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सुना है क्या: 'बंटने वाली है रेवड़ी' की कहानी, साथ ही आई एम सेफ उपाधि और नंबर 2 वाले साहब की अकुलाहट के किस्से

अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Mon, 16 Mar 2026 08:21 AM IST
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सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

suna hai kya impending handout of freebies story along with I Am Safe and restlessness of Number 2 figure
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'बंटने वाली है रेवड़ी' की कहानी। इसके अलावा 'यूं ही आई एम सेफ उपाधि नहीं' और 'नंबर 2 वाले साहब की अकुलाहट' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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बंटने वाली है रेवड़ी

भगवा दल में पदों की रेवड़ी बंटने वाली है। ऐसे में कई नेता बड़ी कुर्सी के लिए जुगाड़ तंत्र को साधने में जुटे हैं। ऐसे ही पार्टी के एक भोंपू को भी अब माइक पर बोलना रास नहीं आ रहा है। इसलिए वह माइक छोड़कर बड़ी कुर्सी पाने को आतुर हैं। हालांकि, भोंपू रहने के दौरान नौकरशाही में उनका जलवा कायम रहा, लेकिन वह चाहते हैं कि पार्टी में महामंत्री की कुर्सी मिल जाए तो कुछ बड़ा काम हो जाए। ये वही भोंपू हैं जो इन दिनों जिलों में घूम-घूमकर प्रशिक्षण दे रहे हैं। इनके प्रशिक्षण की वजह से ही रोशनी देने वाले महकमे के मंत्रीजी की दूसरी बार सरकार बनने पर बत्ती गुल हो गई थी।

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यूं ही आई एम सेफ उपाधि नहीं

एक नौकरशाह पर बीते एक साल से लगे ग्रहण का असर कम हुआ तो नौकरशाहों के जलजले की कहानी सबकी जुबां पर तैरने लगी। राजनेता भी कहने लगे कि इन्हें यूं ही आई एम सेफ नहीं कहा जाता है। अब भला जिम्मेदारों से कौन पूछे कि मामला उजागर होने के बाद जिन बड़े साहब ने मौके पर जाकर जांच रिपोर्ट दी थी, उन्होंने क्या देखा था। जिन पुलिस अफसरों ने पूछताछ और साक्ष्य जुटाने की अनुमति मांगी, उसका आधार क्या था। इतना ही नहीं, सालभर सबको चक्करघिन्नी बनाने वाले कंपनी के निदेशक की याददाश्त पहले क्यों नहीं परखी गई। यह सवाल भी उठता है कि जिनकी जिम्मेदारी कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील करना था, वे आरोपी के साथ गलबहियां क्यों करते रहे?

नंबर 2 वाले साहब की अकुलाहट

सड़कों से संबंधित नंबर-2 वाले साहब इन दिनों नंबर-1 पर आने के लिए लालायित हैं। वह इधर-उधर से जुगाड़ लगा रहे हैं कि भले ही कुछ महीने के लिए ही सही लेकिन उन पर नंबर-1 का ठप्पा लग जाए। बताते हैं कि ऊपर बैठे एक सजातीय अफसर उनकी खुलकर मदद कर रहे हैं। उन्हें यह भी बता रहे हैं कि नंबर-1 तक पहुंचने के लिए क्या-क्या करना होगा? नतीजतन नंबर-2 वाले साहब आश्वस्त हैं कि उनका काम चालू वित्त वर्ष में ही बन जाएगा। अब यह तो भविष्य ही बताएगा कि वह कितना सफल होते हैं। अलबत्ता यह मामला कानाफूसी के केंद्र में आ चुका है।

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