमुख विश्वविद्यालय में मुखिया के भरोसे की आजकल काफी चर्चा है। विश्वविद्यालय में कई प्रमुख पद रिक्त हैं, लेकिन तैनाती नहीं हो पा रही है। मुखिया को नए लोगों पर भरोसा नहीं हो पा रहा है। ऐसे में वह पुराने लोगों को ही अतिरिक्त प्रभार देकर कामकाज चलाने में जुटे हैं। हालांकि, बदलते तकनीकी दौर में ये लोग कदमताल नहीं कर पा रहे हैं।
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अपने काम में थोड़े कच्चे हैं साहब
केंद्रीय खेल मंत्रालय की यूपी में सबसे बड़ी शाखा में तैनात साहब की कार्यशैली औरों से जुदा है। उनका काम विभाग की योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना है, लेकिन अधिकतर मामलों में उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाती है। बड़े आयोजनों के दौरान उनका आत्मविश्वास भी डगमगा जाता है। खेलों से कम जुड़ाव के कारण उनकी जानकारी कागजों तक ही सीमित है। लिहाजा, वह अपने काम के साथ ठीक से सामंजस्य नहीं बैठा पाते हैं। जब तक किसी से काम न पड़े, वह अपने दायरे में ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि साहब काम में थोड़े कच्चे हैं।
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